एक समय था जब अंगदान के विचार मात्र से ही लोग सिहर उठते थे। समाज में कई तरह के अंधविश्वास और डर की जड़ें काफी गहरी थीं। लोगों का मानना था कि नेत्रदान करने का मतलब है अगले जन्म में अंधा पैदा होना। वहीं, किडनी दान करने को लेकर यह खौफ था कि मृत्यु के बाद वे बिना किडनी के ही वापस लौटेंगे। ऐसे दौर में एक गुजराती फिल्म निर्माता ने इन मान्यताओं को चुनौती देने का साहस दिखाया। उन्होंने किसी खोखले उपदेश का सहारा लेने के बजाय, लोगों की सोच बदलने के लिए सिनेमा की ताकत का इस्तेमाल किया।
बड़ौदा के रहने वाले धीरू मिस्त्री ने साल 1972 में अंगदान के विषय पर ‘साथ कुछ न जाएगा’ नामक एक फिल्म बनाई। महज 17 मिनट की इस डॉक्यूमेंट्री ने उस समय समाज में फैले सबसे बड़े मिथकों में से एक पर सीधा प्रहार किया। इस साहसिक और प्रभावशाली कदम के लिए उनकी इस कृति को 1974 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आज 87 वर्ष के हो चुके मिस्त्री उस समय को याद करते हुए बताते हैं कि वह पल उनके लिए बेहद संतोषजनक था, क्योंकि फिल्म बनाने में उनकी सारी मेहनत सफल हो गई थी।
दिल्ली में आयोजित एक भव्य समारोह में धीरू मिस्त्री को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के हाथों यह प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुआ। ‘सर्वश्रेष्ठ शैक्षिक और निर्देशात्मक फिल्म’ की श्रेणी में दिए गए इस पुरस्कार को ग्रहण करते समय उनके साथ मंच पर गिरीश कर्नाड, श्याम बेनेगल, सत्यजीत रे और येसुदास जैसी दिग्गज हस्तियां भी मौजूद थीं।
इस फिल्म के निर्माण की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। मिस्त्री सिनेमा के जरिए लोगों को अंगदान के महत्व के बारे में जागरूक करना चाहते थे। जब गुजरात सरकार ने उनसे किसी सामाजिक मुद्दे पर फिल्म बनाने के लिए संपर्क किया, तो उन्होंने अंगदान का विषय चुनने की अनुमति मांगी। शुरुआत में यह एक बेहद संवेदनशील मुद्दा होने के कारण सरकारी अधिकारी झिझक रहे थे। लेकिन मिस्त्री ने उन्हें समझाया कि कैसे यह फिल्म कई अनमोल जिंदगियां बचाने में मददगार साबित हो सकती है।
उस दौर में गुजरात सरकार केवल गुजराती भाषा में ही फिल्मों की अनुमति देती थी। हालांकि, मिस्त्री ने अधिकारियों को स्पष्ट किया कि वह व्यापक दर्शकों तक पहुंचने के लिए इस डॉक्यूमेंट्री को हिंदी में ही बनाएंगे। इस फिल्म की कहानी एक ऐसे युवा लड़के के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसकी एक दुर्घटना में मौत हो जाती है। इसके बाद एक एनजीओ उसके माता-पिता को नेत्रदान के लिए मनाने का प्रयास करता है। काफी हिचकिचाहट के बाद परिवार सहमत हो जाता है। फिल्म के बेहद भावुक क्लाइमेक्स में मृत लड़के की आवाज अपनी मां से कहती है कि भले ही वह उसे नहीं देख सकती, लेकिन वह किसी और की आंखों से अपनी मां को देख पा रहा है।
इस फिल्म की शूटिंग करना अपने आप में एक बड़ी और जटिल चुनौती थी। मिस्त्री उस वास्तविक प्रक्रिया को कैमरे में कैद करना चाहते थे जहां शरीर से आंखें निकाली जाती हैं। 1970 के दशक में नेत्रदान बहुत दुर्लभ था और कई बार मृतक के परिवार वाले फिल्मांकन की अनुमति नहीं देते थे। अंततः, काफी संघर्ष के बाद अहमदाबाद के एक अस्पताल में आंख निकालने की प्रक्रिया की शूटिंग संभव हो सकी।
फिल्म की शूटिंग के दौरान ही मिस्त्री के जीवन में एक दुखद घटना भी घटी। उनकी दादी, दिवाली बा का वृद्धावस्था के कारण निधन हो गया। इस दुखद घड़ी में भी मिस्त्री ने अपनी दादी की आंखें एसएसजी अस्पताल को दान कर दीं, जो उनके खुद के बनाए सिद्धांतों के प्रति उनके दृढ़ संकल्प को दर्शाता है।
बनकर तैयार होने के बाद जब यह फिल्म सरकार को भेजी गई, तो इसने तुरंत सभी के दिलों को छू लिया। इस फिल्म ने न केवल राष्ट्रीय पुरस्कार जीता, बल्कि देश भर के सिनेमाघरों में इसके कुछ अहम अंश भी दिखाए गए। जनता द्वारा इसे व्यापक रूप से सराहा गया और अंगदान के प्रति लोगों के नजरिए में एक सकारात्मक बदलाव आया। समाज को यह जीवनदायी संदेश देने वाले धीरू मिस्त्री ने खुद भी मरणोपरांत अपना शरीर दान करने का नेक संकल्प लिया है।
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