सूरत: भारत के हीरा उद्योग में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला है। वित्त वर्ष 2025-26 में पहली बार पॉलिश्ड लैब-ग्रोन हीरों (एलजीडी) के निर्यात ने वॉल्यूम यानी मात्रा के मामले में प्राकृतिक हीरों को पीछे छोड़ दिया है। यह तेजी से बढ़ते उत्पादन और किफायती कीमतों का नतीजा है जिसने वैश्विक हीरा व्यापार की दिशा ही बदल दी है।
वित्त वर्ष 2025-26 के अस्थायी आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत ने 18.8 मिलियन कैरेट पॉलिश्ड लैब-ग्रोन हीरों का निर्यात किया है। इसकी तुलना में तराशे और पॉलिश किए गए प्राकृतिक हीरों का निर्यात 16 मिलियन कैरेट रहा। उद्योग से जुड़े दिग्गजों का मानना है कि लैब में विकसित हीरों की निर्माण क्षमता में जैसे-जैसे इजाफा होगा, दोनों के बीच का यह अंतर और भी ज्यादा बढ़ जाएगा।
अगर हम करीब एक दशक पहले की बात करें तो तस्वीर बिल्कुल अलग थी। साल 2015-16 में भारत से 33.51 मिलियन कैरेट कट और पॉलिश्ड प्राकृतिक हीरों का निर्यात हुआ था, जबकि तब एलजीडी का निर्यात महज 100,000 कैरेट ही था। बीते 10 सालों में लैब-ग्रोन सेगमेंट ने एक शून्य से शुरुआत करके उस उद्योग को पछाड़ दिया है जिसे खड़ा होने में पांच दशक से ज्यादा का समय लगा।
हालांकि, अगर मूल्य या कीमत की बात करें तो प्राकृतिक हीरे अब भी काफी आगे हैं। प्राकृतिक हीरों की औसत निर्यात कीमत लगभग 760 डॉलर प्रति कैरेट है। वहीं इसके मुकाबले पॉलिश्ड लैब-ग्रोन हीरों की कीमत 60 डॉलर प्रति कैरेट है। कीमत में इतने बड़े अंतर के बावजूद, उद्योग जगत के नेताओं का कहना है कि लैब-ग्रोन सेगमेंट में पैमाना बढ़ाना रणनीतिक रूप से बेहद जरूरी था, खासकर चीन को कड़ी टक्कर देने के लिए।
विशेषज्ञ इस बात पर भी जोर देते हैं कि आभूषण निर्माण में लैब-ग्रोन हीरों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। कई अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ये प्राकृतिक हीरों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से उपभोक्ताओं की पहली पसंद बनते जा रहे हैं।
बाजार के जानकारों का कहना है कि इस शानदार ग्रोथ की सबसे बड़ी वजह इन हीरों का किफायती होना है। कम कीमतों ने उन देशों और उपभोक्ता वर्गों में भी भारी मांग पैदा कर दी है, जहां प्राकृतिक हीरों की कोई खास पहुंच नहीं थी। असल में, एलजीडी सिर्फ प्राकृतिक हीरों की जगह नहीं ले रहे हैं, बल्कि वे आभूषण बाजार के पूरे दायरे को बढ़ा रहे हैं।
उद्योग पर नजर रखने वालों ने एक और अहम बात गौर की है। जहां एक तरफ भू-राजनीतिक तनावों के कारण प्राकृतिक हीरों के व्यापार को काफी नुकसान पहुंचा है, वहीं दूसरी तरफ लैब-ग्रोन हीरों पर इसका असर बहुत ही सीमित रहा है।
किरा डायम (Kira Diam) के चेयरमैन वल्लभ लखानी ने इस बदलाव पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि बेहतरीन गुणवत्ता और किफायती कीमतों के कारण एलजीडी नए बाजारों में काफी लोकप्रिय हो रहे हैं। उन देशों से भी जमकर मांग आ रही है जहां प्राकृतिक हीरों का कोई बाजार ही नहीं था। उनके मुताबिक, आने वाले समय में इसका निर्माण और भी ज्यादा बढ़ेगा।
उत्पादन बढ़ने और प्रति-कैरेट कीमतों में लगातार गिरावट के बावजूद, एलजीडी क्षेत्र में नया निवेश आना जारी है। विशेषज्ञों की मानें तो भविष्य में इसका विस्तार सिर्फ आभूषणों तक ही सीमित नहीं रहेगा। सेमीकंडक्टर और अन्य उन्नत तकनीकों में भी इसके इस्तेमाल की अपार संभावनाएं हैं, जहां इसकी मांग बहुत बड़े स्तर पर उभर सकती है।
इंडियन डायमंड इंस्टीट्यूट के चेयरमैन दिनेश नावडिया ने भी इस विषय पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने बताया कि ऊंची कीमतों के कारण प्राकृतिक हीरों के खरीदार हमेशा से सीमित रहे हैं और एक खास वर्ग आगे भी इन्हें खरीदता रहेगा।
लेकिन लैब-ग्रोन हीरे बाकी लोगों के लिए एक बेहतरीन विकल्प बनकर उभरे हैं, जिससे कई नए देशों में बाजार के दरवाजे खुल रहे हैं। इस बदलाव ने हमारे आभूषणों के लिए भी एक नया और बड़ा बाजार तैयार कर दिया है।
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