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भारत का पहला डेंटल मैप: दांतों की बनावट से खुलेगा इंसान की पहचान और इलाके का राज

| Updated: March 24, 2026 15:30

5 साल, 23 राज्य और 2.23 लाख दांतों का विश्लेषण: जानिए कैसे तैयार हुआ देश का पहला फॉरेंसिक डेंटल डेटाबेस, जो अपराध और आपदाओं में खोलेगा मृतकों की पहचान का राज।

अहमदाबाद के एक डेंटिस्ट ने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है, जो पूरे देश में अब तक नहीं हुआ था। उन्होंने यह पता लगाने के लिए कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में लोगों के दांतों की बनावट कैसी होती है, पांच साल तक 23 राज्यों की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने लगभग 37,000 किलोमीटर का सफर तय किया। इस शोध का मकसद यह समझना था कि दांतों के जरिए किसी इंसान की पहचान और उसके मूल स्थान का पता कैसे लगाया जा सकता है।

गवर्नमेंट डेंटल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के डॉ. जयशंकर पी. पिल्लई ने भारत का सबसे विस्तृत फॉरेंसिक डेंटल मॉर्फोलॉजी डेटाबेस तैयार किया है। इसके लिए उन्होंने कुल 2.23 लाख दांतों का गहराई से विश्लेषण किया। उनके इस बेहतरीन काम के लिए उन्हें हाल ही में नेशनल फॉरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी (एनएफएसयू) से पीएचडी की उपाधि से सम्मानित किया गया है। उनका यह शोध देश में अपराधों और आपदाओं के दौरान पीड़ितों की पहचान करने का पूरा तरीका बदल सकता है।

फॉरेंसिक दृष्टिकोण से देखें तो, डॉ. पिल्लई की यह वर्गीकरण पद्धति फिलहाल किसी व्यक्ति के मूल क्षेत्र को पहचानने में 36% तक सफल है। वहीं, सिर्फ दांतों के सैंपल की मदद से लिंग (जेंडर) का पता लगाने में इसकी सफलता दर 63% है। डॉ. पिल्लई को पूरा भरोसा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के इस्तेमाल और डेटाबेस के विस्तार से भविष्य में इन आंकड़ों को और भी बेहतर किया जा सकता है।

उनका यह अध्ययन एक बहुत बड़ी कमी को पूरा करता है। कई पश्चिमी देशों की तुलना में भारत में लोगों के दांतों का रिकॉर्ड बहुत कमजोर है, जिससे फॉरेंसिक पहचान मुश्किल हो जाती है। कई बार तो जांचकर्ताओं को दांतों के सबूत मिलाने के लिए पीड़ितों की मुस्कुराती हुई तस्वीरों का सहारा लेना पड़ता है। एनएफएसयू के कुलपति और डॉ. पिल्लई के गाइड डॉ. जेएम व्यास ने बताया कि किसी भी आपदा में पीड़ितों की पहचान करने के लिए दांत बहुत अहम भूमिका निभाते हैं।

डॉ. व्यास के अनुसार, दांत दशकों और सदियों तक सुरक्षित रह सकते हैं और पहचान के एक पक्के सबूत के रूप में काम आ सकते हैं। देश में एक राष्ट्रीय डेंटल रजिस्ट्री बनाने की कोशिशें भी लगातार चल रही हैं। डेंटल कॉलेज के ओरल एंड मैक्सिलो-फेशियल पैथोलॉजी विभाग के सीनियर फैकल्टी मेंबर डॉ. पिल्लई को अपनी इस रिसर्च में कई चौंकाने वाले पैटर्न मिले हैं।

अध्ययन में सामने आया है कि कई पूर्वोत्तर और उत्तरी राज्यों में लोगों के आगे के दांत फावड़े के आकार (शॉवल-शेप्ड इन्सीजर्स) के होते हैं। इन दांतों के पिछले हिस्से पर फावड़े के अंदरूनी हिस्से जैसी धारियां होती हैं। वहीं, अगर गुजरात और पश्चिम-दक्षिण दिशा की ओर जाएं, तो वहां के लोगों की दाढ़ (मोलर) में अधिक कस्प (दांत का उभरा हुआ हिस्सा) पाए जाते हैं, जिनकी संख्या अक्सर छह या सात तक होती है।

ये बनावट केवल कोई संयोग नहीं हैं, बल्कि हमारे इनेमल और डेंटिन में छिपे आनुवंशिक संकेत हैं। डॉ. पिल्लई ने बताया कि वे कई दशकों से ओडोंटोलॉजी (दांतों की संरचना) के फॉरेंसिक उपयोग पर काम कर रहे हैं। इसी वजह से उन्होंने भारत के लिए दांतों की एक व्यवस्थित प्रोफाइलिंग करने का फैसला किया। साल 2020 से 2025 के बीच उन्होंने छह अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों और 23 राज्यों से सैंपल इकट्ठा किए और 2.23 लाख दांतों के लक्षणों का विश्लेषण किया।

डॉ. पिल्लई ने ASUDAS/Turner-Scott प्रणाली जैसे अंतरराष्ट्रीय डेंटल एंथ्रोपोलॉजी मानकों का उपयोग करके 15 पैमानों (नॉन-मेट्रिक क्राउन ट्रेट्स) पर हर एक सैंपल का आकलन किया। उनकी रिसर्च के कई नतीजे अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण से बिल्कुल मेल खाते हैं। उन्होंने बताया कि दांतों की बनावट कई बातों पर निर्भर करती है, लेकिन उनका अध्ययन मुख्य रूप से आनुवंशिक लक्षणों पर केंद्रित था।

अलग-अलग जीन पूल के लिए उन्हें दांतों की खास विशेषताएं मिलीं। उदाहरण के लिए, ‘कस्प ऑफ काराबेली’ एक ऐसी विशेषता है जो मुख्य रूप से कोकेशियान आबादी के ऊपरी जबड़े की पहली या दूसरी दाढ़ में पाई जाती है। दिलचस्प बात यह है कि यह विशेषता भारत के कुछ हिस्सों में भी देखी गई। उनके सैंपलों में मध्य एशियाई और पश्चिमी यूरोपीय आनुवंशिक आबादी के साथ समानताएं भी साफ तौर पर दिखाई दीं।

डॉ. पिल्लई का कहना है कि हमारा आनुवंशिक इतिहास हमारे दांतों में उकेरा हुआ है। वह अब अपने इस डेटाबेस का और अधिक विस्तार करना चाहते हैं। उनका मुख्य लक्ष्य इस जानकारी को ऐसी जांच एजेंसियों के लिए उपलब्ध कराना है, जो अज्ञात लोगों की पहचान करने के काम में जुटी रहती हैं।

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