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गुजरात में भूकंप का बढ़ता खतरा: कच्छ के साथ-साथ अहमदाबाद और राजकोट पर भी मंडरा रहा जोखिम, चौंकाने वाले खुलासे

| Updated: June 27, 2026 12:32

कच्छ ही नहीं, अहमदाबाद और राजकोट की इमारतों पर भी मंडरा रहा है बड़ा जोखिम, नई वैज्ञानिक रिसर्च में स्ट्रक्चरल सुरक्षा को लेकर गंभीर चेतावनी

गुरुवार को वेनेजुएला में आए विनाशकारी भूकंप ने गुजरात के लोगों की पुरानी और डरावनी यादें ताजा कर दी हैं। साल 2001 में इस राज्य ने ऐसे ही एक भयंकर भूकंप का सामना किया था जिसने भारी तबाही मचाई थी। ऐतिहासिक रूप से गुजरात हमेशा से भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील क्षेत्र रहा है। अब हाल ही में हुए एक नए अध्ययन ने राज्य के विभिन्न क्षेत्रों के लिए भूकंपीय खतरों के आकलन को पूरी तरह से अपडेट कर दिया है।

शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि कच्छ भले ही सबसे अधिक जोखिम वाला क्षेत्र बना हुआ है, लेकिन अहमदाबाद और राजकोट जैसे प्रमुख शहरी केंद्र भी अलग-अलग भौगोलिक कारणों से खतरे के साये में हैं।

अध्ययन के लेखकों ने वेनेजुएला की घटना से गंभीरता से सबक लेने की अपील की है। उन्होंने सुरक्षित और तेज निकासी के लिए नियमित प्रशिक्षण देने तथा मौजूदा बिल्डिंग कोड के आधार पर संरचनाओं के अनिवार्य भूकंपीय ऑडिट की जोरदार वकालत की है। ‘कॉम्प्रिहेंसिव सरफेस लेवल सीस्मिक हजार्ड असेसमेंट फॉर द स्टेट ऑफ गुजरात, इंडिया: इम्प्लीकेशंस फॉर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर एंड कम्युनिटीज’ नामक यह महत्वपूर्ण रिसर्च हाल ही में स्प्रिंगर के प्रतिष्ठित ‘जियोसाइंसेज जर्नल’ में प्रकाशित हुई है।

इस विस्तृत शोध को आईएसआर (ISR) गांधीनगर, यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम एंड एनर्जी स्टडीज (देहरादून) और यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट के अनुभवी विशेषज्ञों ने अंजाम दिया है। इस शोध दल में मदन मोहन राउत, विजय सिंह चुफाल, संबित प्रसनजीत नाइक, सुमेर चोपड़ा, बी साईराम और उदय भान शामिल हैं। टीम ने स्पष्ट किया कि उनका यह अध्ययन मुख्य रूप से ‘प्रोबेबिलिस्टिक सीस्मिक हजार्ड असेसमेंट’ (PSHA) की वैज्ञानिक पद्धति पर केंद्रित था।

आंकड़ों की सटीकता के लिए टीम ने पिछले 350 वर्षों में आए कुल 1,288 भूकंपों के ऐतिहासिक रिकॉर्ड का गहराई से विश्लेषण किया। इसके आधार पर जमीन हिलने के स्तर की 2 प्रतिशत और 10 प्रतिशत संभावनाओं की वैज्ञानिक गणना की गई। भूगर्भ विज्ञान में इसे ‘पीक ग्राउंड एक्सीलरेशन’ (PGA) के रूप में मापा जाता है, जो यह तय करने का एक मानक पैमाना है कि भूकंप के दौरान जमीन कितनी तीव्रता से कांप सकती है।

उदाहरण के तौर पर, यदि किसी शक्तिशाली भूकंप का केंद्र कच्छ में होता है, तो वहां बेडरॉक (चट्टानी) स्तर पर पीजीए 0.51 g (पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण त्वरण) तक दर्ज हो सकता है। वहीं, कच्छ के कुछ हिस्सों में जमीनी सतह पर यह आंकड़ा 0.57 g के खतरनाक स्तर तक पहुंच सकता है।

इन आंकड़ों की गंभीरता को 2001 के विनाशकारी भूकंप से आसानी से समझा जा सकता है। उस दौरान कच्छ जिले के विभिन्न हिस्सों में पीजीए 0.3 से 0.6 के बीच दर्ज किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप व्यापक स्तर पर तबाही हुई थी। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि 0.1 से ऊपर का कोई भी पीजीए मूल्य निर्मित इमारतों और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखता है।

पारंपरिक भूकंपीय पैमानों वाले पुराने नक्शों की तुलना में, नया पीएसएचए (PSHA) मॉडल संभावित जमीनी झटकों पर कहीं अधिक ध्यान केंद्रित करता है। लेखकों के अनुसार, गुजरात दुनिया के सबसे अधिक भूकंप-संभावित इंट्राप्लेट क्षेत्रों में से एक है। इसलिए यह नया और सटीक डेटा वर्तमान बिल्डिंग कोड की समीक्षा करने और आपदा प्रबंधन तंत्र को मजबूत करने में बेहद मददगार साबित होगा।

रिकॉर्ड बताते हैं कि पिछले दो सौ वर्षों के भीतर गुजरात में 7.7 तीव्रता से अधिक के दो बड़े भूकंप आ चुके हैं, और इन दोनों ही विनाशकारी घटनाओं का केंद्र कच्छ में स्थित था। एक शोधकर्ता ने बताया कि 2001 में भारी तबाही और जनहानि झेलने वाले राज्य के सबसे बड़े शहर अहमदाबाद में अब 0.05 g से 0.08 g का अनुमानित पीजीए दर्ज किया गया है। राज्य की राजधानी गांधीनगर के लिए भी जोखिम के आंकड़े लगभग इसी स्तर के हैं।

