सूरत के हीरा उद्योग पर यूक्रेन युद्ध की गहरी मार पड़ी है। इसी मंदी के बीच अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए रमणीक सखवाला नामक एक डायमंड पॉलिशर ने जून 2025 में रूस का रुख किया था।
उसे उम्मीद थी कि मास्को में उसे कोई अच्छी नौकरी मिल जाएगी। रमणीक के साथ उनका करीबी दोस्त पंकज जीवानी भी था। पंकज भी सूरत में हीरा तराशने का काम करता था और उसे रूस में नौकरी मिल गई थी, इसलिए रमणीक ने भी किस्मत आजमाने का फैसला किया।
आज रमणीक को रूस में “लापता” हुए लगभग साढ़े चार महीने हो चुके हैं। इस साल 24 जून को उसकी अपने परिवार से आखिरी बार बात हुई थी। इसके बाद से उसका कोई अता-पता नहीं है, जिससे परेशान होकर परिवार के एक सदस्य ने गुरुवार (5 नवंबर) को सूरत पुलिस से गुहार लगाई है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण डायमंड सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिसका सबसे ज्यादा असर सूरत की छोटी इकाइयों पर पड़ा। रमणीक ऐसी ही एक छोटी इकाई में काम करता था। परिवार के मुताबिक, उसके मालिक ने उसकी 35,000 रुपये की मामूली सैलरी को घटाकर आधे से भी कम कर दिया था। रमणीक का 16 वर्षीय बेटा हेमिल अभी स्कूल में पढ़ता है।
पंकज और रमणीक 13 जून 2025 को मास्को पहुंचे थे। दोनों दोस्तों ने एक कमरा किराए पर लिया और एक महीने से ज्यादा समय तक वहां साथ रहे। रमणीक की पत्नी शीतल ने बताया कि उनके पति को मास्को के एक मॉल में नौकरी मिल गई थी।
परिवार का कहना है कि इस साल मार्च में स्थितियां तब बिगड़ने लगीं, जब 40 वर्षीय इस हीरा कारीगर की मॉल वाली नौकरी छूट गई।
शीतल ने बताया कि अप्रैल के मध्य में एक दिन जब वे नौकरी की तलाश के बाद घर लौट रहे थे, तो रूसी पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। शीतल के अनुसार, पुलिस ने रमणीक के सामने दो विकल्प रखे: या तो वह छह महीने तक रूसी सेना के लिए काम करे, या फिर जेल जाए। रमणीक ने पहला विकल्प चुना।
शीतल ने कहा, “24 जून को मेरी रमणीक से आखिरी बार बात हुई थी। तब उन्होंने बताया कि वह फ्रंटलाइन पर रूसी सैनिकों को खाना पहुंचाने वाले सपोर्ट स्टाफ के तौर पर काम कर रहे हैं। उनके टीम कमांडर का नाम अर्जुन था, जो श्रीलंका का रहने वाला था। रमणीक ने मुझे अर्जुन का फोन नंबर दिया और कहा कि वह खुद करीब 15-20 दिनों तक नेटवर्क कवरेज एरिया से बाहर रहेंगे।”
फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से ऐसी दर्जनों मीडिया रिपोर्ट्स सामने आ चुकी हैं, जिनमें बताया गया है कि भारतीयों सहित कई विदेशी नागरिकों को धोखे से युद्ध में धकेल दिया गया है।
इस साल अक्टूबर की शुरुआत में विदेश मंत्रालय (MEA) ने जानकारी दी थी कि 259 भारतीय नागरिकों को रूसी सशस्त्र बलों में भर्ती किया गया था। इनमें से 139 लोग वापस भारत लौट आए हैं।
इससे पहले सितंबर के अंत में विदेश मंत्रालय ने विदेशों में नौकरी खोजने वाले भारतीयों को सतर्क रहने की सलाह दी थी। मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि बिना वेरिफिकेशन वाले किसी भी जॉब ऑफर के लालच में न आएं, क्योंकि इसमें बड़े जोखिम और खतरे शामिल हैं।
