गुजरात में शराबबंदी कानून को लेकर पुलिस की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। राजकोट के धोराजी की एक अदालत ने केवल जुलाई महीने में शराब पीने के आरोप में पकड़े गए 80 से अधिक लोगों को बरी कर दिया है। इन सभी मामलों में पुलिस की सबसे बड़ी लापरवाही यह रही कि उन्होंने अदालत में फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट ही पेश नहीं की।
इस रिपोर्ट के बिना यह साबित करना संभव नहीं था कि आरोपियों के खून में शराब की मात्रा तय कानूनी सीमा से अधिक थी। धोराजी कोर्ट के प्रिंसिपल सीनियर सिविल जज वी. के. बंसल ने फोरेंसिक सबूतों के अभाव का कड़ा संज्ञान लिया। उन्होंने जुलाई माह के दौरान ऐसे 80 मामलों का निपटारा किया, जिसमें से 40 से अधिक मामलों को तो महज एक ही दिन में खारिज कर दिया गया। अधिकांश केस चार्जशीट दाखिल होने के दिन या उसके कुछ ही दिनों के भीतर निपटा दिए गए।
अदालत ने अपनी टिप्पणी में स्पष्ट किया कि इस तरह के अपराध को साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष को कानूनी रूप से मान्य सबूत पेश करने होते हैं। नियम के अनुसार यह प्रमाणित करना अनिवार्य है कि आरोपी के रक्त में शराब की सांद्रता 0.05 प्रतिशत से अधिक थी। लेकिन इन मामलों में पुलिस ने चार्जशीट के साथ कोई भी एफएसएल रिपोर्ट अदालत के पटल पर नहीं रखी। कोर्ट ने साफ कहा कि इस रिपोर्ट के अभाव में यह नहीं माना जा सकता कि किसी व्यक्ति ने वैधानिक सीमा से अधिक शराब का सेवन किया है।
सूत्रों के मुताबिक, जांच अधिकारियों की यह जिम्मेदारी थी कि वे फोरेंसिक लैब से समन्वय करें और अदालत में चार्जशीट पेश करने से पहले रिपोर्ट हासिल करें। लेकिन पुलिस ने रिपोर्ट का इंतजार किए बिना ही आनन-फानन में चार्जशीट दायर कर दी, जिससे अभियोजन पक्ष का केस पूरी तरह कमजोर हो गया। सहायक लोक अभियोजक जे. वी. जोशी ने इस पर कहा कि अनिवार्य एफएसएल रिपोर्ट के बिना अदालत संज्ञान नहीं ले सकती, इसीलिए 80 मामलों को निपटा दिया गया। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि पुलिस को चार्जशीट दाखिल करने में जल्दबाजी करने के बजाय सबूत जुटाने और जांच की उचित प्रक्रिया का पालन करने पर ध्यान देना चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि यह तय करना लगभग असंभव था कि खून के नमूने फोरेंसिक लैब तक सुरक्षित पहुंचे भी थे या नहीं। नमूनों को अनिवार्य प्रक्रिया के तहत संभाला गया था या नहीं, इस पर भी संशय बना रहा।
नियमों के तहत, शराब पीने के संदेह में हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अस्पताल ले जाया जाता है, जहां डॉक्टर उसके खून का नमूना लेते हैं। इसके बाद इस नमूने को कलेक्शन के सात दिनों के भीतर गांधीनगर स्थित एफएसएल भेजना अनिवार्य होता है। जांच के नतीजों को सटीक बनाए रखने के लिए यह बेहद जरूरी है कि खून के नमूनों को इकट्ठा करने, परिवहन और जांच के दौरान सख्त सुरक्षा मानकों का पालन किया जाए, ताकि उनमें कोई मिलावट या खराबी न आ सके।
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