गुजरात में शेरों और इंसानों के बीच संघर्ष की घटनाएं लगातार गंभीर रूप लेती जा रही हैं। हाल ही में खंभा तालुका के चातुरी गांव में एक दर्दनाक हादसा हुआ, जहां एक शेरनी ने पांच साल के मासूम बच्चे को अपना शिकार बना लिया। 24 जून की रात को यह बच्चा अपने दादा की उंगली पकड़कर दूध देने जा रहा था। तभी अचानक झाड़ियों से निकलकर एक शेरनी ने उस पर झपट्टा मारा और उसे घसीटते हुए जंगल की तरफ ले गई।
चीख-पुकार सुनकर गांव वाले लाठियां लेकर दौड़े, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। काफी खोजबीन के बाद गांव से करीब एक किलोमीटर दूर बच्चे के अवशेष बरामद किए गए। यह दिल दहला देने वाली घटना इस महीने शेरों के हमले में हुई कई मौतों में से एक है।
लगातार बढ़ रहे हमले और जानमाल का नुकसान
यह मौत इस महीने मानव-शेर संघर्ष से जुड़ी पांचवीं इंसानी जान जाने की घटना है। गुजरात के पीसीसीएफ (वन्यजीव) जयपाल सिंह ने बताया कि इनमें से दो मौतें अभी संदिग्ध हैं और उनकी गहन जांच चल रही है। जिन मामलों में शेरों के हमले की पुष्टि हुई है, वहां पीड़ितों के शवों को शेरों द्वारा आंशिक रूप से खाया हुआ पाया गया है।
अन्य घटनाओं में 16 जून को राजूळा तालुका के कोवाया गांव के पास हुआ हमला भी शामिल है। यहां उत्तराखंड के रहने वाले एक 25 वर्षीय प्रवासी होटल कर्मचारी को शेरों ने मार डाला था। अगले दिन उसका कटा हुआ सिर और शरीर के कुछ हिस्से ही बरामद हो सके थे। इसके अलावा अमरेली जिले के बगसरा और सावरकुंडला, तथा भावनगर जिले के महुआ से भी ऐसी ही मौतों की खबरें सामने आई हैं।
इन पांच मौतों के सिलसिले में वन विभाग ने अब तक 10 शेरों को पकड़ा है। वन्यजीव अधिकारी सिंह के अनुसार, इनमें से तीन शेरों को पिंजरे में ही रखे जाने की संभावना है। एहतियात के तौर पर, इंसानों का शिकार करने वाले शेरों को आमतौर पर वापस जंगल में रिहा नहीं किया जाता है।
मौसम की मार और चिड़चिड़े होते शेर
वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हमलों में इस अचानक हुई वृद्धि का एक बड़ा कारण मौसम भी है। सालों से गिर क्षेत्र, विशेषकर जूनागढ़ और आसपास के इलाकों में मानसून से पहले बारिश होती रही है। लेकिन इस साल मानसून में देरी हुई, जिससे गर्मी का प्रकोप लंबा और कठोर हो गया।
शेर लगभग 35 डिग्री सेल्सियस तापमान में सबसे अधिक सहज महसूस करते हैं, लेकिन गर्मी के इस लंबे दौर ने उन्हें काफी चिड़चिड़ा बना दिया है। ऐसे मुश्किल हालात में जब इंसान उनके इलाके में जाते हैं या उन्हें परेशान करते हैं, तो शेरों के हमला करने की आशंका बहुत बढ़ जाती है।
अवैध ‘लायन शो’ और सिकुड़ते जंगल
अमरेली में इंसानों की मौतों में हुए भारी इजाफे के पीछे अवैध ‘लायन शो’ और शेरों को परेशान करने की घटनाओं को भी मुख्य कारण माना जा रहा है। जूनागढ़ या भावनगर की तुलना में अमरेली जिले में ऐसी अवैध गतिविधियां कहीं ज्यादा आम हैं। इसके साथ ही, गिर और शेर बहुल क्षेत्रों के आसपास हो रहे अवैध अतिक्रमण के कारण शेरों और इंसानी बस्तियों के बीच का बफर जोन (सुरक्षित दूरी) लगातार सिकुड़ रहा है।
आंकड़ों के अनुसार, इस पूरे क्षेत्र में हर साल शेरों और तेंदुओं के हमलों में औसतन 20 से 30 लोगों की जान जाती है, जिनमें से करीब 40 प्रतिशत मामलों के लिए शेर जिम्मेदार होते हैं।
पिछले साल मई में अमरेली जिले के लाठी तालुका में 21 साल के एक मालधारी युवक की मौत हो गई थी। वन अधिकारियों का मानना था कि यह शेरों का हमला था, जिसे रिजर्व फॉरेस्ट इलाके में पीड़ित और उसके समूह द्वारा आयोजित किए जाने वाले अवैध लायन शो से जोड़ा गया था। इसके अलावा, 25 जून को वन अधिकारियों ने 7-8 महीने के एक नर एशियाई शेर शावक की मौत के सिलसिले में एक व्यक्ति को पकड़ा।
जूनागढ़ के पास रबारी नेस इलाके में मृत पाए गए इस शावक के सिर पर लगी चोटें इंसानी क्रूरता की ओर इशारा कर रही थीं। विशेषज्ञों का कहना है कि शेरों के हमले की ऐसी कई घटनाएं दर्ज ही नहीं हो पातीं, जिनमें पीड़ित बच जाते हैं, क्योंकि लोग कानूनी कार्रवाई से डरते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2022-23 में गुजरात में 12 अवैध लायन शो आयोजित किए गए थे।
बढ़ती आबादी और नया ठिकाना खोजते शेर
कोर गिर परिदृश्य की क्षमता लगभग 350 शेरों को आश्रय देने की है। लेकिन 2025 की जनगणना के अनुसार, गुजरात में एशियाई शेरों की कुल आबादी 891 तक पहुंच गई है। क्षमता से अधिक आबादी होने के कारण बड़ी संख्या में शेर अपने मूल निवास स्थान से बाहर निकलकर आसपास के मानव बहुल इलाकों में फैल रहे हैं। अकेले अमरेली जिले में लगभग 350 एशियाई शेर हैं, जिनमें से कई ऊना से महुआ तक पहाड़ियों, गलियारों और तटीय इलाकों में फैल गए हैं। शेरों के इस फैलाव ने उन्हें इंसानी बस्तियों और खेतों के बहुत करीब ला दिया है।
क्या कहते हैं वन्यजीव विशेषज्ञ?
