19 अक्टूबर को गुजरात के नागरिक समाज संगठनों और चिंतित नागरिकों ने एक संयुक्त बयान जारी कर राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। इस बयान में 14 अक्टूबर 2026 को अहमदाबाद के एक नवरात्रि कार्यक्रम में हुई धार्मिक प्रोफाइलिंग और दक्षिणपंथी समूहों के गैर-कानूनी हस्तक्षेप की कड़ी निंदा की गई है।
यह पूरी घटना शेला रोड स्थित सवाना पार्टी प्लॉट में आयोजित ‘रंग मोरला फीट आदित्य गढ़वी’ नामक एक व्यावसायिक गरबा कार्यक्रम में हुई। आयोजन के दौरान मंच से एंकर और रेडियो जॉकी आकाश त्रिवेदी ने सार्वजनिक रूप से घोषणा करते हुए गैर-हिंदुओं, विशेषकर मुस्लिम समुदाय के सदस्यों को तुरंत आयोजन स्थल छोड़ने का निर्देश दिया।
इस दौरान विश्व हिंदू परिषद (विहिप) जैसे असंवैधानिक समूहों के निर्देशों का खुला संदर्भ दिया गया और संदिग्ध लोगों की शिकायत करने के लिए बाकायदा एक हॉटलाइन नंबर भी प्रसारित किया गया।
हालांकि, जाने-माने कलाकार आदित्य गढ़वी ने बाद में सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया कि मंच पर तीसरे पक्ष के उपद्रवी समूहों ने जबरन नियंत्रण कर लिया था और यह भेदभावपूर्ण घोषणा उनकी तरफ से की गई थी, जिसका आरजे आकाश त्रिवेदी ने भी मंच से समर्थन किया था।
इस कृत्य को पूरी तरह असंवैधानिक बताते हुए नागरिक समाज ने इसे समानता (अनुच्छेद 14), भेदभाव निषेध (अनुच्छेद 15) और जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) के तहत नागरिकों को मिले संवैधानिक अधिकारों का सीधा और गंभीर उल्लंघन करार दिया है।
इस घोर निंदनीय कृत्य के खिलाफ अनहद (ANHAD) के प्रबंध न्यासी देव देसाई, प्रख्यात मानवाधिकार व शांति कार्यकर्ता, लेखक और प्रशिक्षक सेड्रिक प्रकाश, तथा मूवमेंट फॉर सेक्युलर डेमोक्रेसी की मीनाक्षी जोशी ने पुरजोर तरीके से अपनी आवाज उठाई है। इनके साथ एनएपीएम (NAPM) गुजरात के भार्गव ओझा और पीयूसीएल (PUCL) अहमदाबाद जिला इकाई के राघवन रंगराजन भी इस न्यायोचित मांग का प्रमुखता से नेतृत्व कर रहे हैं।
इन प्रमुख अधिकार कार्यकर्ताओं ने अपने बयान में स्पष्ट रूप से कहा है कि भारत के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ढांचे में किसी भी निजी समूह को मनमाने ढंग से नागरिकों की पहचान जांचने या धार्मिक आधार पर उन्हें बाहर निकालने का कोई कानूनी या नैतिक अधिकार नहीं है।
उन्होंने गुजरात के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और अहमदाबाद के पुलिस आयुक्त से कानून का शासन और जनता का विश्वास बहाल करने के लिए तत्काल प्रभाव से हस्तक्षेप करने की मांग की है।
बयान में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की प्रासंगिक धाराओं, विशेष रूप से धारा 196, 197, 351, 352, 189 और 190 के तहत तुरंत एफआईआर दर्ज करने और समयबद्ध कानूनी जांच शुरू करने की पुरजोर अपील की गई है।
इसके साथ ही कानून को अपने हाथ में लेने वाले असामाजिक तत्वों और अवैध स्क्रीनिंग की अनुमति देकर मूकदर्शक बने रहने वाले आयोजनकर्ताओं के खिलाफ सख्त संस्थागत और निर्णायक कार्रवाई पर भी जोर दिया गया है।
हस्ताक्षरकर्ता संगठनों ने चेतावनी देते हुए रेखांकित किया है कि यह कोई इकलौती घटना नहीं है, बल्कि वडोदरा, सूरत, भावनगर और अहमदाबाद के अन्य हिस्सों में भी इस तरह की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। उन्होंने समूचे नागरिक समाज से अपील की है कि बढ़ती असहिष्णुता और सतर्कतावाद (Vigilantism) का डटकर विरोध करें, ताकि राज्य का सामाजिक ताना-बाना और सार्वजनिक स्थलों पर सभी की समान भागीदारी सुरक्षित रह सके।
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