गुजरात में आप का गणित तो ठीक है, पर जमीन पर उसे नई केमिस्ट्री की जरूरत

| Updated: December 1, 2022 1:47 pm

सूरत के महिदरपुरा हीरा बाजार में, व्यापारियों ने शनिवार को कुछ घंटों के लिए काम रोक दिया था। इसलिए कि उन्हें आम आदमी पार्टी(AAP) की रैली में शामिल होना था।

आप के प्रदेश अध्यक्ष और कटारगाम सीट से उम्मीदवार गोपाल इटालिया; वराछा उम्मीदवार अल्पेश कथीरिया; पार्टी महासचिव और करंज सीट से उम्मीदवार मनोज सोरठिया और सूरत उत्तर के उम्मीदवार मोक्ष संघवी मंच पर थे। सौराष्ट्र में खंभालिया सीट से पार्टी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार इसुदन गढ़वी एक वीडियो कॉल पर दिखाई दे रहे थे। भीड़ से बात की। वह यहीं से  चुनाव लड़ रहे हैं।

इटालिया ने अपनी बात इस तरह शुरू की, “हम युवा हैं, हमें अपना आशीर्वाद दें।” जब वह बोल रहे थे, तब उन्हें सुनने के लिए लोग बालकनियों तक में थे। आप नेताओं ने भीड़ को समझाया कि बीजेपी को वोट देने का मतलब क्या होगा। कहा, “उन लोगों का समर्थन करने का मतलब होगा, उन्हें समर्थन देना जो मोरबी पुल पर हुई मौतों के लिए जिम्मेदार थे और जो तक्षशिला आग में मारे गए थे (कोचिंग क्लास जहां 2019 में सूरत में आग लगने से 22 छात्रों की मौत हो गई थी)।”

भाषण के बाद भारत माता की जय और जय श्री राम के नारों के साथ मीटिंग समाप्त हो गई। लगभग भाजपा की शैली में। वैसे इंकलाब जिंदाबाद के नारे के भी लगे।

सौराष्ट्र, सूरत और दक्षिण गुजरात की उन सभी सीटों पर गुरुवार को यानी पहले चरण में वोट पड़ रहे हैं। पार्टी का कहना है कि उसे इस भूगोल (geography) में कुछ केमिस्ट्री महसूस होती है।

सूरत दरअसल काठियावाड़ी प्रवासियों (migrants) का घर और 2015 के पाटीदार कोटा आंदोलन का केंद्र है। यहां आप ने 2021 के स्थानीय निकाय चुनावों में अपनी पकड़ बनाकर दिखाई है। मुख्य विपक्ष के रूप में कांग्रेस की जगह लेने के लिए इसने निगम की 120 सीटों में से 27 पर जीत हासिल की। इसने इसे एक संकेत के रूप में लिया कि गुजरात में तीसरे मोर्चे के लिए जगह बन रही है। पंजाब की जीत से यहां पार्टी को विस्तार में मदद मिली। इसे देख  दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल के अलावा पंजाब के सीएम भगवंत मान ने भी राज्य के दौरे शुरू कर दिए।

जाहिर है, इस बार आप ज्यादा नजर आ रही है। हवा में उसके झंडे भी खूब दिख रहे हैं। कहना ही होगा कि जिस राज्य में बीजेपी का दबदबा है, वहां कांग्रेस की तुलना में अधिक सतर्क विपक्ष होने के लिए वह खुद को बेहतर रूप में पेश कर रही है। ऐसे में यह त्रिकोणीय मुकाबला 8 दिसंबर को कौन-सा गणित बैठता है, यह देखना दिलचस्प होगा।

विडंबना यह है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही यह कहने में एकजुट हैं कि आप का शोर उसकी ताकत के अनुपात में नहीं है। जब तीसरे मोर्चे की बात आती है तो इतिहास उसके पक्ष में नहीं है। वे सबूत के तौर पर दो पूर्व मुख्यमंत्रियों कि कोशिशों का हवाला देते हैं। एक हैं शंकरसिंह वाघेला, जिन्होंने राष्ट्रीय जनता पार्टी का नेतृत्व किया और दूसरे हैं- केशुभाई पटेल, जिन्होंने गुजरात परिवर्तन पार्टी (जीपीपी) का नेतृत्व किया। यहां तक कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का भी कहना है कि चुनाव भाजपा और कांग्रेस के बीच की लड़ाई है।

