हाई ब्लड प्रेशर यानी हाइपरटेंशन के इलाज के तरीके में अब तक का सबसे बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। दशकों से चली आ रही “रोज़ाना गोली खाने” की मजबूरी जल्द ही खत्म हो सकती है। अब मरीजों को अपना बीपी कंट्रोल में रखने के लिए साल भर में सिर्फ दो इंजेक्शन लगवाने की जरूरत पड़ेगी।
जो बात कभी भविष्य की कल्पना लगती थी, वह अब हकीकत बनने के बेहद करीब है। कई लॉन्ग-एक्टिंग (लंबे समय तक असर करने वाले) इंजेक्शन अपने क्लीनिकल ट्रायल के अंतिम चरणों में हैं और जल्द ही बाजार में उपलब्ध हो सकते हैं।
‘द लैंसेट’ की रिपोर्ट और बदलती उम्मीदें
प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल ‘द लैंसेट’ (The Lancet) में प्रकाशित एक नई समीक्षा इस बदलाव की गंभीरता को रेखांकित करती है। विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया भर में प्रभावी दवाएं मौजूद होने के बावजूद ब्लड प्रेशर कंट्रोल की स्थिति खराब है। समस्या दवाओं की कमी नहीं, बल्कि इलाज के तरीके और मरीजों द्वारा नियमित दवा न ले पाना है।
हाई ब्लड प्रेशर आज भी दुनिया भर में हार्ट अटैक, स्ट्रोक और समय से पहले मौत का प्रमुख कारण बना हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, 140/90 mm Hg या उससे ऊपर का बीपी हाइपरटेंशन माना जाता है, जबकि सामान्य बीपी 120/80 mm Hg से कम होना चाहिए।
साइलेंट किलर का बढ़ता बोझ और भारत की स्थिति
आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। वर्ष 2024–2025 तक, अनुमान है कि दुनिया भर में 30 से 79 वर्ष की आयु के लगभग 1.4 अरब वयस्क हाइपरटेंशन के शिकार हैं। यानी इस आयु वर्ग का हर तीसरा व्यक्ति इससे पीड़ित है। चिंता की बात यह है कि इनमें से लगभग 44 प्रतिशत लोगों को पता ही नहीं है कि उन्हें यह बीमारी है।
भारत में भी स्थिति वैश्विक संकट जैसी ही है। 2023 में प्रकाशित ICMR-INDIAB स्टडी के अनुसार, करीब 315 मिलियन (31.5 करोड़) भारतीय, यानी आबादी का 35.5 प्रतिशत हिस्सा, हाइपरटेंशन से ग्रस्त है।
नेत्रित्व करने वाले स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के डेटा के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत में हाई बीपी वाले लगभग आधे पुरुष और एक तिहाई से अधिक महिलाओं का ब्लड प्रेशर कंट्रोल में नहीं है।
इलाज का तरीका कैसे बदलेगा?
