7.7 लाख करोड़ रुपये का विशाल राजस्व, लेकिन कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) का वेतन मात्र 17,000 रुपये प्रति माह। इतना ही नहीं, कंपनी के मुख्य वित्तीय अधिकारी (CFO) ने साल 2020 से कोई सैलरी ही नहीं ली है। यह किसी फिल्मी कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि मशहूर गोल्ड एक्सपोर्टर कंपनी ‘राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड’ की सच्चाई है, जिसका खुलासा प्रवर्तन निदेशालय (ED) की हालिया जांच में हुआ है।
विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा), 1999 के तहत ईडी ने बेंगलुरु और मुंबई में कंपनी से जुड़े नौ ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की। 23 जून से शुरू हुई इस सघन तलाशी के बाद जांच एजेंसी ने जो प्रारंभिक निष्कर्ष निकाले हैं, वे कॉर्पोरेट जगत को हैरान करने वाले हैं।
बुधवार को जारी अपने आधिकारिक बयान में ईडी ने बताया कि इस कार्रवाई के दौरान बड़े पैमाने पर डिजिटल साक्ष्य और दस्तावेज जब्त किए गए हैं। जांच में पता चला है कि कंपनी के पास अपने विदेशी लेनदेन का कोई उचित रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।
एजेंसी को अफ्रीकी खदानों में 1,035 करोड़ रुपये के कथित निवेश की जानकारी मिली, लेकिन कंपनी के पास इससे जुड़ा कोई भी सहायक दस्तावेज या समकालीन रिकॉर्ड नहीं था। इसके साथ ही, तलाशी के दौरान मिले सोने के वास्तविक स्टॉक और कंपनी के रजिस्टरों में दर्ज आंकड़ों के बीच 40 फीसदी का भारी अंतर पाया गया।
जांच एजेंसी ने कंपनी के प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों के वेतन ढांचे को भी संदिग्ध माना है। ईडी का स्पष्ट कहना है कि 7.7 लाख करोड़ रुपये का भारी-भरकम समेकित राजस्व दिखाने वाली कंपनी के शीर्ष अधिकारियों की सैलरी उनके कामकाज और कंपनी के आकार से बिल्कुल मेल नहीं खाती। एजेंसी ने पाया कि कंपनी के प्रमुख व्यावसायिक संकेतक सामान्य वाणिज्यिक प्रथाओं से काफी अलग हैं।
राजेश एक्सपोर्ट्स आयात, निर्यात, विदेशी निवेश और विदेशी व्यापार से संबंधित अहम दस्तावेज पेश करने में पूरी तरह विफल रहा। ईडी के अनुसार, विदेशी व्यापार के लेनदारों और देनदारों के भुगतान का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं होने के कारण इन लेनदेन की वास्तविकता की पुष्टि करना लगभग असंभव हो गया है।
जांच के दौरान एजेंसी ने विदेशी व्यापार में करीब 3,000 करोड़ रुपये के अपारदर्शी समायोजन को भी उजागर किया है। अधिकारियों ने पाया कि कंपनी संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और अन्य विदेशी क्षेत्रों में स्थित संस्थाओं के साथ अपने व्यापारिक बकाये का निपटान कर रही थी। अब ये सभी विदेशी संस्थाएं भी कड़ी जांच के घेरे में आ गई हैं।
दस्तावेजों की हेराफेरी के साथ-साथ कंपनी के शेयरों में संदिग्ध ब्लॉक ट्रेड का भी खुलासा हुआ है। ईडी के मुताबिक, इन शेयर लेनदेन में शामिल कुछ लोगों के नाम इंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स (ICIJ) द्वारा जारी किए गए लीक में भी सामने आ चुके हैं। यह अघोषित अपतटीय संबंधों की ओर इशारा करता है, जिसकी गहराई से पड़ताल की जा रही है।
प्रवर्तन निदेशालय ने आरोप लगाया है कि एनआरआई बेनामीदारों के माध्यम से शेयर हेरफेर को अंजाम दिया गया। इस तिकड़म का इस्तेमाल करके 600 करोड़ रुपये से अधिक की भारी रकम भारत से बाहर भेजी गई। हालांकि, इन सभी गंभीर आरोपों और दावों पर राजेश एक्सपोर्ट्स की तरफ से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
ईडी की यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है जब कंपनी पहले से ही कड़े नियामक शिकंजे में फंसी हुई है। पिछले हफ्ते ही भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने आरोप लगाया था कि राजेश एक्सपोर्ट्स ने वित्तीय वर्ष 2021 से वित्तीय वर्ष 2025 के बीच अपने राजस्व को लगभग 15.15 लाख करोड़ रुपये बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया था।
सेबी ने इस बड़े खुलासे के बाद प्रमोटर-चेयरमैन राजेश मेहता और उनकी कंपनी को अगली जांच पूरी होने तक प्रतिभूति बाजार में कारोबार करने से रोक दिया है।
हालांकि, राजेश एक्सपोर्ट्स ने सेबी के इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। कंपनी ने दावा किया है कि उसके द्वारा रिपोर्ट किए गए राजस्व के आंकड़े बिल्कुल सटीक हैं। कंपनी ने बाजार नियामक की इस कार्रवाई को अपनी स्विस सब्सिडियरी ‘वालकैम्बी’ के राजस्व और आय की रिपोर्टिंग से जुड़ी एक गलतफहमी करार दिया है।
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