भारत के गृह मंत्री के रूप में सरदार वल्लभभाई पटेल ने कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर प्रतिबंध लगाया था। आज के भारत में आरएसएस के उस रहस्यमयी और अपारदर्शी चरित्र के बारे में सरदार पटेल के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंक खरगे भारत के ‘लौह पुरुष’ की उस शक्तिशाली छवि पर खरे उतर पाएंगे और आरएसएस को एक बार फिर जवाबदेह बना पाएंगे?
हालांकि, उस दौर और आज के हालातों में एक बड़ा और स्पष्ट अंतर है। साल 1948 में आरएसएस महज एक आम संगठन था। भले ही उसके पास एक ठीक-ठाक समर्थक आधार था, लेकिन उसकी कोई बड़ी राजनीतिक हैसियत नहीं थी। यही वजह थी कि जब सरदार पटेल ने आरएसएस को गैरकानूनी घोषित किया, तो कोई भी राजनीतिक दल इसके विरोध में आगे नहीं आया। हकीकत तो यह है कि देश के अधिकांश लोगों ने इस फैसले का स्वागत किया था।

लेकिन आज, साल 2026 में परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। आज आरएसएस का भारत सरकार पर सीधा नियंत्रण है। उसने कभी अपने प्रचारक रहे नरेंद्र मोदी को देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाया है। आज सत्ताधारी खेमे में मौजूद हर प्रभावशाली व्यक्ति नियमित रूप से संघ परिवार के प्रति अपनी अटूट निष्ठा व्यक्त करता नजर आता है।
ऐसी स्थिति में आरएसएस पर प्रतिबंध लगाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं दिखता। इसलिए आज जो करने की जरूरत है, वह यह है कि इस गुप्त संगठन के भीतर चल रही गतिविधियों को उजागर किया जाए। देश के लोगों को यह याद दिलाने की आवश्यकता है कि कैसे सरदार पटेल ने इस अपारदर्शी संगठन के संदिग्ध चरित्र को भांप लिया था और बिना किसी झिझक के अपनी बात रखी थी। आरएसएस के धुंधले अतीत और उसके संदिग्ध वर्तमान पर एक नई बहस शुरू करने के लिए प्रियंक खरगे की सराहना की जानी चाहिए।
राजनीतिक रसूख ने आरएसएस को कानूनी बंधनों से किया मुक्त
आरएसएस का अतीत वास्तव में विवादों से घिरा रहा है और इसका राष्ट्रविरोधी चरित्र हमारे देश के स्वतंत्रता सेनानियों के सामने पूरी तरह स्पष्ट था। जब महात्मा गांधी के आह्वान पर देश के लाखों लोग ब्रिटिश हुकूमत से आजादी पाने के लिए अपनी जान और आजीविका कुर्बान कर रहे थे, उस समय आरएसएस के लोग खुलेआम और बिना किसी संकोच के औपनिवेशिक आकाओं के मददगार बने हुए थे। अंग्रेज स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यकर्ताओं की जासूसी करने के लिए आरएसएस का इस्तेमाल करते थे। संघ ने गांधी जी को मुसलमानों का तुष्टिकरण करने वाला और हिंदुओं का दुश्मन तक करार दिया था।
यही कारण है कि जब एक कट्टपंथी और मुस्लिम विरोधी हिंदू महासभा के कार्यकर्ता नथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या की, तो आरएसएस की भूमिका तुरंत जांच के दायरे में आ गई। उस समय कानूनी कार्रवाई और जनता के गुस्से से बचने के लिए आरएसएस के चालाक प्रमुख एम.एस. गोलवलकर ने एक शोक संदेश जारी किया। उन्होंने लिखा कि वे इस क्रूर जानलेवा हमले और सबसे महान व्यक्तित्व के दुखद नुकसान से स्तब्ध हैं।
इतना ही नहीं, किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से बचने के लिए गोलवलकर ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृह मंत्री सरदार पटेल दोनों को संदेश भेजे, जिसमें उन्होंने इस नृशंस हत्या की कड़ी निंदा की। इन संदेशों में उन्होंने गांधी जी के लिए असाधारण रूप से बड़े विशेषणों का इस्तेमाल किया। उन्होंने लिखा कि नथूराम गोडसे एक विचारहीन और विकृत आत्मा है, जिसने पूज्य महात्मा जी के जीवन का बुलेट से अचानक और घोर अंत करके एक जघन्य अपराध किया है।