वन्यजीव फोटोग्राफर और राज्य वन्यजीव बोर्ड समिति के पूर्व सदस्य भूषण पंड्या ने बताया कि गुजरात में शेरों या तेंदुओं के कारण होने वाली कई मौतों में खेत मजदूर शामिल होते हैं। गिर में अवैध रिसॉर्ट और होटल शेरों के कॉरिडोर को रोक रहे हैं। उन्होंने पिपावाव के पास हुए हालिया हमले का जिक्र करते हुए कहा कि यह तब हुआ जब लोगों ने ‘प्रोसोपिस जूलिफ्लोरा’ की घनी झाड़ियों में आराम कर रहे शेरों को परेशान किया। उन्होंने एक रैपिड रिस्पांस टीम और आपातकालीन हेल्पलाइन की मांग की है।
शेर शोधकर्ता और रेडियोलॉजिस्ट डॉ. जलपन रूपापरा ने कहा कि गर्मी के कारण शेरों के व्यवहार पर बहुत असर पड़ता है। इंसान उनका स्वाभाविक भोजन नहीं हैं, लेकिन बढ़ती आबादी ने उनके व्यवहार में बदलाव ला दिया है।
कंजर्वेशन बायोलॉजी में प्रकाशित 2024 के अध्ययन ‘डेसिफरिंग द एनिग्मा ऑफ ह्यूमन-लायन कोएग्जिस्टेंस इन इंडिया’ के सह-लेखक और प्रमुख विशेषज्ञ वाई वी झाला के अनुसार, शेर आमतौर पर उन इलाकों से बचते हैं जहां इंसानी गतिविधियां अधिक होती हैं। वे दिन में खेतों और छोटी वनस्पतियों के बीच छिपकर आराम करते हैं और कई घंटों तक किसानों या उनके मवेशियों के करीब रहने के बावजूद आक्रामक नहीं होते। वे शायद ही कभी इंसानों को अपना शिकार मानते हैं।
उनके अध्ययन में यह भी बताया गया है कि अफ्रीकी शेरों की तुलना में भारत में हमले की दर काफी कम है। तंजानिया के समान मानव बहुल क्षेत्रों में शेरों द्वारा प्रति माह चार से अधिक हमले (भारत की तुलना में दोगुने) दर्ज किए गए हैं।
बचाव के प्रयास और ‘प्रोजेक्ट लायन’ की भूमिका
हालात को काबू में करने के लिए वन अधिकारी मवेशियों के नुकसान के लिए लोगों को मुआवजा दे रहे हैं। साथ ही ग्रामीणों को अंधेरा होने के बाद अकेले बाहर न निकलने की सलाह जारी की जा रही है।
इस बीच, एशियाई शेरों के संरक्षण और उनकी आबादी के विस्तार के लिए केंद्र सरकार की 2021 की पहल ‘प्रोजेक्ट लायन’ पर काम चल रहा है। पोरबंदर से 15 किलोमीटर और गिर राष्ट्रीय उद्यान से 100 किलोमीटर दूर स्थित बरड़ा वन्यजीव अभयारण्य इस प्रोजेक्ट का एक प्रमुख हिस्सा है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने बरड़ा को एशियाई शेरों के लिए एक उपयुक्त प्राकृतिक आवास के रूप में चुना है। ऐतिहासिक रूप से बरड़ा में शेर रहा करते थे, लेकिन 1879 में वे वहां से पूरी तरह विलुप्त हो गए थे। वर्तमान में बरड़ा में 24 शेर हैं, जबकि वन अधिकारियों के अनुसार इस जंगल में 100 शेरों को आसानी से रखा जा सकता है। भविष्य में यह अभयारण्य बढ़ते मानव-शेर संघर्ष को कम करने में एक अहम भूमिका निभा सकता है।
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