सूरत में भारी बारिश और बाढ़ जैसे गंभीर हालातों के बीच प्रशासन और मेडिकल टीमों ने एक असंभव सी लगने वाली चुनौती को मुमकिन कर दिखाया है। भारत के चिकित्सा इतिहास में पहली बार एक जीवित मानव हृदय को ट्रेन के जरिए एक शहर से दूसरे शहर तक पहुंचाया गया है। सूरत से अहमदाबाद तक का यह अहम सफर वंदे भारत एक्सप्रेस के माध्यम से तय किया गया। इस बेहद संवेदनशील और समयबद्ध अभियान को महज 217 मिनट में पूरा कर लिया गया, जिससे हृदय को सुरक्षित प्रत्यारोपण के लिए निर्धारित समय सीमा के भीतर अस्पताल पहुंचाया जा सका।
इस बहुमूल्य अंगदान की शुरुआत सूरत के न्यू सिविल अस्पताल (एनसीएच) से हुई। मूल रूप से ओडिशा के रहने वाले और सूरत जिले के कीम इलाके में रह रहे एक 36 वर्षीय कपड़ा मजदूर ने जाते-जाते चार लोगों को नया जीवन दे दिया। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, इस अंगदान प्रक्रिया में हृदय के साथ-साथ दो किडनी और एक लिवर भी दान किया गया। यह एनसीएच सूरत द्वारा संपन्न कराया गया 96वां सफल अंगदान था।
अस्पताल के अधिकारियों ने बताया कि यह मजदूर 28 जुलाई को अपने किराए के मकान में अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गया था। उसकी हालत बहुत तेजी से बिगड़ने लगी, उसका चेहरा एक तरफ मुड़ गया और हाथ-पैरों ने काम करना बंद कर दिया। प्राथमिक उपचार के लिए उसे पास के अस्पताल ले जाया गया, जिसके बाद बेहतर इलाज के लिए 108 एंबुलेंस की मदद से एनसीएच सूरत लाया गया। लगातार कोशिशों के बावजूद 30 जुलाई को डॉक्टरों की एक विशेषज्ञ टीम ने उसे ब्रेन-डेड घोषित कर दिया। इस टीम में रेजिडेंट मेडिकल ऑफिसर (आरएमओ) केतन नाइक, प्लास्टिक सर्जन नीलेश कछड़िया, न्यूरोलॉजिस्ट प्रयाग मकवाना और न्यूरोसर्जन केयूर प्रजापति शामिल थे।
मरीज को ब्रेन-डेड घोषित किए जाने के बाद अंगदान चैरिटेबल ट्रस्ट, स्वयंसेवक इकबाल कड़ीवाला और काउंसलर निर्मला कत्थुड़े ने शोक संतप्त परिवार से बात की और उन्हें अंगदान के महान महत्व के बारे में समझाया। परिवार की सहमति के बाद लिवर और दोनों किडनी को सड़क मार्ग से अहमदाबाद के इंस्टीट्यूट ऑफ किडनी डिजीज एंड रिसर्च सेंटर (IKDRC) भेजा गया। वहीं, हृदय को विशेष इंतजामों के साथ ट्रेन से यूएन मेहता इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोलॉजी एंड रिसर्च सेंटर ले जाया गया।
भारतीय रेलवे ने इस पूरे ऑपरेशन की सफलता का श्रेय रेलवे, गुजरात राज्य पुलिस, रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) और मेडिकल टीमों के बीच हुए बेहतरीन तालमेल को दिया है। ट्रेन के अहमदाबाद रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 1 पर पहुंचते ही आरपीएफ और गुजरात पुलिस ने तुरंत एक ‘ग्रीन कॉरिडोर’ बनाया। इसकी मदद से बिना किसी रुकावट के हृदय को जल्द से जल्द यूएन मेहता इंस्टीट्यूट तक पहुंचा दिया गया।
इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने भी खुशी जाहिर की। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए भारतीय रेलवे, आरपीएफ, गुजरात पुलिस और डॉक्टरों की टीम को बधाई दी। मुख्यमंत्री ने लिखा कि अंग प्रत्यारोपण में एक-एक सेकंड कीमती होता है और वंदे भारत एक्सप्रेस की तेज रफ्तार के कारण ही कुछ घंटों में यह जीवन रक्षक प्रयास सफल हो सका। उन्होंने यूएन मेहता इंस्टीट्यूट के डॉक्टरों की टीम को 77 सफल हृदय प्रत्यारोपण ऑपरेशन पूरे करने पर भी शुभकामनाएं दीं।
इस पूरी प्रक्रिया की जटिलता को समझाते हुए आरएमओ डॉ. नाइक ने बताया कि लिवर और किडनी की तुलना में शरीर के बाहर निकाले गए हृदय के जीवित रहने की समय सीमा काफी कम होती है। आमतौर पर हृदय को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए सड़क मार्ग से बचा जाता है। ऐसे में ट्रेन के जरिए इसका सफल परिवहन इस अभियान से जुड़े हर व्यक्ति के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।
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