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गुजरात के समुद्री तटों का हाल: छोटे जीवों ने खोली ‘ब्लू फ्लैग’ शिवराजपुर बीच के भारी प्लास्टिक प्रदूषण की पोल

| Updated: July 16, 2026 12:39

'ब्लू फ्लैग' का दर्जा प्राप्त गुजरात के सबसे स्वच्छ शिवराजपुर बीच पर माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण का खतरनाक स्तर मिला है। छोटे समुद्री जीवों (बार्नेकल) पर हुए एक नए शोध ने इस पर्यटन स्थल की चिंताजनक सच्चाई को उजागर किया है।

अहमदाबाद/वडोदरा: फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य संकट के दौरान जहाजों की गति धीमी करने के लिए दुनियाभर में सुर्खियां बटोरने वाले ‘बार्नेकल’ अब एक नया और डराने वाला सच सामने ला रहे हैं। चट्टानों और जहाजों के निचले हिस्से से चिपके रहने वाले खोलयुक्त ये छोटे समुद्री जीव अब गुजरात की तटरेखा पर माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण के खतरनाक स्तर की पोल खोल रहे हैं।

हेमचंद्राचार्य उत्तर गुजरात विश्वविद्यालय (एचएनजीयू) और महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय (एमएसयू) के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन में बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। राज्य के तटीय इलाकों में सर्वेक्षण किए गए 13 स्थानों में से शिवराजपुर में बार्नेकल के अंदर माइक्रोप्लास्टिक की सांद्रता सबसे अधिक पाई गई है।

यह बड़ी विडंबना ही है कि शिवराजपुर गुजरात का ‘ब्लू फ्लैग’ प्रमाणित समुद्री तट है। इस समुद्र तट को पर्यावरण, सुरक्षा और स्वच्छता के उच्चतम मानकों को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त है।

द्वारका से लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित इस खूबसूरत समुद्र तट पर साल 2024 में करीब 6.8 लाख पर्यटक पहुंचे थे। शोधकर्ताओं ने शिवराजपुर में माइक्रोप्लास्टिक के इतने ऊंचे स्तर के लिए खराब अपशिष्ट प्रबंधन, प्लास्टिक कचरे को अंधाधुंध फेंकने, मछली पकड़ने की गतिविधियों और इस क्षेत्र की भौगोलिक संवेदनशीलता को मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराया है।

प्रतिष्ठित ‘मरीन पॉल्यूशन बुलेटिन’ में प्रकाशित और ‘नेचर’ पत्रिका द्वारा प्रमुखता से रेखांकित किए गए इस अध्ययन में बार्नेकल की आठ प्रजातियों का गहन विश्लेषण किया गया। इसके साथ ही, शोधकर्ताओं ने मार्च 2023 से अगस्त 2024 के बीच इन 13 तटीय स्थानों से समुद्री जल और तलछट (सेडिमेंट) के नमूने भी एकत्र किए थे।

शोधकर्ताओं ने परीक्षण के दौरान बार्नेकल से 484, समुद्री जल से 491 और तटीय तलछट से 725 माइक्रोप्लास्टिक कण निकाले। ये आंकड़े गुजरात के समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में प्लास्टिक प्रदूषण की व्यापक और गहरी मौजूदगी को स्पष्ट रूप से उजागर करते हैं।

एमएसयू के जूलॉजी विभाग में सहायक प्रोफेसर और शोधकर्ताओं में से एक कृपाल पटेल ने इस खतरे को समझाते हुए बताया कि नदी प्रणालियों में प्रवेश करने वाला प्लास्टिक कचरा अंततः समुद्र तक पहुंच जाता है, जहां यह धीरे-धीरे माइक्रोप्लास्टिक में टूट जाता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि औद्योगिक अपशिष्ट, विशेषकर कपड़ा क्षेत्र से निकलने वाला कचरा भी इस प्रदूषण को बढ़ाता है, जबकि मछली पकड़ने की गतिविधियां भी समुद्री तंत्र में प्लास्टिक पहुंचने का एक प्रमुख स्रोत हैं।

अध्ययन की गई आठ प्रजातियों में से, ‘थैमलस बार्नेसी’ (Chthamalus barnesi) में माइक्रोप्लास्टिक का सबसे अधिक संचय देखा गया। दूसरी ओर, ‘मेगाबालानस टिनटिन्नाबुलम’ (Megabalanus tintinnabulum) में यह स्तर सबसे कम दर्ज किया गया।

पाए गए अधिकांश कण नीले और काले रंग के फाइबर थे, जिनका आकार एक से दो मिलीमीटर के बीच था। ये मुख्य रूप से पॉलीप्रोपाइलीन और पॉलीथीन से बने थे, जिनका उपयोग आमतौर पर पैकेजिंग सामग्री और मछली पकड़ने के उपकरणों में बहुतायत से किया जाता है।

बार्नेकल अपना पूरा जीवन चट्टानों, जेटी और जहाजों से चिपके हुए बिताते हैं और भोजन के लिए लगातार समुद्री जल को फिल्टर करते रहते हैं। इस प्रक्रिया में, वे अपने आसपास मौजूद माइक्रोप्लास्टिक को भी अपने अंदर जमा कर लेते हैं, जिससे वे तटीय प्रदूषण और पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को मापने के लिए एक बहुत ही विश्वसनीय जैविक संकेतक (बायोइंडिकेटर) बन जाते हैं।

इस शोध में बार्नेकल, समुद्री जल और तटीय तलछट में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक के भार के बीच एक मजबूत संबंध भी पाया गया है। यह दर्शाता है कि प्लास्टिक के कण समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में किस तरह एक जगह से दूसरी जगह जा रहे हैं।

अपने निष्कर्षों को वैश्विक संदर्भ में परखने के लिए, शोधकर्ताओं ने 2013 से 2024 के बीच प्रकाशित 80 अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों की भी गहराई से समीक्षा की। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि स्पंज, सीप (ऑयस्टर) और समुद्री एनीमोन जैसे अन्य स्थिर जीवों के साथ-साथ बार्नेकल दुनिया भर में समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण की निगरानी के लिए एक विश्वसनीय दीर्घकालिक उपाय के रूप में काम कर सकते हैं।

इस महत्वपूर्ण शोध दल में एचएनजीयू के जीवन विज्ञान विभाग (डिपार्टमेंट ऑफ लाइफ साइंसेज) की पीएचडी छात्रा महिमा दोशी, इसी विभाग के सहायक प्रोफेसर जिग्नेशकुमार एन त्रिवेदी और एमएसयू के कृपाल पटेल शामिल थे।

प्रोफेसर पटेल ने इस बात पर जोर दिया कि ये निष्कर्ष इसलिए भी कहीं ज्यादा गंभीर हैं क्योंकि माइक्रोप्लास्टिक अंततः हमारी खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर रहे हैं। पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले ये अदृश्य कण समुद्री जीवों के जरिए उन इंसानों के शरीर में भी पहुंच रहे हैं जो सीफूड का सेवन करते हैं, हालांकि बार्नेकल की मदद से अब वैज्ञानिकों को तटीय पारिस्थितिकी प्रणालियों के स्वास्थ्य की निगरानी करने के लिए एक सरल और प्रभावी उपकरण जरूर मिल गया है।

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