पेशे के प्रति अपना समर्पण दिखाने के लिए गुजरात की एक डॉक्टर द्वारा रचा गया जनसंपर्क (पीआर) स्टंट अब पूरी तरह से बेनकाब हो गया है। इस घटना ने देश-विदेश के कई जाने-माने डॉक्टरों को कड़ी आलोचना करने पर मजबूर कर दिया है। इसके साथ ही, मेडिकल सेवाओं के प्रचार के लिए सोशल मीडिया के दुरुपयोग और चिकित्सा नैतिकता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
सूरत स्थित माते हॉस्पिटल की सह-मालिक डॉ. कल्पना सवानी, जिनका अस्पताल खुद को ‘हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी सेंटर’ बताता है, हाल ही में सोशल मीडिया पर छाई हुई थीं। कई अकाउंट्स पर उनकी ईमानदारी और समर्पण की जमकर तारीफ की जा रही थी। वायरल वीडियो में उन्हें पहले गरबा खेलते हुए दिखाया गया और फिर यह दावा किया गया कि एक इमरजेंसी कॉल आने पर वह तुरंत मरीज का इलाज करने अस्पताल पहुंच गईं।
शुरुआत में कई पोस्ट्स के जरिए उनके इस समर्पण की सराहना की गई। डॉक्टर ने दावा किया था कि नवरात्रि के दौरान गरबा स्थल से ही उन्होंने एक रैपिडो बाइक बुक की और सीधे अस्पताल के लिए निकल पड़ीं।
राष्ट्रीय मीडिया में भी इस डॉक्टर की खूब तारीफ हुई। अपने वीडियो इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि नवरात्रि के दौरान रात लगभग 12:30 से 1 बजे के बीच उन्हें अस्पताल से एक इमरजेंसी कॉल आया था। इसके बाद वह गंभीर रूप से बीमार मरीज को देखने के लिए तुरंत रैपिडो बुक करके वहां पहुंच गईं।
बताया गया कि वह मरीज बारडोली का रहने वाला था और उसे अस्पताल के इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) में भर्ती कराया गया था।
ऑनलाइन वायरल हो रही तस्वीरों में डॉ. सवानी को पहले गरबा स्थल पर नाचते और फिर उसी गरबा पोशाक में अस्पताल के भीतर दिखाया गया था, जहां बैकग्राउंड में एक वेंटिलेटर भी नजर आ रहा था। उनके इस दावे को कवर करने वाली खबरों में यहां तक कहा गया कि उनके आपातकालीन इलाज के कारण उस मरीज की जान बच गई।
शुरुआत में इस पूरी कहानी ने इंटरनेट पर खूब वाहवाही लूटी। डॉक्टर को एक ऐसे आदर्श पेशेवर के रूप में पेश किया गया, जिसने अपने निजी जीवन और त्योहार के जश्न से ऊपर अपनी पेशेवर जिम्मेदारियों को प्राथमिकता दी।
हालांकि, अब यह पूरा घटनाक्रम एक सोची-समझी स्क्रिप्टेड कहानी के रूप में बेनकाब हो चुका है। कई अन्य डॉक्टरों ने इस झूठ का पर्दाफाश करते हुए कड़े सवाल उठाए हैं। खुलासे में पता चला है कि डॉ. कल्पना सवानी दरअसल एक होम्योपैथ हैं और नियमों के अनुसार, वह सोशल मीडिया पर दिखाए गए उस गंभीर मरीज का उस तरह से इलाज कर ही नहीं सकतीं।
वीडियो में जिस तरह का इलाज करते हुए उन्हें दिखाया गया है, चिकित्सकीय रूप से उसे करने की उनके पास योग्यता ही नहीं है।
डॉ. सवानी की तारीफ वाला वीडियो वायरल होने के बाद, डॉ. नीलदीपसिंह गोहिल ने उनकी योग्यता पर सवाल उठाते हुए गुजरात मेडिकल काउंसिल में शिकायत दर्ज कराई। चूंकि डॉ. कल्पना सवानी एक बीएचएमएस (BHMS) डिग्री धारक हैं और मुख्य जिला स्वास्थ्य अधिकारी (CDHO) के अधिकार क्षेत्र में आती हैं, इसलिए डॉ. गोहिल को वहीं शिकायत दर्ज कराने का निर्देश दिया गया।

इस घटना के एक पीआर स्टंट साबित होने के बाद आईसीयू की तस्वीरों और डॉक्टर की योग्यता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। डॉ. सवानी के पास बैचलर ऑफ होम्योपैथिक मेडिसिन एंड सर्जरी (BHMS) की डिग्री है, जो उन्हें आईसीयू में आपातकालीन इलाज करने का अधिकार नहीं देती। माते हॉस्पिटल में उनके साथ उनके पति डॉ. विशाल सह-मालिक हैं, जो पेशे से स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं।
जांच में यह भी सामने आया है कि पूरी सावधानी से फिल्माए गए और सोशल मीडिया पर शेयर किए गए इस पूरे ड्रामा का जिम्मा एक पेशेवर पीआर और सोशल मीडिया एजेंसी को सौंपा गया था।
भारतीय चिकित्सक डॉ. वरुण सी. (@drcheruvarun) ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर इस कथित आपातकालीन दृश्य की प्रामाणिकता पर सवाल उठाया। उन्होंने लिखा कि यह पूरा ड्रामा इस दंपत्ति द्वारा चलाए जा रहे अस्पताल के लिए बेहद खराब तरीके से रचा गया एक पब्लिसिटी स्टंट लगता होता है।

