भारत के सबसे बड़े निजी क्षेत्र के बैंक, HDFC बैंक ने शुक्रवार को एक अहम जानकारी साझा की है। बैंक द्वारा कराई गई एक स्वतंत्र कानूनी जांच में पूर्व अंशकालिक (पार्ट-टाइम) चेयरमैन अतनु चक्रवर्ती के आरोप पूरी तरह से निराधार पाए गए हैं। चक्रवर्ती ने अपने इस्तीफे में बैंक की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे, लेकिन जांचकर्ताओं को इन दावों की पुष्टि के लिए कोई दस्तावेजी सबूत या गवाह नहीं मिला।
अतनु चक्रवर्ती ने 18 मार्च को अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। उस समय उन्होंने अपने फैसले की वजह बताते हुए कहा था कि बैंक के भीतर कुछ ऐसी घटनाएं और प्रथाएं चल रही हैं जो उनके व्यक्तिगत मूल्यों और नैतिकता के अनुकूल नहीं हैं। इसी बयान को लेकर बैंक ने एक विस्तृत कानूनी समीक्षा का आदेश दिया था।
इस मामले की गहन जांच का जिम्मा ‘विल्सन सोंसिनी गुडरिच एंड रोसाती, पी.सी.’ (Wilson Sonsini Goodrich & Rosati, P.C.) और ‘वाडिया घांडी एंड कंपनी’ (Wadia Ghandy & Co.) को सौंपा गया था। इन दोनों अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय लॉ फर्मों ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि जांच के दौरान मिले साक्ष्य चक्रवर्ती के बयानों से बिल्कुल मेल नहीं खाते हैं। उनके दावों का कोई भी ठोस आधार नहीं मिल सका।
कानूनी फर्मों ने अपनी जांच के निष्कर्षों में बताया कि चक्रवर्ती जिन बैठकों में शामिल हुए थे, उनके मिनट्स (कार्यवाही का ब्यौरा) एक बहुत ही व्यापक और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत तैयार किए गए थे। इन दस्तावेजों को ड्राफ्ट करने और मंजूरी देने की प्रक्रिया ने उन्हें पूरा मौका दिया था कि वे अपनी किसी भी आपत्ति को दर्ज करा सकें। इसके बावजूद, उन्होंने बैंक की किसी भी प्रथा या घटना को लेकर अपनी असहमति लिखित रूप में नहीं जताई।
जांच रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि HDFC बैंक और बाहरी लॉ फर्मों ने अतनु चक्रवर्ती से जांच प्रक्रिया का हिस्सा बनने का बार-बार अनुरोध किया था। उनसे इस मुद्दे पर बात करने की कई बार गुजारिश की गई, लेकिन अंततः उन्होंने जांचकर्ताओं को अपना कोई इंटरव्यू नहीं दिया।
कानूनी जांच में बोर्ड को क्लीन चिट मिलने के बाद अब HDFC बैंक के एमडी और सीईओ शशिधर जगदीशन की पुनर्नियुक्ति का रास्ता साफ होता दिख रहा है। जगदीशन का वर्तमान कार्यकाल इसी साल अक्टूबर में समाप्त हो रहा है।
बोर्ड इस कानूनी समीक्षा की रिपोर्ट का ही इंतजार कर रहा था, जिसके चलते उनके सेवा विस्तार पर फैसला रुका हुआ था। जगदीशन को पहली बार 2020 में तीन साल के लिए नियुक्त किया गया था और फिर 2023 में उनका कार्यकाल तीन साल के लिए और बढ़ा दिया गया था।
इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब बैंक ने 24 मार्च को घोषणा की कि वह चक्रवर्ती के इस्तीफे वाले पत्र में उठाए गए मुद्दों का मूल्यांकन करेगा। इस बात की जांच की जानी थी कि क्या उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कभी अपनी असहमति दर्ज कराई थी या नहीं। इस समीक्षा के दायरे में चक्रवर्ती के इस्तीफे से ठीक पहले के दो वर्षों के कार्यकाल को शामिल किया गया था।
बैंक प्रशासन के अनुसार, स्वतंत्र कानूनी फर्मों ने इस संदर्भ अवधि के दौरान बोर्ड और संबंधित समितियों की बैठकों के एजेंडे और मिनट्स की बारीकी से जांच की। इसके अलावा सभी स्वतंत्र निदेशकों, समिति के अध्यक्षों, एमडी, सीईओ और वरिष्ठ प्रबंधन के कई प्रमुख अधिकारियों के साक्षात्कार भी लिए गए।
कानूनी फर्मों ने अपने बयान में कहा कि उन्होंने पूर्व चेयरमैन के आरोपों की पूरी तरह से निष्पक्ष और विस्तृत समीक्षा की है। यह जांच प्रक्रिया तीन महीने तक चली, जिसमें हजारों दस्तावेजों को खंगाला गया और बैंक के शीर्ष प्रबंधन के कई अहम सदस्यों से लंबी पूछताछ की गई।
इस पूरी जांच में ‘दुबई मामले’ की भी काफी चर्चा रही। जांचकर्ताओं ने बताया कि चक्रवर्ती ने अपने इस्तीफे के बाद सार्वजनिक बयानों में दुबई प्रकरण का जिक्र जरूर किया, लेकिन जांच में ऐसा कोई भी समकालीन सुबूत नहीं मिला जो यह साबित कर सके कि उन्होंने कभी इसके खिलाफ आवाज उठाई थी। पद पर रहते हुए उन्होंने दुबई मामले या किसी अन्य फैसले पर अपनी नैतिकता को लेकर कोई चिंता व्यक्त नहीं की थी।
दरअसल, बैंक छोड़ने के बाद एक इंटरव्यू में चक्रवर्ती ने कई मुद्दों पर चिंता जताई थी, जिसमें दुबई में एटी-1 (AT-1) बॉन्ड की गलत तरीके से हुई बिक्री भी शामिल थी। चक्रवर्ती के इस्तीफे के ठीक दो दिन बाद, मिस-सेलिंग की इन्ही चिंताओं के कारण बैंक ने अपने तीन अधिकारियों को नौकरी से निकाल दिया था।
यह पूरा मामला दुबई ब्रांच में अनिवासी भारतीयों (एनआरआई) को क्रेडिट सुइस (Credit Suisse) के एटी-1 बॉन्ड बेचने से जुड़ा था। इन्हें ग्राहकों को फिक्स्ड-मैच्योरिटी बॉन्ड बताकर बेचा गया था। जब क्रेडिट सुइस दिवालिया हुआ और उसे एक अन्य दिग्गज बैंक यूबीएस (UBS) ने खरीद लिया, तो इन बॉन्ड्स की वैल्यू पूरी तरह से शून्य (write-off) हो गई थी।
अंत में, दोनों कानूनी फर्मों ने अपनी रिपोर्ट का सार पेश करते हुए कहा कि मौजूदा सबूत पूरी तरह से अतनु चक्रवर्ती के बयानों के विपरीत हैं। बाहरी जांच एजेंसियों को उनके द्वारा लगाए गए किसी भी आरोप का कोई आधार नहीं मिला है।
HDFC बैंक ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस विस्तृत कानूनी समीक्षा के पूरा होने के बाद, बाहरी लॉ फर्मों की अंतिम रिपोर्ट अब बैंक के निदेशक मंडल (बोर्ड) को सौंप दी गई है।
यह भी पढ़ें-









