अहमदाबाद से एक बेहद अहम कानूनी मामला सामने आया है। गांधीनगर की एक सिविल कोर्ट ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (Indian Succession Act) के तहत एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने एक महिला को उसके दिवंगत पिता के आईफोन और आईक्लाउड अकाउंट का एक्सेस देने की अनुमति दे दी है। इस ऐतिहासिक फैसले में अदालत ने डिजिटल डेटा को मृतक की संपत्ति का ही एक हिस्सा माना है।
यह फैसला तब आया जब दिग्गज टेक कंपनी एप्पल (Apple) ने परिवार को डेटा का एक्सेस देने के लिए कोर्ट का आदेश लाने को कहा था। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह स्पष्ट किया कि डिजिटल रिकॉर्ड जैसे तस्वीरें, वीडियो और दस्तावेज न सिर्फ कानूनी बल्कि भावनात्मक महत्व भी रखते हैं। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि मृत्यु के बाद किसी भी व्यक्ति का निजता का अधिकार (Right to Privacy) खत्म हो जाता है।
यह पूरा मामला शैशव शाह से जुड़ा है, जिनका अप्रैल 2025 में निधन हो गया था। उन्होंने अपने पीछे कोई वसीयत नहीं छोड़ी थी। उनके निधन के बाद, उनकी पत्नी और बेटी सुर शाह ने उनके लॉक किए गए आईफोन और आईक्लाउड अकाउंट तक पहुंच मांगी।
जब परिवार ने कंपनी से संपर्क किया, तो उन्हें बताया गया कि किसी सक्षम न्यायालय द्वारा उन्हें मृतक का कानूनी प्रतिनिधि घोषित किए जाने के बाद ही डेटा का एक्सेस दिया जा सकता है।
इसके बाद परिवार ने वकील जीत भट्ट के माध्यम से अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने उत्तराधिकार अधिनियम के तहत घोषणा और प्रशासन पत्र (Letter of Administration) की मांग करते हुए याचिका दायर की। कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए मृतक की पत्नी ने अपनी बेटी द्वारा डिजिटल डेटा के इस्तेमाल के पक्ष में एक अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) भी अदालत में जमा किया।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि मृतक के आईक्लाउड अकाउंट में कई जरूरी व्यक्तिगत चीजें मौजूद हैं। इनमें तस्वीरें, वीडियो, वॉयस नोट्स, महत्वपूर्ण दस्तावेज और कॉन्टैक्ट लिस्ट शामिल हैं। परिवार के लिए यह सारा डेटा भावनात्मक और व्यावहारिक दोनों ही नजरिए से बेहद अहम है और उनके जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है।
बेटी ने कोर्ट को यह भी बताया कि एप्पल ने आईक्लाउड डेटा तक पहुंचने के लिए पासवर्ड या सुरक्षा रीसेट की सुविधा देने की बात कही है। हालांकि, कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि उनके पास किसी भौतिक रूप से लॉक किए गए डिवाइस में मौजूद डेटा को निकालने की कोई तकनीकी क्षमता नहीं है।
इसी वजह से कंपनी ने आवेदकों को मृतक का आधिकारिक प्रतिनिधि घोषित करने वाले अदालती आदेश की सख्ती से मांग की थी।
याचिकाकर्ताओं ने जनता से आपत्तियां मांगने के लिए एक सार्वजनिक विज्ञापन जारी करने की कानूनी औपचारिकता भी पूरी की। बाद में अदालत में यह दलील दी गई कि मौजूदा भारतीय कानूनी ढांचा डिजिटल डेटा को “संपत्ति” के रूप में मान्यता देने के लिए पूरी तरह पर्याप्त है।
प्रशासक-जनरल अधिनियम (Administrators-General Act), 1963 की धारा 2(a) के तहत ‘संपत्ति’ की परिभाषा काफी व्यापक है। इसमें मृतक की सभी चल संपत्तियां शामिल होती हैं, जो डिजिटल डेटा को भी अपने दायरे में लेने के लिए काफी है।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अतिरिक्त वरिष्ठ सिविल जज हिमांशु चौधरी ने अपना फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि यह अदालत मानती है कि मृतक के एप्पल आईक्लाउड अकाउंट में स्टोर किया गया डेटा एक मूल्यवान डिजिटल संपत्ति है। यह डेटा मृतक की कुल संपत्ति का ही एक हिस्सा है और इसे अधिनियम के तहत पूरी तरह से प्रशासित किया जा सकता है।
कोर्ट ने आगे बताया कि मौजूदा भारतीय कानूनी ढांचा डिजिटल डेटा को संपत्ति के दायरे में रखने के लिए विस्तृत है। इसमें जनरल क्लॉजेज एक्ट, 1897 और भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत ‘चल संपत्ति’ की व्यापक परिभाषाएं शामिल हैं।
इसके अलावा, प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002 में ‘संपत्ति’ की परिभाषा और आयकर अधिनियम, 1961 के तहत ‘वर्चुअल डिजिटल एसेट्स’ की मान्यता भी डिजिटल डेटा को वैचारिक रूप से संपत्ति का दर्जा देती है।
मृतक की निजता के अधिकार के मुद्दे पर भी अदालत ने स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी। कोर्ट ने कहा कि निजता का अधिकार एक नितांत व्यक्तिगत अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले ही यह स्पष्ट किया जा चुका है कि किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के साथ ही उसका निजता का अधिकार स्वतः समाप्त हो जाता है।
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