कैमरे रोल होते रहे और उसे पर्दे पर अलग-अलग भूमिकाएं मिलती रहीं, लेकिन किसी को भनक तक नहीं लगी कि हेमंत नगीनदास मोदी असल जिंदगी में एक उम्रकैद की सजा काट रहा मुजरिम है। अहमदाबाद क्राइम ब्रांच द्वारा पिछले हफ्ते गिरफ्तार किए गए 54 वर्षीय इस शख्स ने एक नहीं बल्कि दो बार पैरोल जंप की थी।
हैरानी की बात यह है कि करीब 12 साल तक फरार रहने के बावजूद, उसका नाम कभी भी नेशनल प्रिजन पोर्टल पर आधिकारिक रूप से भगोड़े के तौर पर दर्ज नहीं हुआ।
इस पूरे मामले ने जेल प्रशासन और पुलिस के बीच तालमेल की भारी कमियों को उजागर कर दिया है। क्राइम ब्रांच के अधिकारियों ने यह माना है कि केंद्रीय जेल डेटाबेस में नाम न होने की वजह से ही वह इतने लंबे समय तक रडार से बचा रहा।
एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, पैरोल और फरलो के उल्लंघन के बाद मुजरिम के रिकॉर्ड को ठीक से अपडेट ही नहीं किया गया। नेशनल प्रिजन पोर्टल पर उसकी कोई जानकारी मौजूद नहीं थी, जिसकी वजह से उसे ट्रैक करना एजेंसियों के लिए बहुत मुश्किल हो गया था।
सिस्टम की यह चौंकाने वाली लापरवाही तब सामने आई जब मोदी को घीकांटा मेट्रो स्टेशन के पास एक किराए के मकान से गिरफ्तार किया गया। पुलिस को यह सफलता किरायेदार सत्यापन प्रक्रिया के दौरान मिली एक गुप्त सूचना के आधार पर मिली।
अधिकारियों ने बताया कि वह अपनी असली पहचान छिपाकर ‘स्पंदन कुमार’ के फर्जी नाम से बड़ी खामोशी से जिंदगी बिता रहा था।
आपको बता दें कि 12 जून 2005 को नरोडा की पार्श्वनाथ टाउनशिप में संपत्ति विवाद के चलते नरेंद्र कांबले की हत्या कर दी गई थी। इस मामले में मोदी समेत कुल सात लोगों को दोषी ठहराया गया था। इन सभी को 27 अगस्त 2008 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।
पुलिस और जेल रिकॉर्ड के मुताबिक, मोदी ने पहली बार 2008 में ही फरलो का उल्लंघन किया था। उसे उस साल 25 अक्टूबर तक की छुट्टी मिली थी। बाद में उसने अपनी मां की बीमारी का हवाला देते हुए तत्कालीन जेल आईजी केशव कुमार से इसे बढ़ाने की गुहार लगाई थी। कथित तौर पर यह छुट्टी 4 नवंबर 2008 तक बढ़ा दी गई थी, लेकिन इसके बाद मोदी साबरमती सेंट्रल जेल वापस ही नहीं लौटा।
पुलिस सूत्रों का कहना है कि इस घटना के बावजूद, पुलिस फाइलों में उसे भगोड़ा घोषित करने का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं बनाया गया। पुलिस का दावा है कि अहमदाबाद और मेहसाणा के वरिष्ठ अधिकारियों को भी इसकी पूरी जानकारी नहीं थी कि मोदी ने दो बार पैरोल की शर्तों को तोड़ा है, क्योंकि पुलिस के पास कोई संयुक्त डेटाबेस मौजूद ही नहीं था।
क्राइम ब्रांच के पास वर्तमान में पैरोल जंप का केवल एक ही दस्तावेजी रिकॉर्ड मौजूद है। यह मामला 25 जुलाई 2014 का है, जब मोदी को गुजरात उच्च न्यायालय ने एक महीने की पैरोल दी थी। इसके बाद वह फिर से रहस्यमय तरीके से गायब हो गया।
हाल ही में सामने आए दस्तावेज़ों से पता चलता है कि वर्तमान में नेशनल प्रिजन पोर्टल पर पूरे देश में पैरोल से भागने वाले 1,115 लोगों के नाम दर्ज हैं। दो बार नियमों का उल्लंघन करने के बावजूद, मोदी का नाम इस ‘भगोड़ों की सूची’ में कहीं शामिल नहीं है।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह स्वीकार किया कि फरार कैदियों के रिकॉर्ड अपडेट करने के मामले में जेल अधिकारियों और पुलिस एजेंसियों के बीच समन्वय की गंभीर कमी है। यही लापरवाही प्रवर्तन में बड़ी खामियां पैदा करती है और ऐसे अपराधियों को सालों तक खुलेआम घूमने का मौका देती है।
इस पूरे मामले का एक और दिलचस्प पहलू यह भी है कि हत्या के मामले में जेल जाने से पहले मोदी वकालत के क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहता था। साल 2008 में जब वह एक विचाराधीन कैदी था, तब उसने ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास (जेएमएफसी) की परीक्षा शानदार अंकों से पास की थी।
लिखित परीक्षा पास करने के बाद उसे हाई कोर्ट से इंटरव्यू का कॉल लेटर भी मिला था और वह 411 सफल उम्मीदवारों में शामिल था। हालांकि, हत्या का मुकदमा चलने के कारण वह इंटरव्यू के लिए नहीं जा सका। एक अधिकारी ने बताया कि मोदी ने मौखिक परीक्षा में शामिल होने के लिए जमानत मांगी थी, लेकिन मई 2008 में जज द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद उसने अपना आवेदन वापस ले लिया था।
अब क्राइम ब्रांच के अधिकारी इस बात की गहन जांच कर रहे हैं कि पैरोल और फरलो से भागने के बावजूद मोदी ने इतने सालों तक फर्जी दस्तावेज कैसे हासिल किए, संपत्तियां कैसे किराए पर लीं और वह कैसे बिना किसी डर के आज़ादी से घूमता रहा।
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