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स्टेम सेल कंपनी की वादाखिलाफी पड़ी भारी: बीमार पति के इलाज में मदद से मुकरने पर लगा 20 लाख का जुर्माना

| Updated: June 17, 2026 12:38

नवसारी उपभोक्ता आयोग का सख्त फैसला: वादे से मुकरने और सेवा में कमी के चलते स्टेम सेल बैंकिंग कंपनी को देना होगा भारी-भरकम मुआवजा।

नवसारी जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (CDRC) ने एक अहम फैसला सुनाते हुए चेन्नई की एक स्टेम सेल बैंकिंग कंपनी को 20 लाख रुपये का भारी-भरकम मुआवजा देने का आदेश दिया है। यह जुर्माना एक 30 वर्षीय महिला के साथ स्टेम सेल उपचार से जुड़े अनुबंध का पालन न करने और सेवा में कमी के चलते लगाया गया है।

महिला ने ‘लाइफसेल इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड’ (LifeCell International Pvt Ltd) के साथ एक विशेष समझौता किया था। इस अनुबंध के तहत कंपनी को उसके नवजात बच्चे के स्टेम सेल को 75 वर्षों तक सुरक्षित रखना था। परिवार को भविष्य में किसी भी चिकित्सा उपचार के लिए इसकी आवश्यकता पड़ने पर कंपनी को यह उपलब्ध कराना था।

समझौते के दौरान कंपनी ने यह पक्का भरोसा दिया था कि यदि वह भविष्य में उपयुक्त स्टेम सेल सैंपल देने में विफल रहती है, तो वह मुआवजे के तौर पर 20 लाख रुपये का भुगतान करेगी।

मामले के दस्तावेजों के अनुसार, गणदेवी तालुका के एक गांव की रहने वाली इस महिला ने गर्भावस्था के दौरान ही इस स्टेम सेल प्रिजर्वेशन प्रोग्राम में अपना पंजीकरण करा लिया था। 3 जनवरी, 2024 को उसने 64,710 रुपये का भुगतान किया और लाइफसेल के साथ इस अहम समझौते पर हस्ताक्षर किए।

कंपनी ने यह भी शर्त रखी थी कि यदि भविष्य में स्टोर किए गए सैंपल मरीज से मैच नहीं होते हैं, तो वह किसी अन्य स्टेम सेल बैंक से मैचिंग सैंपल हासिल करने का पूरा प्रयास करेगी। ऐसा न कर पाने की स्थिति में कंपनी इलाज के खर्च के लिए 20 लाख रुपये देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य होगी।

20 जनवरी, 2024 को महिला ने नवसारी के एक अस्पताल में एक बेटे को जन्म दिया। बच्चे के जन्म के तुरंत बाद तय प्रक्रिया के तहत स्टेम सेल के नमूने एकत्र करके सुरक्षित रख लिए गए।

इस परिवार की असली परेशानी मार्च 2024 में शुरू हुई जब महिला के पति को ल्यूकेमिया (ब्लड कैंसर) होने का पता चला। मेडिकल सलाह के तुरंत बाद, अप्रैल महीने में महिला ने कंपनी से संपर्क किया और अपनी स्थिति बताते हुए सभी जरूरी मेडिकल रिपोर्ट वहां जमा कर दीं।

कंपनी ने अपनी प्रक्रिया के तहत स्टेम सेल के सैंपल भेजे जरूर, लेकिन डॉक्टरों ने जांच में पाया कि वे उसके पति की मेडिकल जरूरतों से मेल नहीं खाते थे।

इसके बाद 19 मई, 2024 को महिला ने कंपनी को सूचित किया कि चेन्नई की ही एक अन्य स्टेम सेल रजिस्ट्री में उनके मतलब के उपयुक्त सैंपल उपलब्ध हैं। उसने कंपनी से उन्हें हासिल करने में मदद की गुहार लगाई।