लेकिन सरदार पटेल इन बातों के झांसे में नहीं आए। वे आरएसएस के इस दोहरे चरित्र को अच्छी तरह समझ चुके थे। गांधी जी की हत्या के तीन दिन बाद गृह मंत्रालय द्वारा जारी उस अधिसूचना में यह स्पष्ट रूप से दिखाई दिया, जिसने आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस सरकारी सर्कुलर ने आरएसएस के कथनी और करनी के बीच के गहरे अंतर को देश के सामने लाकर रख दिया।
इस सरकारी अधिसूचना में कहा गया था कि आरएसएस का घोषित उद्देश्य हिंदुओं के शारीरिक, बौद्धिक और नैतिक कल्याण को बढ़ावा देना और उनके बीच भाईचारे, प्रेम तथा सेवा की भावना को बढ़ावा देना है। हालांकि, सरकार ने खेद के साथ यह नोट किया है कि व्यवहार में संघ के सदस्य अपने घोषित आदर्शों पर कायम नहीं रहे। संघ के सदस्यों द्वारा अवांछनीय और खतरनाक गतिविधियां चलाई गई हैं, जो आगजनी, लूटपाट, डकैती और हत्या जैसे हिंसक कृत्यों में शामिल रहे हैं और उन्होंने अवैध हथियार व गोला-बारूद भी इकट्ठा किया है। उन्हें ऐसे पर्चे बांटते हुए भी पाया गया है जो लोगों को आतंकवादी तौर-तरीके अपनाने के लिए उकसाते हैं।
गृह मंत्रालय का वह सर्कुलर बिल्कुल स्पष्ट था कि इन सभी गतिविधियों ने सरकार के लिए यह अनिवार्य बना दिया है कि वह संघ से एक संगठित संस्था के रूप में कड़ाई से निपटे।
तब से लेकर आज तक आरएसएस के मूल स्वभाव और चरित्र में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। एकमात्र अंतर यह है कि पिछले आठ दशकों में आरएसएस एक विशालकाय संगठन बन चुका है। उसकी गुप्त गतिविधियां कई गुना बढ़ गई हैं और उसके बढ़ते राजनीतिक रसूख ने उसे कानूनी बंधनों से पूरी तरह मुक्त कर दिया है।
विदेशी पैसों से लबालब है आरएसएस का खजाना
प्रियंक खरगे ने संघ की दुखती रग पर हाथ तब रखा जब उन्होंने सवाल पूछा कि आखिर आरएसएस को फंडिंग कहां से मिलती है? अगर इस मामले की उचित जांच की जाए, तो आरएसएस का वह पुराना बहाना धराशायी हो जाएगा जिसमें वह दावा करता है कि उसकी सारी आय उसके सदस्यों द्वारा दी जाने वाली ‘गुरु दक्षिणा’ से आती है। आखिर आरएसएस को सरकार के सामने अपने खातों का विवरण क्यों नहीं देना चाहिए? उनका हमेशा से यही तयशुदा जवाब रहता है कि चूंकि उन्हें कोई संस्थागत दान (चाहे घरेलू हो या विदेशी) नहीं मिलता, इसलिए वे कानूनी रूप से किसी भी प्राधिकरण को इसका हिसाब देने के लिए बाध्य नहीं हैं।

लेकिन इस लचर दलील को स्वीकार नहीं किया जा सकता। आखिरकार, स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी), जिसे भारत सरकार ने सही तौर पर प्रतिबंधित किया था, वह भी यही दावा करता था कि उसे उसके सदस्यों के योगदान से पैसा मिलता है और वह अपनी वित्तीय स्थिति को लेकर किसी भी सरकारी संस्था के प्रति जवाबदेह नहीं है। लेकिन उस समय की सरकार ने इस आसान स्पष्टीकरण को स्वीकार नहीं किया और उस पर सख्त कार्रवाई की।
आरएसएस एक तरह से सिमी का ही दूसरा पहलू है। अगर सिमी अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता में लिप्त था, तो आरएसएस बहुसंख्यक सांप्रदायिकता का खुला ध्वजवाहक है। फिर इन दोनों को अलग-अलग तराजू पर क्यों तोला जाना चाहिए? क्या सिर्फ इसलिए कि आरएसएस बहुसंख्यकवाद को राष्ट्रवाद के मुखौटे में पेश करता है?
हम सभी जानते हैं कि सिमी को पाकिस्तान की भारत विरोधी ताकतों से फंडिंग मिलती थी। इसी तरह, कई खोजी रिपोर्टों ने पुख्ता सबूत दिए हैं कि आरएसएस विदेशों से, और अक्सर संदिग्ध स्रोतों से, भारी मात्रा में संसाधन जुटा रहा है।
साउथ एशिया सिटीजन्स वेब ने साल 2002 में ‘द फॉरेन एक्सचेंज ऑफ हेट: आईडीआरएफ एंड द अमेरिकन फंडिंग ऑफ हिंदुत्व’ नाम से एक विस्फोटक रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट ने भारत में हिंदुत्व की गतिविधियों के लिए होने वाली फंडिंग की ओर दुनिया का ध्यान खींचा था। यह रिपोर्ट मैरीलैंड स्थित एक अमेरिकी चैरिटी संस्था ‘इंडिया डेवलपमेंट एंड Relief फंड’ (आईडीआरएफ) पर केंद्रित थी।

