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इलाहाबाद हाईकोर्ट: दहेज हत्या के 99 प्रतिशत से अधिक मामलों में जज ने दी जमानत, सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद रोस्टर से हटने का किया था आग्रह

| Updated: March 17, 2026 16:31

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बीच एक चौंकाने वाली रिपोर्ट: इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज ने 510 में से 508 दहेज हत्या मामलों में आरोपियों को दी जमानत।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज ने हाल ही में मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया था कि उन्हें जमानत रोस्टर न सौंपा जाए। यह कदम सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनके एक फैसले को “बेहद चौंकाने वाला और निराशाजनक” बताए जाने के बाद उठाया गया था। अब एक विश्लेषण से यह बात सामने आई है कि इन जज की पीठ ने दहेज हत्या के मामलों में भारी तादाद में आरोपियों को जमानत दी है।

अक्टूबर से दिसंबर 2025 के बीच उनके नेतृत्व वाली एकल पीठ द्वारा पारित दहेज हत्या के 510 सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नियमित जमानत आदेशों के विश्लेषण से एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आता है। जस्टिस पंकज भाटिया ने इन कुल 510 मामलों में से 508 में जमानत दे दी। यह आंकड़ा कुल मामलों का 99.61 प्रतिशत बैठता है।

इन सभी जमानत आदेशों की संरचना और भाषा लगभग एक जैसी ही पाई गई है। मौत की परिस्थितियां अलग-अलग होने के बावजूद जस्टिस भाटिया द्वारा तय की गई मुचलके की राशि और जमानत की शर्तें सभी मामलों में एक समान थीं।

नौ फरवरी को जस्टिस भाटिया के एक जमानत आदेश को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने कड़ी टिप्पणी की थी। शीर्ष अदालत ने कहा था कि आदेश को पढ़ने के बाद यह समझ पाना मुश्किल है कि हाईकोर्ट क्या कहना चाहता है।

सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया था कि दहेज हत्या जैसे बेहद गंभीर अपराध में आरोपी के पक्ष में जमानत देने के लिए हाईकोर्ट ने किन बातों को आधार बनाया।

जमानत रद्द करते हुए और आरोपी को सरेंडर करने का निर्देश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण तथ्यों पर गौर किया। अदालत ने बताया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण गला घोंटना बताया गया था और यह घटना शादी के महज तीन महीने बाद हुई थी। ऐसी स्थिति में भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 118 के तहत सीधे तौर पर आरोप बनते हैं।

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपराध की प्रकृति और निर्धारित सजा का परीक्षण करे। इसके साथ ही आरोपी और मृतका के बीच के रिश्ते, घटना स्थल और रिकॉर्ड पर मौजूद मेडिकल साक्ष्यों की भी गहराई से जांच होनी चाहिए।

इस घटनाक्रम के कुछ दिनों बाद ही जस्टिस भाटिया ने मुख्य न्यायाधीश से उन्हें जमानत रोस्टर न सौंपने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का उन पर बहुत बड़ा मनोबल गिराने वाला और हतोत्साहित करने वाला प्रभाव पड़ा है।

इस मामले पर उनका पक्ष जानने के लिए कई बार संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उनकी तरफ से या इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से कोई जवाब नहीं मिला।

जिस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई थी, वह श्रावस्ती जिले की 28 वर्षीय सुषमा देवी की मौत से जुड़ा था। शादी के दो महीने से भी कम समय में उनका शव ससुराल के बरामदे में मिला था। मृतका के पिता ने आरोप लगाया था कि शादी के समय साढ़े तीन लाख रुपये नकद दिए गए थे, लेकिन बाद में दूल्हे पक्ष ने कार की मांग शुरू कर दी थी।

इस मामले में सत्र न्यायालय ने जमानत देने से इनकार कर दिया था। निचली अदालत ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण “गला घोंटने के कारण दम घुटना” और गले पर मौजूद निशानों को अपने फैसले का मजबूत आधार बनाया था।

अक्टूबर से दिसंबर के बीच अदालत की वेबसाइट पर उपलब्ध जस्टिस भाटिया द्वारा पारित प्रत्येक आदेश में गंभीर धाराएं शामिल थीं। इनमें आईपीसी की धारा 304 बी (या बीएनएस की धारा 80) और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत आरोप दर्ज किए गए थे, जो स्पष्ट रूप से दहेज से जुड़ी मौत से संबंधित हैं।

इन 510 मामलों में घटना से पहले शादी की औसत अवधि साढ़े तीन से चार साल के बीच थी। जमानत मांगने वालों में 362 पति, 68 सास और 63 ससुर शामिल थे। इसके अलावा कुछ मामलों में ननद, देवर और अन्य रिश्तेदार भी छोटी संख्या में शामिल थे।

रिकॉर्ड के मुताबिक छह मामलों में मौत के समय मृतका गर्भवती थी। आदेशों में उद्धृत पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार 340 मामलों में मौत का कारण फांसी दर्ज किया गया था। इसके अलावा 27 मामलों में जहर खाना, 16 में गला घोंटना, 11 में जलने की चोटें, 7 में गला दबाना, 7 में सिर की चोटें और 4 मामलों में डूबने से मौत होने की बात सामने आई।

