अहमदाबाद में खाद्य सुरक्षा को लेकर की जा रही टेस्टिंग पर गंभीर चिंताएं सामने आई हैं। नगर निगम के सिस्टम ने इस साल के पहले 10 महीनों में 7,336 फूड सैंपल्स की जांच की, लेकिन इनमें से केवल 29 को ही असुरक्षित (अनसेफ) घोषित किया।
इन आंकड़ों ने अहमदाबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (AMC) के फूड विभाग और संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह बहस तेज हो गई है कि त्योहारी सीजन में भारी मांग वाले उत्पादों को असुरक्षित और निम्न स्तर (सब-स्टैंडर्ड) के बीच कैसे बांटा जा रहा है।
शहर भर से ये सैंपल्स AMC के फूड विभाग और खाद्य एवं औषधि नियामक अधिकारियों द्वारा चलाए गए जांच अभियान के तहत एकत्र किए गए थे। जांचे गए सभी नमूनों में से मात्र 29 को खाने के लिए पूरी तरह से अयोग्य माना गया।
हालांकि, सामने आई जानकारी में उन विशिष्ट स्थानों का खुलासा नहीं किया गया है जहां से ये नमूने लिए गए थे, और न ही असुरक्षित पाए गए उत्पादों का कोई विस्तृत विवरण दिया गया है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि फरसाण, जलेबी और मावे के 18 नमूनों को गुणवत्ता के पैमाने पर निम्न स्तर यानी ‘सब-स्टैंडर्ड’ पाया गया। अहमदाबाद में इन चीजों की खपत बहुत अधिक होती है और त्योहारों या अन्य खास मौकों पर इनकी मांग कई गुना बढ़ जाती है। वर्गीकरण के तहत, इन उत्पादों को जरूरी मानकों पर खरा न उतरने वाला तो माना गया, लेकिन इन्हें ‘असुरक्षित’ की श्रेणी में नहीं डाला गया।
अब यही वर्गीकरण सबसे बड़ी चिंता का विषय बन गया है। ऐसे आरोप लग रहे हैं कि जिन नमूनों को निम्न स्तर का बताया गया है, उन्हें जानबूझकर असुरक्षित मामलों की तरह ट्रीट नहीं किया जा रहा है, जबकि ऐसा करने से सख्त आपराधिक कार्रवाई हो सकती थी। इसके साथ ही, फूड विभाग द्वारा तय किए गए मानकों और प्रयोगशाला परीक्षण के बाद अपनाई जाने वाली पूरी नियामक प्रक्रिया पर भी उंगलियां उठ रही हैं।
किसी भी खाद्य उत्पाद को सब-स्टैंडर्ड या अनसेफ घोषित करने के कानूनी मायने अलग-अलग होते हैं। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में कोई भी लैब रिपोर्ट, परीक्षण के पैमाने या उन 18 मामलों में की गई विशिष्ट कानूनी कार्रवाई का जिक्र नहीं है।
इसलिए यह स्पष्ट रूप से साबित नहीं होता कि किया गया वर्गीकरण गलत था या नहीं। मुख्य चिंताएं पूरी तरह से सिस्टम की पारदर्शिता, नियमों को लागू करने की सख्ती और जांच के नतीजों को जनता के सामने स्पष्ट रूप से रखने से जुड़ी हैं।
अहमदाबाद के लिए यह मुद्दा बेहद अहम है क्योंकि खाद्य सुरक्षा का सीधा संबंध आम लोगों के रोजमर्रा के खानपान और सार्वजनिक स्वास्थ्य से है। बाजारों और दुकानों से सैंपल लिए जाते हैं, लैब में उनकी जांच होती है और फिर उचित कानूनी ढांचे के तहत कार्रवाई की जाती है।
इस पूरी व्यवस्था की सफलता केवल निरीक्षणों की संख्या पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इसके लिए पारदर्शी वर्गीकरण, समय पर सख्त कदम और उल्लंघनों को लेकर स्पष्ट संचार भी जरूरी है।
आम नागरिकों और उपभोक्ता संरक्षण संगठनों ने प्रयोगशाला रिपोर्टों की पारदर्शिता की नए सिरे से समीक्षा करने की मांग की है। उन्होंने खाद्य सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करने वाले निर्माताओं या विक्रेताओं के खिलाफ त्वरित और कठोर आपराधिक कार्रवाई की भी वकालत की है।
यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि नकली और मिलावटी उत्पाद अभी भी उपभोक्ताओं तक पहुंच रहे हैं, क्योंकि नियामक एजेंसियों की कार्रवाई से बाजार में कोई खास डर पैदा नहीं हुआ है।
केवल इन आंकड़ों से यह पता नहीं चलता कि कुल कितने निरीक्षण किए गए, कितने व्यापारिक प्रतिष्ठानों को कवर किया गया, तकनीकी कारणों से कितने सैंपल खारिज हुए या टेस्ट के बाद क्या जुर्माना लगाया गया।
खाद्य सुरक्षा प्रणाली के पूर्ण प्रदर्शन का आकलन करने के लिए इन सभी विवरणों की आवश्यकता है। फिलहाल सबसे बड़ी चिंता यही है कि क्या AMC और नियामक प्राधिकरण 7,336 परीक्षणों, 29 असुरक्षित और 18 सब-स्टैंडर्ड पाए गए नमूनों का स्पष्ट ब्यौरा जनता के सामने पेश करेंगे।
नागरिकों और उपभोक्ता समूहों की ओर से अब अगला कदम यही उठाया जा रहा है कि प्रयोगशाला के निष्कर्षों और रिपोर्ट किए गए नमूनों से जुड़ी कानूनी कार्रवाई की पारदर्शी समीक्षा की जाए। अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि AMC या खाद्य एवं औषधि विभाग ने इस तरह की किसी समीक्षा की कोई आधिकारिक घोषणा की है या नहीं।
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