भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) के पोर्टल ईसीआईनेट (ECINET) को लेकर एक थर्ड-पार्टी ऑडिट में चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। इस ऑडिट के अनुसार, पोर्टल के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कोड में एक ऐसा विशेष फीचर मौजूद था जो केवल पश्चिम बंगाल के निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (ईआरओ) और सहायक ईआरओ (एईआरओ) को मतदाताओं के गणना फॉर्म की समीक्षा करने से रोकता था।
इसके साथ ही, यह फीचर उन्हें नोटिस-और-सुनवाई डैशबोर्ड देखने से भी वंचित कर सकता है।
यह तकनीकी पड़ताल सिविक-टेक पहल ‘चर्चाग्राम’ द्वारा की गई थी। इस ऑडिट में पाया गया कि यह रहस्यमयी फीचर 19 अक्टूबर तक प्राप्त किए गए कोड में सक्रिय रूप से मौजूद था। सबसे गौर करने वाली बात यह है कि देश के किसी भी अन्य राज्य के ईआरओ और एईआरओ के लिए कोड में इस तरह का कोई प्रतिबंध या तकनीकी अपवाद नहीं पाया गया है।
हालांकि इस ऑडिट की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो पाई है, और यह भी स्पष्ट नहीं है कि इस फीचर का व्यावहारिक इस्तेमाल कभी किया गया था या इसे पहली बार सिस्टम में कब जोड़ा गया था। इस गंभीर विषय पर चुनाव आयोग की तरफ से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
‘चर्चाग्राम’ के डेटा वैज्ञानिक सौरव राजपूत ने 2, 6, 7 और 9 अक्टूबर को यह बारीक़ जांच की थी। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में बताया कि एसआईआर (SIR) चरण-2 के लैंडिंग पेज पर चुनाव अधिकारियों के लिए “व्यू एन्यूमरेशन फॉर्म डिटेल्स” का विकल्प उपलब्ध था, लेकिन कोड में पश्चिम बंगाल के लिए एक अलग से अपवाद लिखा गया था।
राजपूत ने स्पष्ट किया कि यह विकल्प एक सामान्य सुविधा है जो सभी अधिकारियों के लिए मौजूद होती है। लेकिन कोडबेस में पश्चिम बंगाल को अलग से हार्ड-कोड किया गया था, जिसके चलते बंगाल के ईआरओ और एईआरओ को इस सुविधा से बाहर रखा गया था।
यही तकनीकी पाबंदी नोटिस-और-सुनवाई वाले डैशबोर्ड पर भी लागू की गई थी। यह डैशबोर्ड एक ऐसी विंडो है जिसे मतदाता पंजीकरण और मतदाता सूची के संशोधन से संबंधित नोटिस और सुनवाई की कार्रवाइयों को ट्रैक करने, प्रोसेस करने और निपटाने के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किया गया है।
फॉर्म विवरण देखने वाले पेज पर प्रत्येक फॉर्म की पूरी जानकारी मौजूद होती है, जिसमें निर्वाचन क्षेत्र, भाग संख्या, क्रम संख्या, मतदाता का आईडी नंबर और नाम शामिल होता है। इसके अलावा इसमें यह भी दर्ज होता है कि फॉर्म किसने जमा किया, कौन से दस्तावेज अपलोड किए गए और बूथ स्तर के अधिकारी की क्या सिफारिश थी।
इसी पेज पर सुनवाई के आदेश वाले दस्तावेज़ होते हैं और फॉर्म को वापस बीएलओ के पास भेजने का विकल्प भी दिया जाता है।
डेटा वैज्ञानिक के अनुसार, उनकी यह जांच केवल उस डेटा तक सीमित थी जो वेबसाइट सार्वजनिक तौर पर सभी को दिखाती है। टीम ने साइट के उस फ्रंट-एंड जावास्क्रिप्ट बंडल की समीक्षा की, जो बिना किसी लॉग-इन के अपने आप लोड होता है और जिसे कोई भी आम यूजर ब्राउज़र में खोल सकता है। इस दौरान किसी भी प्रकार के लॉग-इन क्रेडेंशियल का इस्तेमाल नहीं किया गया।
राजपूत ने बताया कि यह ऑडिट केवल फ्रंटएंड पर लगाए गए प्रतिबंधों की पुष्टि करता है, क्योंकि सर्वर के भीतर क्या नियम लागू हैं यह बाहर से दिखाई नहीं देता। जब उनसे पूछा गया कि क्या यह नियम पहले के वर्ज़न में भी मौजूद था, तो उन्होंने जवाब दिया कि उनके पास पुराने वर्ज़न का एक्सेस नहीं था, इसलिए वे यह नहीं कह सकते कि यह नियम पहले से था या बाद में बदला गया है।
इस पोर्टल का मौजूदा बिल्ड 16 अक्टूबर को पेश किया गया था, जबकि जांचकर्ता ने 28 सितंबर को पहली बार इस फीचर को ऐप में देखा था। गौरतलब है कि विशेष सघन संशोधन अभियान पश्चिम बंगाल में काफी विवादास्पद रहा था, जिसके परिणामस्वरूप 27.1 लाख लोगों को अपने मताधिकार से वंचित होना पड़ा था। यह पूरी प्रक्रिया पिछले साल 4 नवंबर को शुरू की गई थी।
