जिस उम्र में आमतौर पर बच्चे गिनती बोलना सीखते हैं, उस उम्र में अर्जुन विशाल प्रजापति यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि संख्याएं कभी खत्म क्यों नहीं होतीं। चार साल का यह बच्चा बिग बैंग से पहले क्या था, या फिर अनंत (इनफिनिटी) में से अनंत घटाने पर क्या बचेगा, जैसे ऐसे सवाल पूछता है जो अक्सर बड़ों को भी सोच में डाल देते हैं।
अपनी इसी अद्भुत जिज्ञासा और प्रतिभा के दम पर वडोदरा मूल के 4 वर्षीय अर्जुन ने दुनिया की सबसे पुरानी आईक्यू सोसाइटी ‘मेंसा’ (Mensa) और एक अन्य बेहद प्रतिष्ठित संस्था ‘इंटर्टेल’ (Intertel) की सदस्यता हासिल कर ली है।
मेंसा में केवल उन्हीं लोगों को जगह मिलती है जो मान्यता प्राप्त इंटेलिजेंस टेस्ट में शीर्ष 2 प्रतिशत में आते हैं। वहीं, इंटर्टेल इससे भी अधिक विशिष्ट संस्था है, जो आमतौर पर केवल शीर्ष 1 प्रतिशत वाले लोगों को ही स्वीकार करती है।
इन प्रतिष्ठित संस्थाओं की सदस्यता किसी अकादमिक उपलब्धि के आधार पर नहीं, बल्कि कड़ी निगरानी में होने वाले साइकोमेट्रिक असेसमेंट के आधार पर दी जाती है। यही वजह है कि महज 4 साल की उम्र में इन दोनों संस्थाओं में एक साथ जगह बनाना एक बेहद दुर्लभ और असाधारण उपलब्धि मानी जाती है।
अर्जुन ने स्टैनफोर्ड-बिने इंटेलिजेंस स्केल, पांचवें संस्करण (SB5) में 141 का फुल स्केल आईक्यू (FSIQ) स्कोर हासिल किया, जो उन्हें 99.7वें पर्सेंटाइल में रखता है। उनका वर्किंग मेमोरी इंडेक्स 146 (99.9वें पर्सेंटाइल से ऊपर) था, जबकि उनका नॉनवर्बल आईक्यू 149 (99.99वें पर्सेंटाइल से ऊपर) दर्ज किया गया।
कनाडा में लाइसेंस प्राप्त क्लीनिकल मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस असेसमेंट ने अर्जुन को असाधारण रूप से प्रतिभाशाली बच्चों के लिए चलाए जाने वाले ‘डेविडसन यंग स्कॉलर्स’ कार्यक्रम के लिए भी योग्य बना दिया है। हालांकि, ये शानदार आंकड़े अर्जुन की प्रतिभा की सिर्फ एक छोटी सी झलक मात्र हैं।
उनके माता-पिता बताते हैं कि स्कूल जाने से काफी पहले ही उनमें सीखने की गजब की ललक दिखने लगी थी। मात्र 18 महीने की उम्र में ही अर्जुन ने खुद से पढ़ना शुरू कर दिया था। जब वह दो साल के हुए, तब तक वह सड़क के साइनबोर्ड, रेस्तरां के मेन्यू और नक्शे आसानी से पढ़ने लगे थे।
गणित अर्जुन का सबसे पसंदीदा विषय है। जहां इस उम्र के बच्चे एक से दस तक गिनना सीखते हैं, वहीं अर्जुन को 20 तक के पहाड़े याद हैं। वह ऐसे न्यूमेरिकल पैटर्न और गणितीय अवधारणाओं को आसानी से हल कर लेते हैं, जो आमतौर पर पांचवीं कक्षा के बच्चों को पढ़ाए जाते हैं। वह केवल सवालों के जवाब ही नहीं ढूंढ़ते, बल्कि संख्याएं इस तरह से क्यों काम करती हैं, यह समझना उन्हें ज्यादा रोमांचित करता है।
उनकी यह गहरी जिज्ञासा केवल गणित तक ही सीमित नहीं है। वह यह भी जानना चाहते हैं कि मानव शरीर में ऑक्सीजन कैसे प्रवाहित होती है, सम और विषम संख्याएं अलग-अलग तरह से व्यवहार क्यों करती हैं, और ब्लैक होल या गहरे अंतरिक्ष जैसे रहस्यों के पीछे का विज्ञान क्या है।
अर्जुन की यह लगन उन्हें क्लासरूम की पढ़ाई से बहुत आगे ले गई है। वर्तमान में वह नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के माध्यम से प्रतिभाशाली बच्चों के लिए बनाए गए शिक्षा पाठ्यक्रम से जुड़े हैं, जहां वह सेलुलर बायोलॉजी और मानव शरीर विज्ञान (ह्यूमन फिजियोलॉजी) का अध्ययन कर रहे हैं।
पढ़ाई के अलावा उन्हें फुटबॉल, बास्केटबॉल, तैराकी, योग और पेंटिंग का भी काफी शौक है। इसके साथ ही, वह पियानो बजाने के अलावा फ्रेंच और स्पेनिश भाषाएं भी सीख रहे हैं।
अर्जुन के पिता डॉ. विशाल वी. प्रजापति वडोदरा के एक फिजिशियन हैं, और उनकी मां महिता एक वकील हैं। महिता ने नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया से पढ़ाई करने के बाद अमेरिका से एलएलएम (LLM) की डिग्री हासिल की है। इस दंपति का कहना है कि उन्होंने जानबूझकर अपने बेटे पर कभी भी पढ़ाई का कोई दबाव नहीं डाला।
डॉ. प्रजापति बताते हैं कि उन्होंने कभी अर्जुन से कुछ असाधारण बनने की मांग नहीं की। माता-पिता के रूप में उनकी भूमिका केवल उसे किताबें, म्यूजियम के दौरे, ज्ञानवर्धक बातचीत और नई चीजों को एक्सप्लोर करने के अवसर प्रदान करने की रही है। उनकी मानें तो अर्जुन की ‘जिज्ञासा’ ही उसकी सबसे बड़ी शिक्षक रही है।
नन्हें अर्जुन का सपना बड़ा होकर एक फिजिशियन-साइंटिस्ट बनने का है, ताकि वह चिकित्सा और रिसर्च दोनों को एक साथ जोड़ सकें। तब तक, वह उन सवालों के जवाब तलाशने में व्यस्त हैं, जिनके बारे में अक्सर लोग सोचने का विचार भी नहीं करते।
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