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क्या नागरिकों को गुलाम बनाया जा रहा है? सरकार के विरोध पर केस थोपने पर बॉम्बे हाई कोर्ट की कड़ी फटकार

| Updated: July 3, 2026 14:16

बॉम्बे हाई कोर्ट ने मुंबई पुलिस को कड़ी फटकार लगाते हुए स्पष्ट किया है कि सरकारी फैसलों का विरोध करना या 'मुर्दाबाद' के नारे लगाना तड़ीपार करने का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने पूछा- क्या असहमति जताने पर नागरिकों को सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है?

बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अहम और सख्त फैसले में मुंबई पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए पूछा है कि क्या सरकार के फैसलों का विरोध करने पर नागरिकों पर मुकदमे दर्ज करके उन्हें गुलाम बनाया जा रहा है।

जस्टिस माधव जे जामदार की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल विरोध प्रदर्शन करने या ‘मुर्दाबाद’ के नारे लगाने के आधार पर किसी भी व्यक्ति को तड़ीपार नहीं किया जा सकता।

अदालत ने केंद्र की भाजपा नीत सरकार के कुछ फैसलों का विरोध करने पर एक राजनीतिक कार्यकर्ता को दिए गए तड़ीपार के आदेश को सिरे से रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि महज मोर्चा निकालना या असहमति जताना ऐसा अपराध नहीं है जिसके लिए किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन किया जाए।

यह पूरा मामला 49 वर्षीय सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी की याचिका से जुड़ा है। चौधरी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के महासचिव हैं, जिन्हें मुंबई पुलिस ने एक साल के लिए शहर से तड़ीपार कर दिया था।

सुनवाई के दौरान जस्टिस जामदार ने पुलिस प्रशासन से पूछा कि आखिर नागरिकों को प्रदर्शन करने और अपनी आवाज उठाने का अधिकार क्यों नहीं है। अदालत ने इस बात पर गहरी हैरानी जताई कि पुलिस ने ‘बीजेपी सरकार मुर्दाबाद’ और ‘अमित शाह मुर्दाबाद’ जैसे नारे लगाने को तड़ीपार करने का आधार बना लिया।

हाल ही में हुए परीक्षा पेपर लीक मामले और याचिकाकर्ता की दलीलों का हवाला देते हुए जज ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध जताना नागरिकों का अधिकार है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि महज नारे लगाने पर किसी के खिलाफ तड़ीपार जैसी सख्त कार्रवाई कैसे की जा सकती है।

हाई कोर्ट ने पुलिस महकमे को कड़ी चेतावनी देते हुए उनकी जिम्मेदारियों का अहसास भी कराया। जज ने पुलिस को याद दिलाया कि वे आम जनता के सेवक हैं, न कि सरकार के शीर्ष पदाधिकारियों के।

याचिकाकर्ता चौधरी ने पुलिस उपायुक्त (जोन 6- चेंबूर क्षेत्र) द्वारा 3 दिसंबर 2025 को पारित किए गए तड़ीपार के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। इस आदेश के जरिए उन्हें एक साल के लिए बाहर कर दिया गया था।

याचिका में बताया गया कि इस कार्रवाई की शुरुआत अक्टूबर 2025 में मिले एक कारण बताओ नोटिस से हुई थी। पुलिस ने 2019 से 2024 के बीच हुए विभिन्न विरोध प्रदर्शनों को लेकर दर्ज की गई कई एफआईआर को इस नोटिस का आधार बनाया था।

चौधरी का आरोप था कि उन्हें आगामी निकाय चुनावों की प्रक्रिया से दूर रखने के लिए जानबूझकर निशाना बनाया गया, जो सीधे तौर पर लोकतांत्रिक असहमति को कुचलने का प्रयास है।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील पयोशी रॉय और इब्राहिम हरबत ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 188 के तहत मामले दर्ज किए गए थे। ये सभी मामले सीएए, एनआरसी, बाबरी मस्जिद और ज्ञानवापी मस्जिद की सीलिंग जैसे ज्वलंत मुद्दों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने से जुड़े थे।

बचाव पक्ष के वकीलों ने दलील दी कि इनमें से कोई भी मामला महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धारा 56 की शर्तों को पूरा नहीं करता। यह धारा पुलिस को केवल उस स्थिति में तड़ीपार करने का अधिकार देती है, जब किसी व्यक्ति से समाज, जान या संपत्ति को गंभीर खतरा हो।

वकील रॉय ने तर्क दिया कि चौधरी को अपनी बेगुनाही साबित करने का कोई मौका दिए बिना ही, सिर्फ प्रदर्शनों में हिस्सा लेने के कारण सजा दे दी गई।

वहीं, राज्य सरकार के वकील ने अपनी दलील में कहा कि प्रदर्शनकारियों ने भड़काऊ नारे लगाए थे और पुलिस की अनुमति न मिलने के बावजूद विरोध प्रदर्शन आयोजित किए गए थे, इसलिए यह कार्रवाई पूरी तरह कानून के दायरे में है।

इसी दौरान देश भर में चल रही राजनीतिक उठापटक और विधायकों की ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ का जिक्र करते हुए जस्टिस जामदार ने हल्के-फुल्के अंदाज में एक तंज भी कसा। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता भी ‘वाशिंग मशीन’ के जरिए अपना पाला बदलने पर विचार कर सकता था।

अपने विस्तृत आदेश में जस्टिस जामदार ने मुंबई पुलिस की इस कार्रवाई को पूरी तरह से दुर्भावनापूर्ण करार दिया। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत देश के हर नागरिक को अपनी राय स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने और सम्मान के साथ जीने का अधिकार प्राप्त है।

जज ने रिकॉर्ड का मुआयना करने के बाद पाया कि ऐसा कोई भी सुबूत मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता के किसी भी कदम से किसी व्यक्ति या संपत्ति को कोई नुकसान पहुंचने की आशंका थी।

अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि आईपीसी की धारा 188 के तहत अधिकतम सजा केवल एक महीने की कैद है। इस छोटे अपराध को आधार बनाकर महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत तड़ीपार करने जैसा कठोर आदेश पारित नहीं किया जा सकता।

जस्टिस जामदार ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के पूर्व के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि तड़ीपार करना एक बेहद असाधारण कदम है, जो एक नागरिक से देश में कहीं भी अबाध रूप से घूमने का उसका मौलिक अधिकार छीन लेता है।

तड़ीपार की कार्रवाई को रद्द करते हुए पीठ ने अपना फैसला सुनाया कि भारत सरकार के कुछ फैसलों का विरोध करने मात्र से किसी नागरिक को तड़ीपार कर देना, उसके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सम्मान के साथ जीवन जीने के मौलिक अधिकारों पर सीधा और गंभीर प्रहार है।

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