देश भर के व्यापारी संगठनों ने आगामी 2 अक्टूबर को ‘नो यूपीआई डे’ (No UPI Day) मनाने का बड़ा ऐलान किया है। यह राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन 15 अक्टूबर से 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई (UPI) लेनदेन पर लगाए जाने वाले 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) के खिलाफ किया जा रहा है।
गांधी जयंती के अवसर पर व्यापारी अपना रोष प्रकट करने के लिए एक अनोखा और शांतिपूर्ण तरीका अपनाएंगे। इस दिन देश भर की दुकानों पर यूपीआई स्कैनर, क्यूआर कोड, साउंड बॉक्स और इससे जुड़े अन्य सभी उपकरणों को काले कपड़े से ढक दिया जाएगा।
महाराष्ट्र चैंबर ऑफ कॉमर्स, इंडस्ट्री एंड एग्रीकल्चर (MACCIA) के अध्यक्ष रवींद्र मंगवे ने बताया कि उनकी संस्था ने 2 अक्टूबर को ‘नो यूपीआई डे’ के रूप में मनाने का आह्वान किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह बंदी केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि पूरे देश में लागू होगी।
मंगवे के अनुसार, देशभर के विभिन्न व्यापारी संघों से उनकी बातचीत हो चुकी है और सभी राज्यों में इस आंदोलन का कड़ाई से पालन किया जाएगा। इसके साथ ही MACCIA और उससे जुड़े लगभग 500 संगठन जल्द ही मुख्यमंत्री से मिलकर अपनी मांगें उनके सामने रखने की योजना भी बना रहे हैं।
इस राष्ट्रव्यापी विरोध को देश के कई बड़े संगठनों का भरपूर समर्थन प्राप्त है। इनमें फेडरेशन ऑफ रिटेल ट्रेडर्स वेलफेयर एसोसिएशन (FRTWA), ऑल इंडिया कंज्यूमर प्रोडक्ट्स डिस्ट्रीब्यूटर्स फेडरेशन (AICPDF), ऑल इंडिया मोबाइल रिटेलर्स एसोसिएशन (AIMRA), ऑल इंडिया ज्वैलर्स एंड गोल्डस्मिथ फेडरेशन (AIJGF) और अखिल भारतीय खाद्य तेल व्यापारी महासंघ (AIEOTF) जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं।
एमडीआर वह शुल्क होता है जो व्यापारियों को डिजिटल भुगतान स्वीकार करने पर अपनी जेब से चुकाना पड़ता है। नए नियमों के मुताबिक, पीयर-टू-पीयर (P2P) लेनदेन पूरी तरह से निशुल्क रहेंगे।
लेकिन पीयर-टू-मर्चेंट (P2M) लेनदेन, जो 2,000 रुपये से अधिक होंगे, उन पर 0.40 प्रतिशत का शुल्क लगाया जाएगा। हालांकि, इस शुल्क की अधिकतम सीमा 300 रुपये तय की गई है।
छोटे दुकानदारों के लिए राहत की बात सिर्फ इतनी है कि पर्सन-टू-पर्सन-मर्चेंट (P2PM) लेनदेन एमडीआर से पूरी तरह मुक्त रहेंगे। इसके तहत वे छोटे विक्रेता आते हैं जो यूपीआई के जरिए महीने में एक लाख रुपये तक की राशि प्राप्त करते हैं, जिससे ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के व्यवसायों को विशेष लाभ मिलेगा।
अगस्त महीने के आंकड़ों पर गौर करें तो यूपीआई के जरिए कुल 15.51 अरब P2M लेनदेन हुए थे। इन ट्रांजैक्शन की कुल वैल्यू 8.95 ट्रिलियन रुपये रही थी, जिसमें से लगभग 67 प्रतिशत हिस्सा 2,000 रुपये से अधिक के भुगतानों का था।
इस नए नियम का असर सिर्फ खुदरा व्यापारियों पर ही नहीं पड़ रहा है, बल्कि अन्य सेक्टर्स भी इससे चिंतित हैं। हाल ही में ऑल इंडिया पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन (AIPDA) ने पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात कर एमडीआर से छूट दिए जाने की पुरजोर मांग की है।
इसके अलावा, सेबी (Sebi) के चेयरपर्सन तुहिन कांता पांडे ने कहा है कि नियामक स्टॉकब्रोकरों द्वारा उठाई गई चिंताओं पर भी गहराई से विचार करेगा। पूंजी बाजार के बड़े लेनदेन (जैसे म्यूचुअल फंड, ब्रोकर और निवेश सलाहकारों को भुगतान) के लिए यह एमडीआर 0.02 प्रतिशत तय किया गया है, जिसकी ऊपरी सीमा 300 रुपये रखी गई है।
AICPDF के राष्ट्रीय अध्यक्ष धैर्यशील पाटिल ने इस शुल्क पर कड़ा ऐतराज जताते हुए सवाल किया है कि डिजिटल भुगतान का अतिरिक्त खर्च केवल व्यापारी ही क्यों उठाएं। उन्होंने तर्क दिया कि रिटेलर और डिस्ट्रीब्यूटर पहले से ही बहुत कम मुनाफे (मार्जिन) पर काम करते हैं और डिजिटल कॉमर्स को बढ़ाने में उनका बहुत बड़ा योगदान है।
पाटिल ने आगे कहा कि यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर थोपना उनके व्यापार पर एक और बड़ा आर्थिक बोझ डालने जैसा है। उनके मुताबिक, डिजिटल भुगतान को व्यापार में सहूलियत लानी चाहिए, न कि इसके इस्तेमाल के लिए व्यापारियों को दंडित किया जाना चाहिए।
वहीं, अखिल भारतीय खाद्य तेल व्यापारी महासंघ (AIEOTF) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शंकर ठक्कर ने भी 15 अक्टूबर से लागू होने वाले इस 0.4 प्रतिशत एमडीआर शुल्क का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी के मार्ग पर चलते हुए देश भर के व्यापारी 2 अक्टूबर को अपने स्कैनर काले कपड़े से ढककर शांतिपूर्ण, लेकिन कड़ा संदेश देंगे।
ठक्कर ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार इस गंभीर मुद्दे पर जल्द कोई उचित निर्णय नहीं लेती है, तो आने वाले दिनों में आंदोलन की नई रणनीति तैयार की जाएगी। जरूरत पड़ने पर व्यापारियों के इस विरोध प्रदर्शन को और भी उग्र रूप दिया जाएगा।
उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि यूपीआई के निरंतर बढ़ते उपयोग ने खुदरा व्यापार की पूरी भुगतान प्रणाली को बेहद पारदर्शी बना दिया है। ग्राहक से लेकर रिटेलर, थोक व्यापारी और निर्माता तक, सभी लेनदेन डिजिटल होने से नकदी का चलन कम हुआ है और देश में हर भुगतान का एक पक्का रिकॉर्ड बन रहा है।
ठक्कर ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए अंत में कहा कि क्या सिस्टम को इतना पारदर्शी बनाने की कीमत अब छोटे दुकानदारों से वसूली जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि कम मार्जिन पर काम करने वाले व्यापारियों पर एमडीआर लगाना डिजिटल इंडिया को बढ़ावा देना नहीं है, बल्कि यह पारदर्शी और रिकॉर्डेड लेनदेन करने वाले ईमानदार व्यापारियों पर सीधा आर्थिक दंड लगाने के समान है।
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