अहमदाबाद की एक स्थानीय अदालत ने मंगलवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक और पाटीदार अनामत आंदोलन समिति (पास) के पूर्व संयोजक हार्दिक पटेल को बड़ी राहत दी है। न्याय और जनहित का हवाला देते हुए अदालत ने हार्दिक और छह अन्य लोगों के खिलाफ दर्ज एक आपराधिक मामले को वापस लेने की राज्य सरकार की अर्जी को आधिकारिक तौर पर मंजूर कर लिया है।
यह कोई पहला मौका नहीं है जब राज्य सरकार ने हार्दिक पटेल के खिलाफ दर्ज किसी मुकदमे को वापस लिया हो। अगर इस विशिष्ट मामले की बात करें, तो निकोल पुलिस ने 19 अगस्त 2018 को उनके खिलाफ यह एफआईआर दर्ज की थी। उस समय हार्दिक ने पाटीदारों के लिए ओबीसी कोटे और किसानों की कर्ज माफी की मांग को लेकर एक दिवसीय सांकेतिक उपवास किया था।
इस प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने गीता पटेल और संदीप पटेल सहित ‘पास’ के छह अन्य नेताओं को भी हिरासत में लिया था। पुलिस की पूर्व अनुमति के बिना आयोजित किए गए इस कार्यक्रम को लेकर इन सभी पर गैरकानूनी रूप से इकट्ठा होने, दंगा करने और आपराधिक साजिश रचने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे। इसके अलावा पुलिस को उनकी ड्यूटी करने से रोकने और आपराधिक धमकी देने का मामला भी दर्ज हुआ था।
जांच पूरी होने के बाद इस मामले की चार्जशीट भी दायर कर दी गई थी और ग्रामीण अदालत के जेएमएफसी (JMFC) कोर्ट में मुकदमे की कार्यवाही शुरू हो गई थी। हालांकि, घटना के करीब आठ साल बाद सरकार ने इस मामले को वापस लेने का मन बनाया। इसके बाद सरकारी वकील ने सीआरपीसी (CrPC) की धारा 321 के तहत अदालत में एक आवेदन दाखिल कर मुकदमे को वापस लेने की औपचारिक अनुमति मांगी।
अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि केस वापस लेने का यह फैसला सीधे राज्य सरकार के स्तर पर लिया गया है। इस फैसले की आधिकारिक जानकारी 6 अप्रैल को जिला कलेक्टर द्वारा सरकारी वकील के कार्यालय को सौंप दी गई थी। दोनों पक्षों को सुनने के बाद जेएमएफसी जी.बी. सिहाग ने इस अर्जी पर अपनी मुहर लगा दी।
मजिस्ट्रेट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि राज्य सरकार ने यह सचेत निर्णय व्यापक जनहित को ध्यान में रखते हुए लिया है। अदालत ने अभियोजन पक्ष की इस दलील को भी स्वीकार किया कि उस विरोध प्रदर्शन के कारण किसी भी व्यक्ति को कोई शारीरिक या आर्थिक नुकसान नहीं पहुंचा था।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मामले को वापस लेने का मुख्य उद्देश्य बिना किसी पक्षपात के समाज में शांति और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देना है। न्यायाधीश ने यह भी साफ किया कि इस आवेदन के पीछे कोई भी गलत मंशा (Mala fide intention) नजर नहीं आती है, इसलिए सामाजिक शांति और न्याय के हित में मुकदमे को वापस लेने की मंजूरी दी जाती है।
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