अक्सर लोग सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने से बचने के लिए मामूली रकम का नुकसान सह लेते हैं। 900 रुपये के लिए तो शायद ही कोई सरकारी सिस्टम की लालफीताशाही से भिड़ना चाहेगा। लेकिन, सूरत के 18 वर्षीय बृजेश दलवाड़ी ने हार नहीं मानी और एक मिसाल कायम की।
यह पूरा मामला लर्निंग लाइसेंस टेस्ट के दौरान हुई एक तकनीकी खराबी से शुरू हुआ था। देखते ही देखते यह करीब एक साल लंबी कानूनी लड़ाई में बदल गया। बीएससी द्वितीय वर्ष के इस छात्र ने न्याय के लिए आरटीओ (RTO), नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC) और मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) से लेकर उपभोक्ता फोरम तक का दरवाजा खटखटाया। अंततः परिवहन विभाग को उनके 900 रुपये वापस करने पड़े।
सार्वजनिक यूनिवर्सिटी के छात्र दलवाड़ी ने 9 अक्टूबर 2025 को ‘नो नीड टू विजिट आरटीओ’ योजना के तहत लर्निंग लाइसेंस टेस्ट के लिए आवेदन किया था। उन्होंने ई-केवाईसी (e-KYC) पूरी की और क्रेडिट कार्ड के जरिए ऑनलाइन फीस भी जमा कर दी। इसके बाद उन्होंने अपने लैपटॉप पर सारथी (Sarathi) पोर्टल के माध्यम से परीक्षा देनी शुरू की।
हालांकि, एक तकनीकी खामी के कारण वह बार-बार कोशिश करने के बावजूद अपनी परीक्षा पूरी नहीं कर सके। छात्र का कहना है कि सॉफ्टवेयर की खराबी के चलते कई दिनों तक प्रयास करने के बाद भी वह टेस्ट नहीं दे पाए।
मदद और रिफंड की उम्मीद में उन्होंने सूरत आरटीओ से संपर्क किया। उनका आरोप है कि अधिकारियों ने समस्या सुलझाने के बजाय उन्हें परीक्षा पोर्टल संभालने वाले एनआईसी (NIC) के पास भेज दिया। बृजेश ने एनआईसी को सारी जानकारी दी, लेकिन वहां से भी कोई ठोस समाधान नहीं निकला।
एक समय पर छात्र को यह तक कह दिया गया कि शायद उनके लैपटॉप के स्पेसिफिकेशन परीक्षा के लिए उपयुक्त नहीं हैं। हालांकि, छात्र ने इस दावे को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि उनका लैपटॉप बिल्कुल नया था।
इन सबके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और ‘राइट टू सीएमओ’ (Write to CMO) सुविधा के जरिए सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय से गुहार लगाई। इसके बाद सीएमओ ने सूरत आरटीओ को मामले की जांच करने का निर्देश दिया। फिर भी समस्या जस की तस बनी रही और आरटीओ ने पैसे लौटाने से साफ इनकार कर दिया।
जब आरटीओ, एनआईसी और सीएमओ से भी बात नहीं बनी, तो दलवाड़ी ने उपभोक्ता फोरम का रुख करने का फैसला किया। शुरुआत में उन्हें संदेह था कि कोई सरकारी सेवा उपभोक्ता कानून के दायरे में आएगी या नहीं। लेकिन पूरी पड़ताल करने के बाद, उन्होंने सूरत जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (अतिरिक्त) में गुजरात के परिवहन आयुक्त के खिलाफ शिकायत दर्ज करा दी।
आयोग की तरफ से नोटिस मिलने के बाद सिस्टम हरकत में आया। आरटीओ ने फौरन एक आंतरिक समीक्षा की और अंततः छात्र को उनके 900 रुपये वापस कर दिए। दोनों पक्षों के बीच समझौता होने के बाद, सूरत सीडीआरसी (अतिरिक्त) ने 11 सितंबर को इस शिकायत का निपटारा कर दिया।
बृजेश दलवाड़ी के लिए यह पूरी लड़ाई कभी भी सिर्फ 900 रुपये की नहीं थी। उनका कहना है कि आरटीओ अधिकारियों के असहयोगात्मक रवैये ने ही उन्हें यह लंबी लड़ाई लड़ने और अपना हक वापस लेने के लिए प्रेरित किया।
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