अहमदाबाद स्थित भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) के वैज्ञानिकों ने संचार को पूरी तरह से सुरक्षित बनाने के लिए एक खास उपकरण तैयार किया है। टैबलेट के आकार का यह उपकरण महज 1.5 किलोग्राम का है। यह एक छोटे बॉक्स जैसा दिखता है, जो आपस में जुड़े प्रकाश कणों (लाइट पार्टिकल्स) के जोड़े बनाता है ताकि संदेशों की हैकिंग की कोई गुंजाइश न रहे।
इस उपकरण को ‘जोनाकी’ नाम दिया गया है, जिसका बंगाली भाषा में अर्थ जुगनू होता है। यह भारत का पहला स्वदेशी और उपयोग के लिए पूरी तरह से तैयार उपकरण है। इसका मुख्य उद्देश्य खुफिया संदेशों को बीच में रोके जाने या चुराए जाने की संभावना को खत्म करना है। इसके साथ ही, यह बेहद सटीक वैज्ञानिक माप लेने में भी पूरी तरह सक्षम है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, जोनाकी को ड्रोन-आधारित और अन्य ‘फ्री-स्पेस’ क्वांटम संचार प्रणालियों तथा सटीक सेंसिंग को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस तरह के साधारण उपकरणों की कीमत 30 लाख रुपये से अधिक होती है।
इसके विपरीत, जोनाकी कहीं अधिक उन्नत होने के साथ-साथ इतना किफायती है कि इसे स्नातक स्तर के शोध कार्यों के लिए आसानी से उपलब्ध कराया जा सकता है।
पीआरएल की फोटोनिक साइंसेज लेबोरेटरी के रिसर्च लीडर डॉ. गौतम सामंत ने ‘स्टूडेंट कॉन्फ्रेंस ऑन ऑप्टिक्स एंड फोटोनिक्स – ऑप्टिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया सिम्पोजियम’ (SCOPOSIS) के दौरान इस विषय पर विस्तार से चर्चा की।
उन्होंने बताया कि इस पहल का मुख्य लक्ष्य क्वांटम तकनीक को देश की शीर्ष प्रयोगशालाओं से निकालकर आम शैक्षणिक संस्थानों तक पहुंचाना है। इस किफायती और ‘हैंड्स-फ्री’ डिवाइस के जरिए पीआरएल अंडरग्रेजुएट कॉलेजों को भविष्य के वैज्ञानिक तैयार करने के लिए सशक्त बना रहा है।
तकनीकी कार्यप्रणाली की बात करें तो जोनाकी मूल रूप से एक ‘एंटैंगल्ड फोटॉन सोर्स’ है। यह एक विशेष क्रिस्टल के जरिए लेजर किरणों को गुजारता है, जिससे 810 नैनोमीटर वेवलेंथ वाले अत्यंत सूक्ष्म प्रकाश कणों (फोटॉन) के जोड़े बनते हैं। ये फोटॉन जुड़वां बच्चों की तरह एक-दूसरे से जुड़े होते हैं, जहां एक कण के साथ कुछ भी होने पर उसका असर तुरंत दूसरे पर पड़ता है।
आधुनिक भौतिकी में यह प्रक्रिया बेहद अहम मानी जाती है। यदि कोई हैकर इनमें से किसी एक कण को ‘देखने’ या हैक करने की कोशिश करता है, तो यह नाजुक संपर्क तुरंत टूट जाता है। ऐसा होते ही संदेश भेजने वाले को तुरंत अलर्ट मिल जाता है।
डॉ. सामंत ने स्पष्ट किया कि यही विशेषता ‘एंटैंगलमेंट-आधारित क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन’ (QKD) का मुख्य आधार है। इस तकनीक में अगर कोई भी व्यक्ति संचार में सेंधमारी करने की कोशिश करता है, तो फोटॉन की क्वांटम स्थिति बदल जाती है। इससे यह तुरंत पता चल जाता है कि कोई बाहरी व्यक्ति संदेश को बीच में पढ़ने का प्रयास कर रहा है।
ड्रोन-आधारित व्यवस्था में उपयोग को लेकर उन्होंने बताया कि जोनाकी वहां उलझे हुए फोटॉनों (एंटैंगल्ड फोटॉन) के स्रोत के रूप में काम करेगा। प्रत्येक जोड़े से एक फोटॉन को ‘फ्री-स्पेस ऑप्टिकल लिंक’ के माध्यम से ग्राउंड स्टेशन तक भेजा जा सकता है, जबकि दूसरे को एक अन्य नोड पर सुरक्षित रखा जाता है। यह हवा में भी पूरी तरह सुरक्षित ‘की जनरेशन’ और परीक्षण की सुविधा प्रदान करता है।
इसके अलावा, जोनाकी का एक और महत्वपूर्ण उपयोग सटीक माप के क्षेत्र में है। डॉ. सामंत के अनुसार, एंटैंगल्ड फोटॉन ऑप्टिकल गुणों में होने वाले बेहद मामूली बदलावों पर भी प्रतिक्रिया देते हैं। यह उच्च स्तर की संवेदनशीलता पारंपरिक प्रकाश स्रोतों से प्राप्त नहीं की जा सकती। इसकी मदद से ऐसी उच्च-सटीकता वाली माप और सेंसिंग संभव है, जो पुरानी ऑप्टिकल तकनीकों को काफी पीछे छोड़ देती है।
पीआरएल के आंकड़ों के अनुसार, जोनाकी प्रति मिलीवाट बिजली पर हर सेकंड कम से कम 10 लाख जुड़े हुए प्रकाश-कणों (फोटॉन) के जोड़े बनाता है। यह बेजोड़ क्षमता इसे दुनिया के सबसे बेहतरीन उपकरणों की श्रेणी में ला खड़ा करती है। विश्व स्तर पर क्वांटम उपकरणों को परखने के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रमुख सटीकता परीक्षणों में इसका स्कोर 98% से अधिक रहा है।
डॉ. सामंत ने यह भी बताया कि यह प्रणाली 98% से अधिक ‘बेल-स्टेट फिडेलिटी’ के साथ-साथ एक मजबूत ‘बेल-इनइक्वालिटी वायलेशन’ प्रदर्शित करती है। ये दोनों ही उच्च गुणवत्ता वाले क्वांटम संचार और मेट्रोलॉजी प्रयोगों के लिए आवश्यक अंतरराष्ट्रीय मानक हैं।
बाजार में मौजूद ज्यादातर क्वांटम सेटअप ऐसे होते हैं जो पूरी मेज घेर लेते हैं और उन्हें बार-बार मैनुअल एडजस्टमेंट की जरूरत होती है। लेकिन जोनाकी की खासियत यह है कि यह कमरे के सामान्य तापमान पर काम करता है और अपने आप स्थिर रहता है। यह सीधे ऑप्टिकल फाइबर से जुड़ जाता है, जो इसे व्यावहारिक रूप से इस्तेमाल में बेहद आसान और ‘प्लग-एंड-प्ले’ डिवाइस बनाता है।
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