दशकों से बीपी को कंट्रोल करने के लिए रोज़ाना गोलियां खाना ही एकमात्र उपाय रहा है। मौजूदा गाइडलाइंस में अक्सर लक्ष्य तक पहुंचने के लिए दो या अधिक दवाओं के संयोजन की सिफारिश की जाती है। इसमें ACE इनहिबिटर्स, कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स और शरीर से अतिरिक्त नमक निकालने वाले मूत्रवर्धक (diuretics) शामिल हैं।
सिद्धांत रूप में ये दवाएं अच्छा काम करती हैं, लेकिन असल जिंदगी में ‘नियमितता’ सबसे बड़ी बाधा है। हाई बीपी के कई मरीज डायबिटीज या कोलेस्ट्रॉल की भी दवाएं लेते हैं, जिससे उन्हें दिन भर में कई गोलियां खानी पड़ती हैं। समय के साथ, खुराक छूट जाना या “दवाओं से थकान” (treatment fatigue) इलाज को बेअसर कर देती है।
यहीं पर नए ‘लंबे समय तक चलने वाले इंजेक्शन’ गेम-चेंजर साबित हो सकते हैं।
दिल्ली के जी.बी. पंत अस्पताल और यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज के कार्डियोलॉजिस्ट और क्लिनिकल रिसर्चर, डॉ. मोहित गुप्ता के अनुसार, चिकित्सा क्षेत्र अब साल में दो बार दिए जाने वाले इंजेक्शन थेरेपी की ओर तेजी से बढ़ रहा है। यह दशकों बाद बीपी के इलाज में एक बुनियादी बदलाव होगा।
नई दवाओं का विज्ञान: जड़ पर वार
जहां पारंपरिक दवाएं बीपी के नंबर को कम करने का काम करती हैं, वहीं ये नए इंजेक्शन उन मॉलिक्यूलर रास्तों (molecular pathways) को निशाना बनाते हैं जो हाइपरटेंशन का मुख्य कारण बनते हैं।
- Zilebesiran (जाइलेबेसिरन): रोश फार्मा (Roche Pharma) और अलनीलम (Alnylam) द्वारा विकसित यह दवा लिवर में एंजियोटेंसिनोजेन के उत्पादन को रोकती है। यह दवा अभी ग्लोबल फेज 3 ट्रायल में है और इसके फेज 2 के नतीजे काफी आशाजनक रहे हैं।
- Ziltivekimab (जिल्टिवेकिमैब): डेनमार्क की कंपनी नोवो नॉर्डिस्क (Novo Nordisk) की यह दवा सूजन (inflammation) को कम करने पर काम करती है, जो हृदय रोगों और बीपी का एक बड़ा कारण माना जाने लगा है।
इसके अलावा, एल्डोस्टेरोन (aldosterone) हार्मोन को कंट्रोल करने वाली नई रणनीतियां भी अपनाई जा रही हैं, जो किडनी में सोडियम और पानी को रोककर बीपी बढ़ाता है।
उम्मीदों के साथ कुछ चुनौतियां भी
इस नई तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि साल में दो इंजेक्शन से मरीज के शरीर में दवा का स्तर बना रहेगा और रोज गोली खाने की झंझट खत्म हो जाएगी। इससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा कम हो सकता है।
हालांकि, उत्साह के साथ कुछ सावधानियां भी जरूरी हैं। सबसे बड़ी चिंता कीमत को लेकर है।
उदाहरण के लिए, 2024 में भारत में एलडीएल (LDL) कोलेस्ट्रॉल कम करने के लिए पेश किए गए इंजेक्शन ‘इंकलिसिरां’ (inclisiran) की कीमत सालाना 1.8 लाख से 2.4 लाख रुपये के बीच है। यदि बीपी के इंजेक्शन भी इतने ही महंगे हुए, तो भारत जैसे देशों में आम आदमी की पहुंच से यह दूर हो सकते हैं।
इसके अलावा, लंबे समय तक सुरक्षा (Long-term safety) भी एक बड़ा सवाल है। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के कार्यकारी निदेशक और वैज्ञानिक, डॉ. दोरायराज प्रभाकरन का मानना है कि साल में एक या दो बार लगने वाले इंजेक्शन भविष्य में इलाज को सरल जरूर बनाएंगे, लेकिन इसकी सुरक्षा की कड़ी जांच बेहद जरूरी है।
चूंकि हाइपरटेंशन एक आजीवन रहने वाली स्थिति है, इसलिए इन दवाओं के दीर्घकालिक प्रभावों का अध्ययन करना होगा।
अगर ये इंजेक्शन सफल और किफायती साबित होते हैं, तो यह न केवल मरीजों के लिए बड़ी राहत होगी, बल्कि दुनिया भर में दिल की बीमारियों से होने वाली मौतों को कम करने में एक क्रांतिकारी कदम होगा।
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