गुजरात हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को एक बेहद अहम निर्देश दिया है। अदालत ने हरेन पंड्या हत्याकांड के दोषी और शार्पशूटर मोहम्मद असगर अली की समय से पहले रिहाई की याचिका पर छह महीने के भीतर अंतिम फैसला लेने को कहा है।
आजीवन कारावास की सजा काट रहे अली ने हाल ही में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में उसका कहना था कि सरकार उसकी सजा माफी और रिहाई की अर्जी पर कोई कदम नहीं उठा रही है।
अदालत में असगर अली के वकील ने मजबूती से अपना पक्ष रखा। उन्होंने कोर्ट को बताया कि उनका मुवक्किल पहले ही 14 साल जेल की सलाखों के पीछे बिता चुका है और जेल के भीतर उसका आचरण भी पूरी तरह से संतोषजनक रहा है।
गौरतलब है कि राज्य के पूर्व गृह मंत्री हरेन पंड्या की 26 मार्च 2006 को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस हाई-प्रोफाइल हत्याकांड के कुछ ही दिनों बाद अली को गिरफ्तार कर लिया गया था। सीबीआई की जांच में यह बात सामने आई थी कि इस वारदात को 2002 के गुजरात दंगों के प्रतिशोध के रूप में अंजाम दिया गया था।
इस सनसनीखेज मामले में अली और 17 अन्य लोगों पर आईपीसी और पोटा (POTA) के तहत केस दर्ज किया गया था। यह पूरा मामला पंड्या की हत्या और उससे पहले वीएचपी कार्यकर्ता जगदीश तिवारी की हत्या के प्रयास से जुड़ा था।
सीबीआई कोर्ट ने दोनों घटनाओं को एक ही बड़ी साजिश का हिस्सा मानते हुए इनका संयुक्त मुकदमा चलाया था। साल 2007 में अदालत ने 12 आरोपियों को दोषी करार दिया और मुख्य रूप से अली को पंड्या की हत्या के लिए सजा सुनाई गई।
कानूनी दांवपेच के बीच साल 2011 में एक बड़ा बदलाव आया जब हाईकोर्ट ने सभी आरोपियों को हत्या के मामले में बरी कर दिया। हालांकि, अदालत ने तिवारी पर हमले के लिए उनकी सजा बरकरार रखी थी, जिसे घटाकर सात साल कर दिया गया था।
कहानी में फिर एक नया मोड़ आया जब 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस आदेश को पूरी तरह से पलट दिया। सीबीआई की अपील पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने सभी 12 आरोपियों को हत्या का दोषी माना और उन्हें आजीवन कारावास की सजा काटने के लिए सरेंडर करने का आदेश दिया।
इसके बाद, साल 2025 में असगर अली ने सरकार से समय से पहले रिहाई की गुहार लगाई। जब काफी समय बीत जाने के बाद भी सरकार ने कोई फैसला नहीं लिया, तो उसने न्याय के लिए हाईकोर्ट की शरण ली।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को सूचित किया कि याचिका पर सक्रियता से विचार किया जा रहा है। सरकार ने यह भी बताया कि उसे सलाहकार समिति की राय मिल चुकी है और बहुत जल्द इस मामले को सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अंतिम निर्णय के लिए रखा जाएगा।
इस मामले पर विचार करने के बाद जस्टिस एम.आर. मेंगड़े ने सख्त आदेश पारित किया। उन्होंने कहा कि संबंधित प्राधिकारी याचिकाकर्ता की सजा माफी की अर्जी पर कानून के अनुसार जल्द से जल्द उचित निर्णय लें और यह फैसला आदेश मिलने की तारीख से छह महीने के भीतर हो जाना चाहिए।
इसी तरह का एक और गंभीर मामला लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी शाहनवाज भट्टी से जुड़ा है। उसे साल 2001 में कच्छ बॉर्डर से भारी मात्रा में 22 किलो आरडीएक्स (RDX) के साथ पकड़ा गया था और बाद में उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। भट्टी ने भी कोर्ट से सजा माफी का लाभ देने की मांग की है।
भट्टी का तर्क है कि वह बिना किसी पैरोल के दो दशक से अधिक समय जेल की चारदीवारी में गुजार चुका है। उसका दावा है कि उसकी रिहाई की याचिका भी पिछले दो साल से सरकारी फाइलों में लंबित पड़ी है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए भी हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को छह महीने के भीतर उसकी अर्जी पर विचार करने का स्पष्ट आदेश दिया है।
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