उन्होंने तस्वीर में दिखने वाले वेंटिलेटर डिस्प्ले पर भी गौर किया और दावा किया कि उसमें दिख रहा वेवफॉर्म किसी असली मरीज के वेंटिलेशन से बिल्कुल मेल नहीं खाता। इससे यह अंदेशा होता है कि मशीन का इस्तेमाल केवल एक दिखावे (प्रॉप) के रूप में किया गया था।
सोशल मीडिया पर ‘द लिवर डॉक’ (@theliverdoc) के नाम से मशहूर हेपेटोलॉजिस्ट डॉ. सिरिएक एब्बी फिलिप्स ने भी डॉक्टर की साख और अस्पताल की विज्ञापित क्रिटिकल-केयर सेवाओं पर कड़े सवाल दागे।
केंद्रीय आयुष मंत्रालय और संबंधित होम्योपैथी नियामक संस्थाओं को संबोधित अपने एक्स पोस्ट में उन्होंने पूछा कि एक बीएचएमएस डॉक्टर ऐसी आपातकालीन स्थिति में कैसे शामिल हो सकता है जहां गहन देखभाल (इंटेंसिव केयर) की आवश्यकता होती है। डॉ. फिलिप्स ने यह भी पूछा कि क्या अस्पताल में उस इमरजेंसी को संभालने के लिए योग्य चिकित्सा कर्मी उपलब्ध थे और उन्होंने अस्पताल की पेशेवर व्यवस्थाओं की कड़ी जांच की मांग की।

इन दोनों डॉक्टरों के पोस्ट ने एक कथित प्रेरणादायक कहानी को पूरी तरह से पलट दिया है। अब यह चर्चा पेशेवर समर्पण के बजाय क्लिनिकल जिम्मेदारी, मेडिकल विज्ञापनों और डॉक्टरों की वास्तविक योग्यताओं के इर्द-गिर्द घूम रही है।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा विनियामक सवाल यह है कि क्या इस डॉक्टर की मान्यता प्राप्त योग्यता और पंजीकरण उन्हें वह विशिष्ट इलाज करने का अधिकार देते हैं, जिसका उन्होंने दावा किया है। भारत में आधुनिक चिकित्सा (एलोपैथी) और होम्योपैथी के लिए अलग-अलग नियम हैं। राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) आधुनिक चिकित्सा के प्रैक्टिशनर्स को नियंत्रित करता है, जबकि राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग होम्योपैथी प्रणाली की देखरेख करता है।
एनएमसी के ‘कोड ऑफ मेडिकल एथिक्स रेगुलेशंस, 2002’ के अनुसार, आधुनिक चिकित्सा में मान्यता प्राप्त योग्यता और आवश्यक पंजीकरण के बिना कोई भी व्यक्ति एलोपैथी की प्रैक्टिस नहीं कर सकता। बीएचएमएस योग्यता का सीधा सा अर्थ है कि संबंधित प्रैक्टिशनर आधुनिक चिकित्सा प्रक्रियाओं का उपयोग करके आईसीयू में आपात स्थिति को संभालने के लिए अधिकृत नहीं है।
सोशल मीडिया यूजर्स ने डॉ. सवानी के पति डॉ. विशाल सवानी की भी कुछ तस्वीरें शेयर की हैं। इन तस्वीरों में उन्हें नवजात शिशुओं को बेहद विवादास्पद तरीके से पकड़े हुए दिखाया गया है, जिससे बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी तीखे सवाल उठने लगे हैं।

कई डॉक्टरों और जागरूक नागरिकों ने संबंधित अधिकारियों से इस पूरे एपिसोड की स्वतंत्र जांच करने की मांग की है। लोगों का पूछना है कि क्या अस्पताल में योग्य क्रिटिकल-केयर कर्मचारी मौजूद थे, और क्या सोशल मीडिया पर रची गई कहानी वास्तव में सच थी। इस घटना ने स्वास्थ्य सेवा संस्थानों को बढ़ावा देने के लिए नाटकीय व्यक्तिगत कहानियों के उपयोग को लेकर एक व्यापक चिंता को जन्म दिया है।
गौरतलब है कि कुछ ही दिन पहले सूरत पुलिस ने ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ की तर्ज पर काम कर रहे 16 फर्जी डॉक्टरों को गिरफ्तार किया था। ये लोग केवल 10वीं और 12वीं कक्षा तक पढ़े थे और इनके पास चिकित्सा अभ्यास की कोई योग्यता नहीं थी, फिर भी वे बेखौफ क्लीनिक चला रहे थे। वे योग्य डॉक्टरों के रूप में मरीजों का एलोपैथिक दवाओं से इलाज कर रहे थे, पर्चे लिख रहे थे और मरीजों को ग्लूकोज ड्रिप तक चढ़ा रहे थे।
उस मामले के बाद से ही मेडिकल योग्यताओं और मरीजों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई थीं। इसके तुरंत बाद डॉ. कल्पना सवानी से जुड़ी इस घटना ने डॉक्टरों की साख और मरीजों की जान को होने वाले संभावित जोखिमों की ओर सबका ध्यान और गहराई से खींच लिया है।
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