इसके बाद 16 दिसंबर को ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी की गई थी, जिसमें से अभियान से पहले के 7.8% मतदाताओं के नाम हटा दिए गए थे। बाद में चुनाव आयोग ने तार्किक विसंगति (लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी) के आधार पर 1.36 करोड़ अन्य लोगों को भी चिन्हित किया, जो पश्चिम बंगाल में लागू की गई एक बेहद विवादित श्रेणी मानी जाती है।
तार्किक विसंगति की प्रक्रिया की सुनवाई काफी लंबी खिंच गई थी क्योंकि ईआरओ के पद पर तैनात अधिकारियों की रैंक को लेकर चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच भारी टकराव पैदा हो गया था।
इस गतिरोध को खत्म करने के लिए 20 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए सुनवाई की यह जिम्मेदारी न्यायिक अधिकारियों को सौंप दी थी। शीर्ष अदालत ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से मौजूदा और पूर्व न्यायिक अधिकारियों को इस काम में नियुक्त करने को कहा था।
अदालत ने 24 फरवरी को संज्ञान लिया कि लगभग 250 न्यायिक अधिकारियों को करीब 50 लाख मामले सौंपे गए हैं, जिसका सीधा अर्थ था कि इस पूरी प्रक्रिया में 80 दिन तक लग सकते थे।
इसके परिणामस्वरूप कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों की संख्या बढ़ा दी और आदेश दिया कि केवल 14 फरवरी या उससे पहले जमा किए गए दस्तावेजों पर ही विचार किया जाएगा। अदालत ने स्पष्ट कर दिया था कि दस्तावेजों के प्रति पीठासीन न्यायिक अधिकारियों को संतुष्ट करने की पूरी जिम्मेदारी ईआरओ और एईआरओ की ही होगी।
इन न्यायिक अधिकारियों ने अपनी जांच का काम 6 अप्रैल को पूरा कर लिया था। कुल 1.36 करोड़ विसंगति मामलों में से 22 लाख नामों को मतदाता सूची से हटा दिया गया था।
जिन लोगों के नाम काटे गए, उन्हें 19 अपीलीय न्यायाधिकरणों में से किसी एक में जाने का अवसर भी दिया गया, हालांकि विधानसभा चुनाव करीब आने तक ये ट्रिब्यूनल पूरी तरह से स्थापित भी नहीं हो पाए थे। अंतिम सूची 28 फरवरी को प्रकाशित हुई, जिसमें से 10% मतदाताओं को हटा दिया गया था।
विसंगति मामलों के भारी बैकलॉग के कारण, अप्रैल में होने वाले बंगाल विधानसभा चुनाव के ठीक एक दिन पहले तक पूरक सूचियां जारी करनी पड़ी थीं। अंततः कुल 27.1 लाख लोगों को मतदान के अधिकार से पूरी तरह वंचित होना पड़ा। नाम हटाने और जोड़े जाने के खिलाफ की गई लगभग 38 लाख अपीलें आज भी न्यायाधिकरणों के समक्ष लंबित पड़ी हैं।
पिछले दो महीनों में इन ट्रिब्यूनल्स की अध्यक्षता कर रहे कई न्यायाधीशों ने चुनाव आयोग के पोर्टल और बैकएंड प्रक्रियाओं की शिकायत करते हुए कहा है कि इन तकनीकी खामियों से उनके काम में बाधा उत्पन्न हो रही है।
इस पूरे विवाद के बीच, तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी ने 21 फरवरी को आरोप लगाया था कि बंगाल में ईआरओ अब पोर्टल पर अपने एईआरओ की प्रगति की निगरानी करने में सक्षम नहीं रह गए हैं। उन्होंने इसे जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 13बी और 13सी का सीधा उल्लंघन बताया था, जिसके तहत ईआरओ को मतदाता सूची तैयार करने का मुख्य जिम्मेदार माना जाता है और एईआरओ को सीधे उनके नियंत्रण में रखा जाता है।
सुप्रीम कोर्ट के वकील हर्षित आनंद ने बताया कि यदि पोर्टल में ऐसा कोई फीचर लागू किया गया है, तो यह सीधे तौर पर अदालत के निर्देशों का उल्लंघन होगा। उनके मुताबिक पश्चिम बंगाल के संदर्भ में तो यह विकल्प सुप्रीम कोर्ट के आदेश के स्पष्ट रूप से खिलाफ जाता है। उ
न्होंने बताया कि अदालती आदेश दस्तावेजों के सत्यापन की प्राथमिक जिम्मेदारी ईआरओ और एईआरओ पर डालते हैं, जबकि न्यायिक अधिकारियों की संतुष्टि इसके बाद का कदम है। ऐसे में अधिकारियों को फॉर्म और दावों तक पहुंचने से रोकना न्यायिक प्रक्रिया में भी बाधा उत्पन्न करेगा, क्योंकि जज खुद दस्तावेजों का सत्यापन नहीं करते बल्कि वे पूरी तरह से चुनाव अधिकारियों की रिपोर्ट पर ही निर्भर होते हैं।
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