हालांकि, दक्षिण गुजरात के आदिवासी गांवों में आप (AAP)  के झंडे और बैनरों की मौजूदगी एक और जटिल कहानी बताती है। तापी जिले के व्यारा तालुका के उछामाला गांव के किसान सुरजीभाई गामित ने केजरीवाल के बारे में सुना और उनकी गारंटी को “आकर्षक” माना। इनमें 300 यूनिट मुफ्त बिजली, मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, 3000 रुपये प्रति माह बेरोजगारी भत्ता और महिलाओं को 1000 रुपये प्रति माह आदि शामिल हैं। गामित कहते हैं, “सरकार तो बदलवु पाडे (हमें सरकार बदलनी है)।”

साबरकांठा जिले के खेड़ब्रह्म तालुका के गाडू कांपा गांव के पूर्व सरपंच रवींद्रभाई पटेल कहते हैं: “जो लोग कांग्रेस को वोट दे रहे थे, वे आप को वोट देंगे।” साथ ही यह भी कहते हैं कि कांग्रेस “नंबर दो” बनी रहेगी। पटेल के अनुसार, “गुजरात में नरेंद्रभाई की रैलियां आप के थोड़े से प्रभाव को भी धो देंगी।”

पहले चरण के लिए गुरुवार को गुजरात की 89 सीटों पर मतदान होने वाला है। केजरीवाल ने 3 नवंबर को तारीखों की घोषणा के बाद से 25 रैलियां और रोड शो किए हैं। उनका अभियान काफी हद तक दिल्ली के स्कूल मॉडल को आगे बढ़ाने पर केंद्रित था। इसमें  “गारंटियों” का सेट और तीर्थयात्रियों को अयोध्या में राम मंदिर ले जाने के वादे का तड़का भी लगा दिया। भाजपा ने आप की गारंटियों को “रेवड़ी” कहा, जो गुजरात के वार्षिक बजट को भारी पड़ेगा।

केजरीवाल ने हाल ही में “कांग्रेस के समर्थकों” से “कांग्रेस के लिए अपना वोट बर्बाद न करने” और इसके बजाय आप को वोट देने की अपील करते करते हुए एक वीडियो जारी किया।

इटालिया और सोरठिया जैसे पार्टी के प्रमुख नेता, जो कभी पाटीदार कोटा आंदोलन का हिस्सा थे, अब खुद  पहला चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार हैं। नेता सौराष्ट्र से भी हैं, यानी ऐसा क्षेत्र जिसने 2015 में कोटा आंदोलन के बाद से चुनावी मंथन देखा है। पार्टी ने 2017 में 29 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन उसे केवल 0.10 प्रतिशत वोट ही मिले।

सौराष्ट्र के भावनगर के पूर्व पुलिस कांस्टेबल इटालिया के अनुसार, चुनावी राजनीति में प्रवेश करने  के केवल दो ही तरीके हैं: “यदि आप दबंग (मजबूत) हैं, और आपने भ्रष्ट तरीकों से बहुत पैसा कमाया, या आप एक राजनीतिक परिवार से संबंध रखते हैं।”

उनका कहना है- “आप ने युवाओं को राजनीति में आने का मौका दिया।  जाहिर है, वे सभी मेरी उम्र के होंगे। 50 साल की उम्र में आदमी थक जाता है, क्योंकि उसे जगह नहीं मिलती। इसलिए मेरे जैसे लोग जो कुछ करना चाहते हैं, संगठित होकर आएं। हम जानते हैं कि मिलेगा कुछ नहीं, मगर सब कुछ संभव है।”

विधानसभा में विपक्ष के पूर्व नेता और सौराष्ट्र में अमरेली से कांग्रेस के उम्मीदवार परेश धनानी का कहना है कि 20 साल बाद वह एक ऐसा चुनाव देख रहे हैं “जो स्वाभाविक रूप से लड़ा जाने वाला चुनाव है, जहां कोई ध्रुवीकरण नहीं दिख रहा है। ध्रुवीकरण मुद्दों को मारता है।”

