अहमदाबाद: किसी कानूनी दस्तावेज में हुई एक छोटी सी चूक दशकों बाद कैसे किसी बड़े फैसले को पूरी तरह पलट सकती है, इसका एक बेहद हैरान करने वाला मामला सामने आया है। दरअसल, एक वसीयत में एक महिला को उसके असली निधन से पूरे एक साल पहले ही दस्तावेजों में मृत घोषित कर दिया गया था। इसी बड़ी गड़बड़ी के आधार पर गुजरात हाईकोर्ट ने एक पोते के उस दावे को खारिज कर दिया है, जिसमें वह खुद को 4,856 वर्ग मीटर की एक बेशकीमती जमीन का इकलौता मालिक बता रहा था।
यह विवादित संपत्ति बालासिनोर में स्थित है, जो अब गुजरात के महिसागर जिले का हिस्सा है। अदालत के इस अहम फैसले के बाद अब पोते का अपने नाना की इस संपत्ति पर कोई विशेषाधिकार नहीं रह गया है। उसे अब हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत केवल एक सामान्य हिस्सेदार के रूप में ही माना जाएगा।
इस पूरे पारिवारिक विवाद की जड़ मोतीलाल ओसवाल द्वारा साल 1976 में बनाई गई एक कथित वसीयत है। इस दस्तावेज में उन्होंने अपने चार सगे बेटों को दरकिनार करते हुए अपनी बेटी के बेटे सुनील कुमार के नाम यह पूरी जमीन कर दी थी। साल 1985 में मोतीलाल का निधन हो गया। इसके बाद 1991 में सुनील के पिता (मोतीलाल के दामाद) ने इसी वसीयत के आधार पर राजस्व अधिकारियों के सामने संपत्ति पर अपने बेटे का मालिकाना हक जताया। जब अधिकारियों ने वसीयत की मूल प्रति मांगी, तो 1994 में यह पूरा मामला दीवानी (सिविल) कार्यवाही में बदल गया।
इस पूरे घटनाक्रम की भनक लगते ही मोतीलाल के बेटों ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। इसके बावजूद साल 1997 में सुनील ने वसीयत के प्रमाणीकरण (प्रोबेट) के लिए सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अपने चाचाओं के भारी विरोध के बावजूद सुनील को साल 2000 में अदालत से अपने पक्ष में फैसला मिल गया। दूसरी तरफ उनके चाचाओं की दलील थी कि उनके पिता ने 1936 में अपनी गाढ़ी कमाई से यह संपत्ति खरीदी थी, इसलिए प्रथम श्रेणी के कानूनी वारिस होने के नाते उनका भी इस पर बराबर का अधिकार बनता है।
निचली अदालत के इस फैसले को चुनौती देते हुए मोतीलाल के बेटों ने साल 2000 में ही हाईकोर्ट का रुख किया। उनके वकीलों ने वसीयत की प्रामाणिकता पर कई गंभीर सवाल खड़े किए। सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खामी वसीयत की पहली ही पंक्ति में पकड़ी गई, जिसमें लिखा था कि ‘मेरी पत्नी चंदाबेन का निधन हो चुका है’। वकीलों ने अदालत में तर्क दिया कि यह दस्तावेज अप्रैल 1976 में तैयार किया गया था और उस वक्त चंदाबेन पूरी तरह स्वस्थ और जीवित थीं। उनका असली निधन साल 1977 में हुआ था।
इसके अलावा यह भी दलील दी गई कि मोतीलाल खुद 1985 तक जीवित रहे, लेकिन उन्होंने कभी इस गलत जानकारी को सुधारने का प्रयास नहीं किया। इसी एक तथ्य ने पूरी वसीयत को गहरे संदेह के घेरे में ला दिया। इस भारी गड़बड़ी को छिपाने के लिए पोते की तरफ से यह दलील दी गई कि वसीयत का मसौदा तैयार करने वाले बुजुर्ग वकील को ऊंचा सुनाई देता था। बचाव में कहा गया कि संभव है वकील ने डिक्टेशन समझने में गलती कर दी हो।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को सिरे से नकार दिया। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस जे.सी. दोशी ने अपने आदेश में कहा कि यह वसीयत अदालत के विवेक को संतुष्ट करने में पूरी तरह विफल रही है। जज ने स्पष्ट किया कि खुद दावा करने वाला व्यक्ति इन संदिग्ध परिस्थितियों का कोई ठोस और संतोषजनक जवाब लेकर सामने नहीं आया है। अदालत ने माना कि निचली अदालत ने प्रोबेट अर्जी मंजूर करके बहुत बड़ी और गंभीर गलती की थी।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी साफ किया कि इस संपत्ति पर मोतीलाल के बेटों के साथ-साथ उनकी बेटियों का भी पूरा हक बरकरार है। अदालत के अंतिम आदेश में स्पष्ट तौर पर लिखा गया है कि दिवंगत मोतीलाल जायसवाल के प्रथम श्रेणी के सभी वारिसों का इस संपत्ति में समान हिस्सा है और इसी के अनुसार इसका विधिवत बंटवारा किया जाना चाहिए।
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