शीतल ने बताया कि पुलिस जांच में रमणीक का वीजा एकदम “असली” पाया गया है। लापता होने से पहले उनके पति ने बेटे की पढ़ाई के लिए 50,000 रुपये भेजे थे। शुरुआती बातचीत में रमणीक के कथित टीम लीडर अर्जुन ने भी भरोसा दिलाया था कि वे पूरी तरह से सुरक्षित हैं।
हालांकि, शीतल के मुताबिक कुछ समय बाद अर्जुन ने उनके फोन उठाना बंद कर दिया। शीतल ने कहा, “हमारी आखिरी बातचीत में अर्जुन ने बताया था कि रमणीक का किसी दूसरी जगह ट्रांसफर कर दिया गया है। लेकिन चार महीने से ज्यादा वक्त बीत चुका है और हमारा उनसे कोई संपर्क नहीं हुआ है। हम बेहद चिंतित हैं।”
परिवार ने मदद के लिए भारतीय और रूसी दोनों ही अधिकारियों से संपर्क किया है, लेकिन अब तक उन्हें कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला है।
शीतल ने आगे बताया, “हमने मुंबई में रूसी महावाणिज्य दूतावास, मास्को में भारतीय दूतावास के साथ-साथ दिल्ली में विदेश मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को ईमेल कर रमणीक को खोजने का अनुरोध किया है। अभी तक हमें कोई जवाब नहीं मिला है और हम बस प्रार्थना कर रहे हैं।”
हजारों अन्य हीरा कारीगरों की तरह रमणीक सखवाला का परिवार भी सौराष्ट्र के अमरेली जिले से सूरत आकर बसा था। सूरत भारत का डायमंड कटिंग और पॉलिशिंग हब है, जहां से दुनिया के 90% से अधिक बिना तराशे हुए हीरे गुजरते हैं।
सखवाला परिवार कतारगाम इलाके में एक दो मंजिला मकान में रहता है। रमणीक के पिता कालूभाई आज भी अमरेली में ही रहते हैं।
घर में कमाई का कोई नियमित जरिया न होने के कारण, शीतल ने परिवार चलाने और बेटे की स्कूल फीस भरने के लिए अब कपड़े सिलने का काम शुरू कर दिया है।
रमणीक के छोटे भाई महेश उसी मकान के भूतल पर रहते हैं। उन्होंने बताया, “मेरे बड़े भाई ने सूरत में 12वीं कक्षा तक पढ़ाई की है और 18 साल तक हीरा उद्योग में काम किया। वे पहले अच्छी सैलरी पाते थे, लेकिन पिछले कुछ सालों में मंदी के कारण कंपनी ने उनका वेतन घटाकर 15,000 रुपये कर दिया था। वे परिवार के भविष्य को लेकर चिंतित थे, इसलिए उन्होंने जिंदगी संवारने के लिए विदेश जाने का फैसला किया।”
महेश ने बताया कि रमणीक ने सबसे पहले रूस के हीरा उद्योग में नौकरी पाने की कोशिश की थी। रूस मात्रा और उत्पादन मूल्य दोनों ही लिहाज से दुनिया का सबसे बड़ा हीरा उत्पादक देश है। महेश ने कहा, “उनके पास वहां का कोई रेफरेंस नहीं था इसलिए उन्हें नौकरी नहीं मिली। मजबूरन उन्होंने एक मॉल के स्टोरकीपिंग डिपार्टमेंट में काम करना शुरू किया।”
साल 2025 में रमणीक के साथ रूस जाने वाले उनके दोस्त पंकज जीवानी ने बताया, “हम डेढ़ महीने तक मास्को में साथ रहे। हम दोनों रूस में एक उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन मुझे वापस लौटना पड़ा क्योंकि वहां का मौसम मुझे बिल्कुल रास नहीं आया।”
पंकज इन दिनों इंडोनेशिया में हैं। उन्होंने फोन पर जानकारी दी कि उनकी रमणीक से आखिरी बार जून 2026 के पहले सप्ताह में बात हुई थी। पंकज ने कहा, “उन्होंने मुझसे बताया था कि वे रूसी सेना में शामिल हो गए हैं। उसके बाद मैंने कई बार उनसे बात करने की कोशिश की, लेकिन उनका फोन हमेशा अनरीचेबल ही रहा।”
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