गुजरात की महिलाओं के लिए अब शादी कोई तत्काल या अनिवार्य लक्ष्य नहीं रह गया है। बदलते वक्त के साथ कई युवतियां जहां अपनी शादी को टाल रही हैं, वहीं एक बड़ी संख्या ऐसी भी है जो पूरी तरह से सिंगल रहने का विकल्प चुन रही है। सरकारी आंकड़े भी इस बड़े सामाजिक बदलाव की गवाही दे रहे हैं।
उच्च शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और करियर की नई उड़ान ने समाज में शादी की उस पुरानी सोच को बदल कर रख दिया है। अब यह धारणा टूट रही है कि महिलाओं को एक तय उम्र में शादी कर ही लेनी चाहिए।
सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) की ‘स्टैटिस्टिकल रिपोर्ट 2024’ के आंकड़े इस दिशा में बेहद चौंकाने वाले हैं। रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात में 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र की ‘कभी शादी न करने वाली महिलाओं’ की हिस्सेदारी 2014 में 18.2 प्रतिशत थी। साल 2024 में यह आंकड़ा बढ़कर 27.8 प्रतिशत तक पहुंच गया है। महज एक दशक के भीतर इस आंकड़े में करीब 10 प्रतिशत का भारी उछाल दर्ज किया गया है।
यह ट्रेंड इसलिए भी हैरान करता है क्योंकि इसी अवधि में राज्य में कामकाजी उम्र की महिलाओं की आबादी में मामूली वृद्धि ही दर्ज की गई है। यह आंकड़ा 64.9 प्रतिशत से बढ़कर 66 प्रतिशत ही हुआ है। इससे यह साफ हो जाता है कि अविवाहित महिलाओं की संख्या में हुई यह बढ़ोतरी किसी जनसंख्या बदलाव का नतीजा नहीं है। बल्कि यह महिलाओं के अपने जीवन से जुड़े सामाजिक और व्यक्तिगत विकल्पों का परिणाम है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ये आंकड़े एक व्यापक सामाजिक बदलाव को दर्शाते हैं। शहरीकरण और रोजगार के बढ़ते अवसरों ने इस प्रक्रिया को रफ्तार दी है। इसी वजह से पारंपरिक तौर पर शादी करने और परिवार शुरू करने की समयसीमा अब धीरे-धीरे बदल रही है।
रिपोर्ट में शिक्षा और बदलते पारिवारिक ढांचे के बीच के गहरे संबंध पर भी रोशनी डाली गई है। पूरे भारत में यह देखा जा रहा है कि स्नातक या उससे अधिक की शिक्षा हासिल करने वाली महिलाओं में प्रजनन दर रिप्लेसमेंट लेवल (प्रतिस्थापन स्तर) से काफी नीचे आ गई है। यह सीधे तौर पर देरी से होने वाली शादी और छोटे होते परिवारों का संकेत है।
गुजरात इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च (जीआईडीआर) की मानद प्रोफेसर डॉ. लीला विसारिया इस विषय पर अहम जानकारी देती हैं। उनका कहना है कि शादी की उम्र स्पष्ट रूप से बढ़ी है और इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह शिक्षा है। गुजरात भर के कॉलेजों में आर्ट्स, कॉमर्स और साइंस जैसे सभी स्ट्रीम्स में लड़कियों के दाखिले काफी तेजी से बढ़े हैं।
डॉ. विसारिया के मुताबिक जैसे-जैसे महिलाएं उच्च शिक्षा की ओर कदम बढ़ा रही हैं, शादी की उम्र अपने आप आगे खिसकती जा रही है। शिक्षा ने महिलाओं की निर्णय लेने की क्षमता को बेहद मजबूत किया है। आज की महिलाएं आर्थिक रूप से कहीं अधिक स्वतंत्र हैं और जीवनसाथी चुनने के मामले में काफी सोच-समझकर कदम उठाती हैं।
वे केवल सामाजिक दबाव में जल्दी शादी करने के बजाय सही जीवनसाथी के लिए इंतजार करना बेहतर समझती हैं। समाजशास्त्रियों का भी कहना है कि यह बदलाव खासतौर पर गुजरात के शहरों में ज्यादा दिख रहा है। यहां की महिलाएं अब विवाह से पहले अपने करियर, वित्तीय स्थिरता और निजी आजादी को सबसे ऊपर रख रही हैं।
अहमदाबाद के जाने-माने समाजशास्त्री गौरांग जानी बताते हैं कि शहरी इलाकों में कामकाज कई महिलाओं के लिए पहचान का एक अहम जरिया बन गया है। वित्तीय स्वतंत्रता ने विवाह को लेकर महिलाओं के नजरिए को पूरी तरह से बदल दिया है। अधिक से अधिक महिलाएं अब प्राइवेट सेक्टर की नौकरियों और नए प्रोफेशन में जा रही हैं, जहां काम के घंटे लंबे या अनियमित होते हैं।
गौरांग जानी के अनुसार कई महिलाओं ने शादी के बाद अपनी सहेलियों या रिश्तेदारों को करियर और आजादी से समझौता करते हुए देखा है। इस अनुभव ने उन्हें विवाह की दिशा में कदम बढ़ाने से पहले और ज्यादा सतर्क कर दिया है।
अगर पूरे भारत के परिदृश्य की बात करें, तो 2024 में 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र की अविवाहित महिलाओं का राष्ट्रीय अनुपात 28.2 प्रतिशत दर्ज किया गया है। यह गुजरात के 27.8 प्रतिशत के आंकड़े के बेहद करीब है। इससे यह बात साफ होती है कि गुजरात भी उसी सामाजिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है, जो आर्थिक रूप से तेजी से आगे बढ़ रहे देश के अन्य हिस्सों में देखने को मिलता है।
शहरों में अब सिंगल रहने का विकल्प चुनने वाली महिलाओं को अधिक स्वीकार्यता मिल रही है। खासतौर पर शहरी परिवेश में अब विवाह को जीवन का इकलौता मकसद नहीं माना जाता। समाज और कार्यस्थलों पर अब उन महिलाओं को आसानी से अपनाया जा रहा है जो शादी में देरी करती हैं या बिल्कुल भी शादी न करने का फैसला लेती हैं।
पारंपरिक रूप से गुजरात के पारिवारिक और सामाजिक जीवन में शादी का हमेशा से एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है। लेकिन नवीनतम जनसांख्यिकीय संकेत बताते हैं कि भले ही शादी का सामाजिक महत्व कायम है, लेकिन महिलाओं की शादी की उम्र और उससे जुड़ी उम्मीदें लगातार बदल रही हैं।
डॉ. विसारिया का कहना है कि अब महिलाओं के लंबे समय तक अविवाहित रहने को लेकर समाज का नजरिया उदार हो रहा है। हम यह भी देख रहे हैं कि तलाकशुदा महिलाएं भी तेजी से सिंगल रहने का विकल्प चुन रही हैं। शिक्षा, जागरूकता और वित्तीय स्वतंत्रता ने शादी, रिश्तों और व्यक्तिगत विकल्पों को देखने का महिलाओं का तरीका पूरी तरह से बदल दिया है।
यह भी पढ़ें-
गांधीनगर के इन्फोसिटी प्रोजेक्ट की लीज नहीं बढ़ाएगी गुजरात सरकार, 2030 में वापस लेगी 116 एकड़ जमीन