इस रिपोर्ट में दस्तावेजी सबूतों के साथ दिखाया गया था कि कैसे आईडीआरएफ का पैसा आरएसएस से जुड़े उन संगठनों को भेजा गया, जिनका मुख्य काम भारत के गरीब, दूरदराज के आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में धार्मिक ‘धर्मानंतरण’ और ‘हिंदूकरण’ करना था।
इस रिपोर्ट ने आईडीआरएफ से मदद पाने वाले गुजरात के ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ के मामले को उजागर किया था। इसमें ईसाई विरोधी हिंसा में इस आश्रम की व्यापक संलिप्तता के सबूत दिए गए थे, जिसमें ईसाई स्कूलों, कॉलेजों, चर्चों और कब्रिस्तानों को नुकसान पहुंचाना शामिल था।
इसके अलावा, रिपोर्ट में कहा गया था कि ऐसे सहायक दस्तावेज भी मौजूद हैं जो दिखाते हैं कि 1998-2000 के दौरान ईसाई विरोधी हिंसा में शामिल यही हिंदुत्व संगठन 2002 के गुजरात दंगों में भी शामिल थे। सबसे विश्वसनीय अनुमानों के अनुसार, उस दंगे में 2,000 से अधिक लोग मारे गए थे, जिनमें अधिकांश मुस्लिम थे। रिपोर्ट में प्रमाणित सबूत दिए गए थे कि आईडीआरएफ ने 1995 और 2002 के बीच आरएसएस के निकायों को 3 मिलियन डॉलर से अधिक की रकम भेजी थी।
‘फ्रंटलाइन’ पत्रिका ने भी जुलाई 2021 की अपनी रिपोर्ट ‘संघ परिवार्स यूएस फंड्स ट्रेल’ में इस बात के विस्तृत विवरण दिए थे कि कैसे अमेरिका स्थित हिंदू संगठनों से आरएसएस से जुड़े निकायों के खाते में भारी मात्रा में धन का प्रवाह हुआ।
उसी रिपोर्ट में ब्रिटेन के एक समूह ‘आवाज़’ की एक रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया था, जिसका शीर्षक ‘इन बैड फेथ: ब्रिटिश चैरिटी एंड हिंदू एक्सट्रीमिज्म’ था। इसमें खुलासा हुआ था कि सेवा इंटरनेशनल (आरएसएस से जुड़ा संगठन) की यूके शाखा ने 2001 के गुजरात भूकंप पीड़ितों को राहत देने के बहाने लाखों पाउंड जुटाए थे। लेकिन बाद में इस पैसे को आरएसएस के मुखौटा संगठनों को ट्रांसफर कर दिया गया। ब्रिटिश लेबर पार्टी के तत्कालीन सदस्य और सेवा इंटरनेशनल के संरक्षक लॉर्ड एडम पटेल ने आरएसएस के साथ इस संगठन के संबंधों के बारे में जानने के बाद इसे नस्लवादी बताते हुए इसकी कड़ी आलोचना की थी और पद छोड़ दिया था।

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी सीपीआई(एम) के मुखपत्र ‘पीपल्स डेमोक्रेसी’ ने अपने जनवरी 2026 के अंक में पेरिस स्थित सेरी-साइंसेजपो (Ceri-SciencesPo) और दिल्ली की कारवां पत्रिका की एक संयुक्त शोध रिपोर्ट के निष्कर्ष प्रकाशित किए। इसमें सबूत दिए गए कि विश्व हिंदू परिषद (विएचपी) यूएसए से संबद्ध ‘सपोर्ट अ चाइल्ड यूएसए’ नामक संगठन भारत में आरएसएस समर्थित संस्थाओं को धन मुहैया करा रहा है। वास्तव में, इस रिपोर्ट ने विदेशों में स्थित कई आरएसएस सहयोगियों का जिक्र किया है जो वहां के दाताओं से धन एकत्र करते हैं और उन्हें भारत में विभिन्न आरएसएस-संबद्ध संगठनों को भेजते हैं।
विदेशी फंडिंग कई बड़े और छोटे एनजीओ के लिए मुख्य सहारा रही है, जो समय-समय पर सरकार को आईना दिखाते रहते हैं। लेकिन सरकार ने ‘आसान पैसे से परेशानी खड़ी करने’ के आरोप में इन जन-समर्थक संगठनों पर शिकंजा कसकर उन्हें तहस-नहस कर दिया है। हैरानी की बात यह है कि विदेशी फंडिंग वाले एनजीओ को लेकर मोदी सरकार की यह सख्ती आरएसएस के मामले में पूरी तरह गायब हो जाती है।
देखा जाए तो आरएसएस का खजाना विदेशी पैसों से पूरी तरह लबालब है। यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि आरएसएस इस वित्तीय और संगठनात्मक ताकत का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों के खिलाफ देशव्यापी नफरत भरे अभियानों को हवा देने के लिए करता है। ऐसे में क्या यह बिल्कुल सही समय नहीं है कि इस भगवा तंत्र की फंडिंग की आधिकारिक और निष्पक्ष जांच कराई जाए?
लेखक एन.आर. मोहंती एक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ‘हिंदुस्तान टाइम्स’, पटना के संपादक रह चुके हैं। यह लेख मूल रूप से द वायर द्वारा प्रकाशित किया जा चुका है.
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