गुजरात सरकार वन्यजीवों और इंसानों के बीच बढ़ते संघर्ष को रोकने के लिए एक बड़ा और तकनीकी कदम उठाने जा रही है। राज्य के संरक्षित जंगलों में शेरों, भालुओं, काले हिरणों और जंगली गधों की निगरानी के लिए गांधीनगर में एक अत्याधुनिक ‘कमांड एंड कंट्रोल सेंटर’ (CCC) स्थापित किया जाएगा।
वन एवं पर्यावरण मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने बताया कि इस सिस्टम को लगाने का काम पहले ही शुरू हो चुका है। इसके जरिए वन विभाग को अलग-अलग फीड्स से जंगलों का लाइव डेटा मिलेगा। इससे किसी भी तरह की आपातकालीन स्थिति से तुरंत और प्रभावी ढंग से निपटने में काफी मदद मिलेगी।
करीब 150 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला यह प्रोजेक्ट राज्य के पूरे निगरानी नेटवर्क को आधुनिक बना देगा। हाल ही में शेरों और भालुओं के हमलों की कई घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें से कुछ बेहद जानलेवा साबित हुई हैं। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए तकनीक का सहारा लिया जा रहा है।
गुजरात पूरी दुनिया में एशियाई शेरों का एकमात्र प्राकृतिक घर है। पिछले दो दशकों में इन शेरों की आबादी में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। आखिरी जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, राज्य के 11 जिलों में कुल 891 शेर मौजूद हैं।
शेरों के अलावा, दुनिया भर में भारतीय जंगली गधे (Equus Hemionus Khur) का एकमात्र जीन पूल भी गुजरात में ही है। यह पृथ्वी पर जीवित बची छह उप-प्रजातियों में से एक है, जो कच्छ के इलाके में पाई जाती है।
मंत्री मोढवाडिया ने स्पष्ट किया कि कमांड सेंटर भले ही गांधीनगर में होगा, लेकिन यह सीसीटीवी नेटवर्क के जरिए राज्य के सभी प्रमुख वन्यजीव क्षेत्रों से जुड़ा रहेगा। इस प्रोजेक्ट में ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित कैमरों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाएगा। इससे किसी भी दुर्घटना या जानवरों की हलचल होने पर आसपास के लोगों को समय रहते अलर्ट किया जा सकेगा।
वन विभाग विशेष रूप से ‘ग्रेटर गिर’ इलाके में सीसीटीवी का एक मजबूत नेटवर्क बिछाएगा। यह वह इलाका है जो राष्ट्रीय उद्यान और शेरों के मुख्य संरक्षित वन क्षेत्र के बाहर आता है। हालांकि इस योजना का मुख्य फोकस शेरों पर है, लेकिन यह कच्छ के छोटे रण में जंगली गधों, वेलावदर के ब्लैकबक अभयारण्य और बनासकांठा के भालू कॉरिडोर को भी पूरी तरह से कवर करेगा।
अब तक वन्यजीवों की निगरानी मुख्य रूप से वॉचटावर, बीट गार्ड और ट्रैकर्स के भरोसे होती थी। वनकर्मी पैदल या गाड़ियों से बड़े जंगल की निगरानी करते थे और रेडियो सेट के जरिए असामान्य गतिविधियों की जानकारी देते थे। लेकिन यह नया हाई-टेक कमांड सेंटर सूचनाओं के आदान-प्रदान की गति को कई गुना बढ़ा देगा।
यह नेटवर्क न सिर्फ इंसानों और जानवरों के संघर्ष को कम करेगा, बल्कि वन प्रबंधन की बारीक योजना बनाने में भी मददगार साबित होगा। अगर जंगल में किसी जानवर के शिकार में कमी आती है या किसी विशेष पेड़ की प्रजाति बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, तो विभाग को तुरंत इसका डेटा मिल जाएगा।
हाल ही में जुलाई के महीने में शेरों के हमलों की तीन बड़ी घटनाएं सामने आई थीं। गिरनार पर्वत पर एक 12 साल के बच्चे और अमरेली के एक गांव में 21 वर्षीय युवक की शेर के हमले में मौत हो गई थी। वहीं, पालीताणा के पास एक चरवाहे पर भी शेर ने जानलेवा हमला किया था।
इन घटनाओं के बाद पालीताणा जैन तीर्थ के संरक्षक ‘शेठ आनंदजी कल्याणजी ट्रस्ट’ ने श्रद्धालुओं को समूहों में यात्रा करने की सख्त सलाह जारी की थी। इन सभी संघर्ष वाले इलाकों में नए कैमरों और सर्विलांस सिस्टम की मदद से विशेष नजर रखी जाएगी।
इस कमांड सेंटर को पश्चिम रेलवे जैसे अन्य निगरानी नेटवर्कों से भी लाइव फीड मिलेगी। हाई कोर्ट में गुजरात वन विभाग द्वारा दायर एक हलफनामे के मुताबिक, 2014 से 2024 के बीच सौराष्ट्र में ट्रेन की चपेट में आने से 19 शेरों की दर्दनाक मौत हुई थी।
इसके बाद रेलवे ने शेरों को बचाने के लिए एआई आधारित निगरानी, 70 ट्रैकर्स, वॉच टावर और अंडरपास जैसी आधुनिक व्यवस्थाएं कीं। ट्रेनों में एलईडी लाइटें लगाई गईं और अमरेली के लीलिया-सावरकुंडला सेक्शन में ऑप्टिक फाइबर केबल बिछाए गए ताकि पटरियों पर शेरों की हलचल का तुरंत पता चल सके। इसका सीधा नतीजा यह हुआ कि अगस्त 2024 से मई 2026 के बीच ट्रेन हादसों में एक भी शेर की जान नहीं गई।
इस नए प्रोजेक्ट के तहत वन विभाग अपने मैदानी कर्मचारियों को ‘बॉडी-वॉर्म कैमरे’ (शरीर पर पहने जाने वाले कैमरे) भी उपलब्ध कराएगा। ये कैमरे सीधे कंट्रोल सेंटर से जुड़े होंगे। अगर ड्यूटी के दौरान किसी कर्मचारी के सामने अचानक शेर, तेंदुआ या भालू आ जाता है, तो कंट्रोल रूम को तुरंत उस स्थिति का पता चल जाएगा।
इस दौरान वन मंत्री ने कच्छ के नलिया में जन्में दूसरे ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ (GIB) चूजे की सुरक्षा पर भी अहम जानकारी साझा की। यह एक बेहद दुर्लभ और लुप्तप्राय पक्षी है। इससे पहले जन्मे पहले चूजे के महज एक महीने बाद ही मारे जाने की आशंका जताई गई थी, जिसके बाद सरकार पूरी तरह सतर्क है।
इस दूसरे चूजे का जन्म ‘जंप-स्टार्ट’ तकनीक के जरिए हुआ है। इसके लिए राजस्थान से एक निषेचित अंडा लाया गया था, जिसे नलिया में एक मादा बस्टर्ड ने सेया था। चिंता की बात यह है कि पूरे गुजरात में अब केवल तीन मादा बस्टर्ड ही बची हैं।
इस नए चूजे को शिकारी पक्षियों और अन्य खतरों से बचाने के लिए 100 हेक्टेयर का एक विशाल बाड़ा बनाया गया है। मंत्री मोढवाडिया ने कहा कि इस दुर्लभ पक्षी का अस्तित्व कई कारकों पर निर्भर करता है, इसलिए इस चूजे की देखभाल परिवार के एक छोटे बच्चे की तरह की जा रही है ताकि यह सुरक्षित रूप से बड़ा हो सके।
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