केवल 10 मामलों को छोड़कर बाकी सभी में अदालत ने दर्ज किया कि आवेदक का कोई भी “आपराधिक इतिहास” नहीं था। जमानत आदेशों में दर्ज आंकड़ों के अनुसार 510 आरोपियों में से 356 ने एक साल से कम समय हिरासत में बिताया था।

इन 356 लोगों में से 5 ने एक महीने से कम, 104 ने 1-3 महीने, 142 ने 3-6 महीने और 105 ने 6-12 महीने जेल में काटे थे। बावन आदेशों में आरोपी के 12-24 महीने तक हिरासत में रहने का जिक्र था, जबकि करीब 31 आरोपी दो साल से ज्यादा समय से जेल में थे।

इन सभी मामलों में हिरासत की सबसे लंबी अवधि आठ साल थी। यह एक ऐसा मामला था जिसमें कुएं में गिरने से महिला की मौत होने की बात कही गई थी। वहीं 71 आदेश ऐसे भी थे जिनमें हिरासत में बिताए गए समय का कोई जिक्र ही नहीं किया गया था।

दहेज हत्या से जुड़ी धारा तब लागू होती है जब शादी के सात साल के भीतर किसी महिला की अप्राकृतिक परिस्थितियों में मौत हो जाती है और दहेज उत्पीड़न से जुड़ी सामग्री रिकॉर्ड पर मौजूद होती है। कानून के तहत रिकॉर्ड पर इन तत्वों के आने के बाद अदालतों को यह मान लेना चाहिए कि ससुराल वालों ने ही हत्या की है, जब तक कि मुकदमे के दौरान इसे गलत साबित न कर दिया जाए।

जांचे गए आदेशों में अक्सर पोस्टमार्टम रिपोर्ट, हिरासत में बिताए गए समय और आपराधिक इतिहास न होने का हवाला देते हुए तुरंत जमानत दी गई। लगभग आधे मामलों (253 आदेशों) में जस्टिस भाटिया ने स्पष्ट रूप से कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है जो मौत से ठीक पहले उत्पीड़न की ओर इशारा करता हो।

ज्यादातर आदेशों की शुरुआत वकीलों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का अवलोकन करने की बात से होती है। इसके बाद एफआईआर नंबर, लगाई गई धाराओं, जेल में रहने की अवधि, आपराधिक इतिहास और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का संदर्भ दिया जाता है। इसके ठीक बाद जमानत का कारण और अंतिम पैराग्राफ में शर्तें दर्ज होती हैं।

जमानत देने के कारण के रूप में “आवेदक के खिलाफ कुछ भी विशिष्ट नहीं” और “कोई विशिष्ट आरोप नहीं” जैसे वाक्यों का बहुतायत में इस्तेमाल किया गया। सभी मामलों में जमानत की शर्तें लगभग एक जैसी थीं, जिसमें 20,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के दो जमानतदारों की शर्त शामिल थी।

जिन मामलों में मृत्यु पूर्व दिए गए बयान, विसरा रिपोर्ट या गवाहों के बयानों जैसे अतिरिक्त तथ्यों पर चर्चा की गई, उन्हें भी आदेश के तर्क वाले हिस्से में ही पिरोया गया, लेकिन आदेश का मूल ढांचा बिल्कुल नहीं बदला। वीरेंद्र राठौर के मामले में एफआईआर में दर्ज मृत्यु पूर्व बयान में मृतका ने डॉक्टर के सामने कहा था कि उसके पति और सास-ससुर ने उस पर डीजल डालकर आग लगा दी।

हालांकि बचाव पक्ष ने बच्चों के बयान का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि महिला ने खुद अपने पैरों पर डीजल डाला था। कोर्ट ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दर्ज मामूली रूप से जलने की चोटों और बयानों में भारी विरोधाभास को देखते हुए इस मामले में जमानत दे दी।

इन सभी 510 मामलों में से केवल दो में जमानत याचिका खारिज की गई। सर्वजीत कुमार के मामले में मृतका का शरीर 90 प्रतिशत तक जल चुका था और उसने घटना वाले दिन अपने पिता को मारपीट और धमकियों के बारे में बताया था। पोस्टमार्टम में भी एंटीमार्टम बर्न इंजरी और केरोसिन की महक की पुष्टि हुई थी, इसलिए अदालत ने जमानत देने से इनकार कर दिया।

जमानत खारिज होने का दूसरा मामला रिशितोष यादव का था, जिस पर अपनी पत्नी के सिर पर गोली मारने का गंभीर आरोप था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सिर पर चोट और गोली लगने के घाव की पुष्टि हुई थी। हालांकि मौत का कारण स्पष्ट नहीं हो सका था, लेकिन अदालत ने प्रथम दृष्टया धारा 302 के आरोपों को पुख्ता मानते हुए जमानत अर्जी ठुकरा दी।

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