क्या भूख से बिलखते बच्चे के प्रति एक मां की हिंसा, वास्तव में समाज और कल्याणकारी व्यवस्था की नाकामी का सुबूत हो सकती है? इसी मार्मिक और गंभीर सवाल का जवाब देते हुए गुजरात हाईकोर्ट ने एक गर्भवती महिला को जमानत दे दी है। इस महिला पर आरोप है कि उसने खाना मांगने पर अपनी दो साल की मासूम बेटी की बेरहमी से पिटाई की थी, जिससे अंततः उसकी मौत हो गई।
इस बेहद संवेदनशील मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने भगवद गीता, बाइबिल और इस्लामी शिक्षाओं सहित कई महान ग्रंथों और विचारकों का हवाला दिया। पन्नालाल पटेल के छप्पनिया अकाल पर आधारित प्रसिद्ध उपन्यास ‘मानवीनी भवाई’, विक्टर ह्यूगो के ‘लेस मिजरेबल्स’, अरस्तू और महात्मा गांधी के विचारों का उल्लेख करते हुए अदालत ने एक बेहद गहरी टिप्पणी की। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब भुखमरी किसी मां को ऐसा खौफनाक कदम उठाने पर मजबूर कर दे, तो यह किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समाज का सामूहिक फेलियर है।
गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस एच. डी. सुथार ने आरोपी लखी सोलंकी को नियमित जमानत देते हुए एक अहम बात रेखांकित की। उन्होंने कहा कि आपराधिक प्रक्रिया को अपना काम करना चाहिए, लेकिन किसी भी अपराध के पीछे की गरीबी, भूख और कमजोर परिवारों की रक्षा करने की राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आदेश में कहा गया कि अपराधी जन्म से नहीं होते, बल्कि हालात उन्हें ऐसा बनाते हैं।
यह पूरी त्रासदी लखी सोलंकी की दो साल की बेटी ईशा की मौत से जुड़ी है। अभियोजन पक्ष के विवरण के अनुसार, महिला का पति समुद्री यात्रा पर काम के सिलसिले में करीब छह महीने से बाहर था। इस दौरान उसने अपने परिवार की कोई सुध नहीं ली और उन्हें भुखमरी की हालत में छोड़ दिया। लाचार होकर महिला अपनी बेटियों के साथ ससुराल छोड़कर एक अन्य व्यक्ति के साथ ‘मैत्री करार’ (बिना शादी के साथ रहने का समझौता) के तहत रहने लगी थी।
आरोप है कि 19 मार्च 2026 को नन्ही ईशा भूख के मारे लगातार खाना मांग रही थी। बच्ची के लगातार रोने से हताश और चिड़चिड़ी हो चुकी मां ने उसे पीट दिया। पिटाई के बाद बच्ची सो गई, लेकिन बाद में जब मां ने उसे जगाने की कोशिश की, तो वह बेहोश मिली। घबराई हुई मां तुरंत उसे सूरत के स्मीमेर (Smimer) अस्पताल ले गई, जहां डॉक्टरों ने बच्ची को मृत घोषित कर दिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मारपीट से आई चोटों की पुष्टि हुई और मृतका की तीन साल की बहन को इस मामले में एकमात्र चश्मदीद गवाह बनाया गया।
अदालत में बचाव पक्ष ने मजबूती से दलील दी कि महिला सात महीने से अधिक की गर्भवती है और उसका एक दुधमुंहा बच्चा भी उसके साथ जेल की सलाखों के पीछे है, जबकि एक अन्य बच्चा बाहर बिना किसी देखभाल के है। वकील ने तर्क दिया कि महिला का कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट भी दाखिल हो चुकी है। ऐसे में उसे जेल में रखने का कोई कानूनी औचित्य नहीं है। दूसरी तरफ, राज्य सरकार ने जमानत का विरोध करते हुए इसे गंभीर अपराध बताया और गवाहों को प्रभावित करने की आशंका जताई।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने पाया कि घटना के बाद मां खुद अपनी बच्ची को बचाने के लिए अस्पताल की तरफ दौड़ी थी। अदालत के अनुसार, यह इस बात का प्रमाण है कि उसका इरादा अपनी बच्ची की जान लेने का नहीं था, बल्कि यह निराशा में उठाया गया एक लापरवाही भरा कदम था। अपनी ही बच्ची की भूख मिटाने में असमर्थ होने की बेबसी ने उस मां को अपना आपा खोने पर मजबूर कर दिया।
फैसले में साहित्य और दर्शन का गहराई से जिक्र किया गया। पन्नालाल पटेल के उपन्यास का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि इंसान बुरा नहीं होता, बल्कि भूख बुरी होती है। विक्टर ह्यूगो के नायक जीन वालजीन का उदाहरण दिया गया, जिसने परिवार का पेट भरने के लिए रोटी चुराई थी। चार्ल्स डिकेंस की रचनाओं और अरस्तू के उस कथन को भी याद किया गया, जिसमें उन्होंने गरीबी को अपराध और क्रांति की जननी बताया था।
इसके अलावा, गीता का श्लोक, बाइबिल में ईसा मसीह के उपदेश और इस्लामी शिक्षाओं का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि अपने पड़ोसी को भूखा देखकर भी खुद पेट भर खाना खाना सबसे बड़ा पाप है। अदालत ने कहा कि किसी को भूख से तड़पकर मरने देना एक सामाजिक ही नहीं, बल्कि भारी नैतिक और आध्यात्मिक पतन है।
संविधान के अनुच्छेद 45 के तहत राज्य के कर्तव्यों की याद दिलाते हुए कोर्ट ने कहा कि बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य को बेहतर बनाना सरकार की जिम्मेदारी है, जो इस मामले में पूरी तरह विफल रही। इन कड़ी टिप्पणियों के साथ, हाईकोर्ट ने लखी सोलंकी को 25,000 रुपये के निजी मुचलके और एक जमानती की शर्त पर रिहा करने का आदेश दिया। अंत में जस्टिस सुथार ने समाज के लिए एक कड़ा संदेश छोड़ते हुए कहा कि एक भूखा इंसान दर्शन या आदर्शों से पहले हमेशा रोटी की तलाश करता है।
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