अंततः महिला को उस दूसरी रजिस्ट्री के माध्यम से आवश्यक सैंपल प्राप्त हो गए। हालांकि, इस पूरे इलाज में उसे 23.9 लाख रुपये का बड़ा खर्च आया, और अन्य संबंधित लागतों में भी लगभग 5 लाख रुपये अतिरिक्त खर्च हो गए।

सेवा में स्पष्ट कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार से आहत होकर महिला ने 11 जुलाई, 2025 को नवसारी सीडीआरसी का दरवाजा खटखटाया। अपनी शिकायत में उसने इलाज के खर्च की भरपाई और तय मुआवजे की मांग की।

अदालती कार्यवाही के दौरान, सितंबर 2025 में कंपनी का वकील आयोग के समक्ष पेश हुआ और अपना आधिकारिक जवाब दाखिल करने के लिए कुछ समय मांगा। हैरानी की बात यह रही कि सुनवाई की अगली तीन तारीखों पर पर्याप्त मौका दिए जाने के बावजूद कंपनी की ओर से कोई भी जवाब दाखिल नहीं किया गया।

महिला के वकील ने आयोग के सामने दृढ़ता से अपना पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि कंपनी द्वारा मांगे गए सभी आवश्यक दस्तावेज उसे समय पर मुहैया करा दिए गए थे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि खुद कंपनी ने ही उस थर्ड-पार्टी रजिस्ट्री की जानकारी दी थी जहां से अंततः मैचिंग स्टेम सेल प्राप्त किए गए।

वकील का तर्क था कि एक भारी-भरकम प्रीमियम वसूलने और वैकल्पिक सैंपल की उपलब्धता की पूरी जानकारी होने के बावजूद, कंपनी ने न तो इलाज की कोई व्यवस्था की और न ही अपने वादे के मुताबिक मुआवजे का भुगतान किया।

वहीं, अपने बचाव में कंपनी का कहना था कि सैंपल का मैच न होना एक पूरी तरह से प्राकृतिक प्रक्रिया है। कंपनी के अनुसार बच्चे के स्टेम सेल बहुत ही कम मामलों में माता-पिता से मेल खाते हैं। कंपनी ने यह भी दलील दी कि परिवार ने अपनी मर्जी से किसी अन्य रजिस्ट्री से सैंपल लिए थे और मुआवजे के दावे को आगे बढ़ाने के लिए सभी जरूरी दस्तावेज भी उन्हें उपलब्ध नहीं कराए गए।

दोनों पक्षों के सबूतों की गहन जांच करने के बाद आयोग ने पाया कि कंपनी ने सभी संबंधित रिकॉर्ड प्राप्त करने के बावजूद बार-बार दस्तावेजों की मांग की, वह भी बिना यह बताए कि असल में किस कागज की कमी है।

आयोग ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कंपनी को कोई अतिरिक्त मेडिकल स्पष्टीकरण चाहिए था, तो वह सीधे इलाज करने वाले डॉक्टरों से भी संपर्क कर सकती थी। आयोग ने माना कि बार-बार पत्राचार करने का कंपनी का एकमात्र उद्देश्य शायद शिकायतकर्ता को परेशान करना था।

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि महिला को एक थर्ड-पार्टी रजिस्ट्री का रास्ता दिखाने और बाद में अपने ही बनाए मुआवजे के नियम को मानने से इनकार करके कंपनी ने सेवा में एक बहुत ही गंभीर लापरवाही बरती है।

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, नवसारी सीडीआरसी ने कंपनी को सख्त निर्देश दिया कि वह महिला को 9% वार्षिक ब्याज के साथ 20 लाख रुपये की राशि का भुगतान करे। इसके अलावा, महिला को हुई मानसिक पीड़ा, शारीरिक कष्ट और अदालती खर्च की भरपाई के लिए 50,000 रुपये का अतिरिक्त मुआवजा देने का भी आदेश दिया गया है।

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