गुजरात में एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। विश्व हिंदू परिषद (VHP) की आपत्ति के बाद राज्य सरकार ने अपनी प्रतिष्ठित वार्षिक दिवाली मैगजीन के वितरण पर रोक लगा दी है। VHP का आरोप है कि मैगजीन में छपी दिग्गज पत्रकार और कवि अजीज टंकारवी की एक कविता से धार्मिक भावनाओं को भारी ठेस पहुंची है।
VHP की इस आपत्ति को गंभीरता से लेते हुए मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) ने तुरंत प्रभाव से मैगजीन के वितरण पर रोक लगाने का आदेश दिया है। ऐसी चर्चा है कि संपादकीय चूक की जांच के लिए सरकार जल्द ही एक समीक्षा समिति का गठन कर सकती है। इस विवाद ने सोशल मीडिया पर भी एक नई बहस छेड़ दी है, जहां लोग साहित्य की अभिव्यक्ति की आजादी और धार्मिक संवेदनशीलता के मुद्दे पर बंटे हुए नजर आ रहे हैं।

सूचना विभाग द्वारा प्रकाशित होने वाली गुजरात सरकार की यह दिवाली मैगजीन एक ‘कलेक्टर एडिशन’ मानी जाती है। 450 से अधिक पन्नों वाले इस विशेष अंक में बेहतरीन कविताएं, निबंध, तस्वीरें और हास्य लेख शामिल होते हैं। लेकिन इस बार मशहूर कवि अजीज टंकारवी की कविता ने VHP का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। संगठन ने कविता को तुरंत हटाने और लेखक के साथ-साथ इसे पास करने वाले वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की है।
यह पूरी आपत्ति ‘प्रेम मा ना होय काई एवी शरत’ (प्रेम में ऐसी कोई शर्त नहीं होती) नामक कविता को लेकर है, जो गुजरात सरकार के सूचना विभाग द्वारा प्रकाशित ‘गुजरात दीपोत्सव अंक’ के पेज नंबर 389 पर छपी है। इस कविता का मूल संदेश यह है कि सच्चा प्यार बिना किसी शर्त, निस्वार्थ और सीमाओं से परे होता है।
बीते शुक्रवार को मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को लिखे एक पत्र में VHP के प्रदेश सचिव अश्विन पटेल ने इस कविता को शामिल करने पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि इसमें भगवान राम और मीराबाई को लेकर बेहद आपत्तिजनक बातें लिखी गई हैं।
VHP की आपत्ति मुख्य रूप से कविता की अंतिम पंक्तियों पर है, जिसमें लिखा है- “शेख, मीराना मदरसे लई दरस, थई शके तो तारी अंदर था तू रत।” इसका अर्थ है- “हे मौलवी (शेख), मीराबाई के भक्ति के मदरसे में जाकर सबक लें; और हो सके तो अपनी आत्मा में पूरी तरह लीन हो जाएं।” इसमें एक इस्लामी शिक्षण संस्थान यानी ‘मदरसा’ शब्द के इस्तेमाल पर संगठन ने कड़ा ऐतराज जताया है।
संगठन का तर्क है कि दिवाली का धार्मिक महत्व भगवान राम के 14 साल के वनवास के बाद अयोध्या लौटने से जुड़ा है। ऐसे में हिंदू मान्यताओं का अपमान करने वाली किसी भी सामग्री को प्रकाशित करना पूरी तरह से अस्वीकार्य है।
इसके अलावा, कविता की पहली दो पंक्तियों पर भी आपत्ति जताई गई है। इसमें लिखा है- “राम ना आवे हवे जल्दी परत, एतले मुके छे पादुका भरत।” जिसका अर्थ है- “यह जानकर कि भगवान राम अब जल्दी वापस नहीं आएंगे, भरत उनकी जगह राज करने के लिए उनकी पादुकाएं (खड़ाऊं) रख देते हैं।” VHP ने सरकार से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि मैगजीन की कोई और कॉपी जनता तक न पहुंचे।
इस शिकायत के बाद, मुख्यमंत्री कार्यालय ने मैगजीन के वितरण और बिक्री पर तत्काल रोक लगा दी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकारी कार्यालयों और पुस्तकालयों में भेजी जा चुकी मैगजीन की कॉपियों को वापस मंगाने के निर्देश भी दे दिए गए हैं। सूचना विभाग ने इस मामले में आंतरिक जांच भी शुरू कर दी है। यह पता लगाने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की एक समिति बनाई गई है कि छपाई से पहले यह कविता स्क्रूटनी प्रक्रिया से कैसे गुजरी।

यह विवाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे एक्स, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर भी काफी गरमा गया है। VHP के समर्थकों का तर्क है कि सनातन धर्म का अपमान करने वाली किसी भी सामग्री को जनता के पैसे से छपने वाली सरकारी मैगजीन में जगह नहीं मिलनी चाहिए। कुछ लोग तो कवि की गिरफ्तारी और जिम्मेदार अधिकारियों के निलंबन की भी मांग कर रहे हैं।
दूसरी ओर, कुछ लेखकों और यूजर्स का मानना है कि कविता को उसके साहित्यिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उनका तर्क है कि इन पंक्तियों के जरिए प्रेम और भक्ति की गहराई को दर्शाया गया है, न कि धार्मिक हस्तियों का अपमान किया गया है। उनका साफ मानना है कि साहित्यिक रचनाओं को केवल एक संकीर्ण धार्मिक नजरिए से नहीं परखा जाना चाहिए। इस पूरे मामले पर फिलहाल अजीज टंकारवी की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।
इस विवाद ने अब सरकारी प्रकाशनों के लिए सामग्री का चयन करने में सार्वजनिक संस्थानों की जिम्मेदारी, धार्मिक भावनाओं और साहित्यिक अभिव्यक्ति पर एक व्यापक बहस छेड़ दी है।
आपको बता दें कि ‘गुजरात मैगजीन’ (जिसे गुजरात पाक्षिक भी कहा जाता है) का प्रकाशन 1 मई 1960 को राज्य के गठन के समय से ही हो रहा है। गांधीनगर स्थित सूचना निदेशालय इसे हर महीने की 1 और 16 तारीख को प्रकाशित करता है। यह मैगजीन नागरिकों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं को सरकारी नीतियों, कल्याणकारी योजनाओं और विकास कार्यों की अहम जानकारी देती है।
इसका दिवाली संस्करण, जिसे ‘दीपोत्सव अंक’ कहा जाता है, मुख्य रूप से साहित्य और कला को समर्पित एक वृहद सांस्कृतिक अंक होता है। इसमें गुजरात के शीर्ष साहित्यकारों की रचनात्मक लेखनी, लघु कथाएं, कविताएं, यात्रा वृत्तांत और ऐतिहासिक शोध प्रकाशित होते हैं। यह महज एक सरकारी ब्रोशर से कहीं ज्यादा एक साहित्यिक संग्रह के रूप में पूरे गुजरात में काफी लोकप्रिय है।
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