भुज से करीब 80 किलोमीटर दूर कच्छ जिले के लखपत तालुका स्थित ‘माता नो मढ’ के आसपास मिलने वाली पीली-भूरी मिट्टी आम लोगों के लिए भले ही साधारण हो, लेकिन अंतरिक्ष विज्ञानियों के लिए यह बेहद खास है। वैज्ञानिकों को इस मिट्टी में एक ऐसा खनिज मिला है, जो मंगल ग्रह की सतह पर पाए जाने वाले खनिजों के बिल्कुल समान है।
अहमदाबाद स्थित फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी (PRL) और आईआईटी-गांधीनगर (IIT-Gandhinagar) के शोधकर्ताओं ने इस पर एक विस्तृत अध्ययन किया है। यह रिसर्च मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित है कि कच्छ की यह मिट्टी मंगल ग्रह से मिलने वाले रिमोट सेंसिंग डेटा के विश्लेषण में किस तरह मददगार साबित हो सकती है।
इस महत्वपूर्ण अध्ययन को करने वाली टीम में दिनेश करुणाकरन, नीरज श्रीवास्तव, अभिषेक वर्मा, त्विशा कपाड़िया और ध्वनिल पटेल शामिल हैं।
पीआरएल के वैज्ञानिक और इस अध्ययन के सह-लेखक डॉ. श्रीवास्तव ने बताया कि शोध के लिए माता नो मढ का चयन इसलिए किया गया क्योंकि यहां की बेसाल्टिक तलछटी परतों (basaltic sedimentary layers) में लगभग शुद्ध ‘नैट्रोजारोसाइट’ (natrojarosite) खनिज पाया गया था।
डॉ. श्रीवास्तव के अनुसार, इस तरह के खनिज का निर्माण यह दर्शाता है कि अतीत में यहां का वातावरण शुष्क, अम्लीय (acidic) और पानी की कमी वाला रहा होगा। कच्छ में इस खनिज को बनाने वाली ये विशेष जलवायु परिस्थितियां मंगल ग्रह के भूगर्भीय इतिहास में भी मौजूद थीं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि मंगल ग्रह के कई क्षेत्रों, जैसे मेरिडियानी प्लैनम, वैलेस मेरिनेरिस, मावर्थ वालिस और गेल क्रेटर में ऑर्बिटल और रोवर-आधारित स्पेक्ट्रोस्कोप के जरिए ‘जारोसाइट’ (jarosite) का पता चला है। सल्फेट वाले इन खनिजों की व्यापक मौजूदगी इस संभावना को मजबूत करती है कि मंगल ग्रह पर नैट्रोजारोसाइट जैसे अन्य खनिज भी मौजूद हो सकते हैं।
इस रिसर्च का शीर्षक ‘विजिबल एंड नियर-इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोगोनियोमेट्री ऑफ नैट्रोजारोसाइट, अ मार्शियन एनालॉग फ्रॉम माता नो मढ, इंडिया’ है। इसे हाल ही में प्रसिद्ध एल्सेवियर जर्नल ‘इकारस’ (Icarus) में प्रकाशित किया गया है।
वैज्ञानिकों ने कच्छ से लिए गए इन सैंपल्स का उपयोग मंगल ग्रह की सल्फेट युक्त चट्टानों के ‘एनालॉग’ (प्रतिरूप) के रूप में किया है। इससे सैटेलाइट डेटा के आधार पर मंगल ग्रह पर नैट्रोजारोसाइट की बेहतर पहचान करने और वहां के प्राचीन पर्यावरण को समझने के लिए एक मजबूत आधार तैयार हुआ है।
कच्छ में मिले इस लगभग शुद्ध नैट्रोजारोसाइट के विभिन्न पहलुओं का गहराई से अध्ययन करने के बाद, वैज्ञानिकों ने इसकी विशेषताओं की एक पूरी ‘लाइब्रेरी’ तैयार की है। अब मंगल ग्रह से मिलने वाले डेटा की सीधे इस लाइब्रेरी से तुलना की जा सकेगी।
शोधकर्ताओं का मानना है कि इस रिसर्च के नतीजे मंगल ग्रह के कक्षीय और रोवर द्वारा जुटाए गए डेटा की सटीक व्याख्या करने में मदद करेंगे। इससे न केवल खनिजों की संरचना, बल्कि उनके कणों के आकार, प्रकीर्णन (scattering) व्यवहार और देखने की ज्यामिति को समझने में भी आसानी होगी। इसके अलावा, इस साइट के नमूनों के स्पेक्ट्रोस्कोपिक विश्लेषण का उपयोग सल्फेट युक्त मंगल ग्रह जैसी कृत्रिम मिट्टी (simulant) विकसित करने और इस खनिज की प्रकृति से जुड़े कई अहम सवालों के जवाब खोजने में किया जा सकेगा।
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