हालांकि, शोधकर्ताओं ने गंभीरता से आगाह किया है कि पीजीए के कम आंकड़े सीधे तौर पर खतरे को कम नहीं करते हैं। नरम तलछटी जमाव (sedimentary deposits) पर बसे शहरी इलाकों में बेडरॉक के अनुमानों की तुलना में कहीं अधिक खतरा हो सकता है, क्योंकि ऐसी मिट्टी झटकों की तीव्रता को बढ़ा देती है। यह शोध इस बात की ओर भी साफ इशारा करता है कि वर्तमान में इमारतों की डिजाइनिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले सामान्य भूकंपीय नक्शे स्थानीय स्तर के जमीनी खतरों को ठीक से नहीं पकड़ पाते हैं।

राष्ट्रीय स्तर के बिल्डिंग कोड बड़े इलाकों को एक समान भूकंपीय जोन में बांट देते हैं। लेकिन इस नए आकलन से यह प्रमाणित होता है कि एक ही प्रशासनिक क्षेत्र के भीतर भी जोखिम के स्तर में बहुत बड़ा अंतर हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसी वजह से राज्य भर के औद्योगिक समूहों (industrial clusters) की सुरक्षा नीतियों पर नए सिरे से विचार करने की सख्त जरूरत है।

इस विषय पर बात करते हुए इंस्टीट्यूट ऑफ सीस्मोलॉजिकल रिसर्च (ISR) के पूर्व निदेशक और वर्तमान में आईआईटी रुड़की के फैकल्टी सदस्य प्रोफेसर सुमेर चोपड़ा ने पूर्व तैयारियों पर विशेष जोर दिया। चोपड़ा ने कहा कि वेनेजुएला का हालिया भूकंप यह साबित करता है कि हमें हमेशा अलर्ट रहना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि अहमदाबाद की महत्वपूर्ण और बहुमंजिला इमारतों को स्थानीय भूकंपीय खतरों के आधार पर तय किए गए बिल्डिंग कोड का सख्ती से पालन करना ही चाहिए।

इस मुद्दे पर स्थानीय प्रशासन का पक्ष रखते हुए एएमसी (AMC) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने बताया कि 2001 के भूकंप के बाद से ही शहर में बनने वाली हर नई इमारत का डिजाइन अधिकृत स्ट्रक्चरल इंजीनियर द्वारा तैयार किया जाना अनिवार्य कर दिया गया है, ताकि वे भूकंप रोधी मानकों पर पूरी तरह से खरी उतर सकें।

अधिकारी ने यह भी स्वीकार किया कि विशेष रूप से मानसून से पहले, शहर की पुरानी इमारतों के संरचनात्मक आकलन, उनके रखरखाव और मरम्मत की अत्यंत आवश्यकता है।

गुजरात के इस नए सीस्मिक मैप ने राज्य की भूगर्भीय स्थिति को एक बिल्कुल नए और स्पष्ट नजरिए से पेश किया है। पहले के आकलनों में गुजरात के बड़े हिस्सों को एक ही भूकंपीय इकाई मान लिया जाता था, लेकिन अब इस धारणा को बदल दिया गया है। ताजा शोध में वैज्ञानिकों ने पूरे राज्य को सात अलग-अलग सीस्मोजेनिक (भूकंप उत्पन्न करने वाले) जोनों में सूक्ष्मता से विभाजित किया है।

इन नए चिन्हित जोनों में कच्छ रिफ्ट जोन, सौराष्ट्र जोन, कैम्बे रिफ्ट जोन, नर्मदा रिफ्ट जोन, दक्षिण गुजरात जोन, इंडस डेल्टा जोन और अरावली जोन शामिल हैं। नए और विस्तृत विश्लेषण के अनुसार, इन सभी में कच्छ रिफ्ट जोन भूकंपों का सबसे सक्रिय और ऊर्जावान केंद्र बनकर उभरा है। इसके अलावा कैम्बे और नर्मदा रिफ्ट सिस्टम में मध्यम स्तर की भूकंपीय गतिविधियां दर्ज की गई हैं।

दूसरी ओर, सौराष्ट्र क्षेत्र में बार-बार भूकंप के झटके (earthquake swarms) और मध्यम तीव्रता वाले भूकंप देखे गए हैं। भुज के मामले में अध्ययन बताता है कि यह विशिष्ट क्षेत्र मुख्य रूप से मध्यम दूरी पर आने वाले 6.0 से 6.5 तीव्रता के भूकंपों से सर्वाधिक प्रभावित रहता है।

शहरों के लिहाज से बात करें तो राजकोट में भूकंपीय खतरा मुख्य रूप से दूर के बड़े भूकंपों से निर्धारित होता है, जो क्षेत्रीय कच्छ-सौराष्ट्र टेक्टोनिक स्रोतों से जुड़े होते हैं। इसके ठीक विपरीत, अहमदाबाद की स्थिति बिल्कुल अलग है। अहमदाबाद में भूकंप का खतरा पास के मध्यम भूकंपों से नियंत्रित होता है, जो स्थानीय और कैम्बे रिफ्ट से जुड़ी फॉल्ट लाइनों से उत्पन्न होते हैं।

यही कारण है कि अहमदाबाद शहर अपनी स्थानीय मिट्टी और साइट के प्रभावों के प्रति बहुत अधिक संवेदनशील हो जाता है। अध्ययनकर्ताओं का भरोसा है कि ये सभी नई और गहराई भरी जानकारियां भविष्य में सुरक्षित इमारतों और मजबूत संरचनाओं के डिजाइन तैयार करने में मील का पत्थर साबित होंगी।

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