वह कांग्रेस के लिए आप की धमकी को खारिज करते हैं। लेकिन पाटीदार होने के नाते धनानी स्वीकार करते हैं कि आप की वजह से यह गुजरात चुनाव “मूल मुद्दों” पर लड़ा जा रहा है।

सौराष्ट्र और कच्छ में कुल 54 सीटें हैं। आप नेताओं का दावा है कि इन सीटों पर वे अच्छा प्रदर्शन करेंगे। राजकोट में रहने वाले आप की गुजरात राज्य इकाई के सचिव अजीत लोखिल का कहना है कि इस बार पार्टी का अभियान 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावों से “पूरी तरह अलग” है।

वह कहते हैं, “वे शुरुआती दिन थे जब हम लोगों को यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि AAP नाम की एक पार्टी है। लेकिन अब हम बड़े हो गए हैं… देखिए हमने सूरत और राजकोट के नगर निगम चुनावों में कितना अच्छा प्रदर्शन किया।’ राजकोट नगर निगम में आप को लगभग 4 लाख वोटों में से लगभग 1 लाख वोट मिले। उनका कहना है कि उनकी पार्टी राजकोट की चार शहरी सीटों में से तीन जीतने की स्थिति में है।

गुजरात में आप की ट्रेड विंग के अध्यक्ष और राजकोट दक्षिण से पार्टी के उम्मीदवार शिवलाल बैरसिया ने सामाजिक पटल पर समर्थन का दावा किया है। उन्होंने कहा, “महंगाई ने पाटीदारों से लेकर बनियों और देवीपूजकों तक सभी को परेशान किया है। इसलिए वे सभी हमें वोट देंगे। पाटीदार अपना वोट डालते समय बहुत सावधानी बरतेंगे, क्योंकि वे अभी भी कोटा आंदोलन के दौरान अपने 14 युवकों की मौत से उबर नहीं पाए हैं।”

पार्टी ने दक्षिण गुजरात के आदिवासी इलाकों में कुछ चतुराई भरे कदम उठाए हैं, जहां उसने पूर्व में भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) के साथ रहे नेताओं को टिकट दिया। बीटीपी के साथ उसने मई में गठबंधन की घोषणा की थी, जिसे बीटीपी नेता छोटू वसावा ने एकतरफा रूप से रद्द कर दिया था। अब उनके प्रमुख सहयोगी आप के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं।

बीजेपी के प्रवक्ता राजू ध्रुव आप के आशावाद को हवाई बात कहकर खारिज करते हैं। सौराष्ट्र और कच्छ में भाजपा की जीत का दावा करते हुए उन्होंने कहा, “आप सिर्फ गुजरात में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश कर रही है, ताकि आने वाले दिनों में वह एक राष्ट्रीय पार्टी होने का दिखावा कर सके।”

ध्रुव का कहना है कि पाटीदार भाजपा में वापस आएंगे। उन्होंने कहा, “2017 में हार्दिक पटेल उस समुदाय को गुमराह कर रहे थे और हम नरेंद्र मोदी के विकास के संदेश को लोगों तक ले जाने में विफल रहे। अब हालात बदल गए हैं। नर्मदा का पानी अब किसानों के खेतों और लोगों के घरों में जा रहा है… पीएम किसान सम्मान निधि के तहत किसानों को 2 लाख करोड़ रुपये मिले हैं। यह सारा पैसा गांवों में गया है। हम ग्रामीण क्षेत्रों में भी अच्छा प्रदर्शन करेंगे।”

कांग्रेस आप की एंट्री को बीजेपी के वोट काटने के तौर पर देख रही है। इसलिए गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष और मोरबी में टंकारा विधानसभा सीट के कांग्रेस उम्मीदवार ललित कगथारा कहते हैं, “आप उम्मीदवारों को जो भी वोट मिलने जा रहे हैं, वे बीजेपी के वोट होंगे। यह हमारे लिए अच्छा है और इस चुनाव में हमारे जीतने की संभावना को बढ़ाता है। ”

इटालिया इसे नहीं मानते हैं। उन्होंने कहा, “भाजपा कांग्रेस के दम पर जीतती रही है। अगर आप जैसी नई पार्टी इतने कम समय में इतनी बड़ी जगह बना लेती है, तो कांग्रेस इतने समय से क्या कर रही थी?” वह पूछते हैं, उसे भारी समर्थन क्यों नहीं मिला?”

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