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80 साल के रिटायर्ड टीचर का अनोखा शौक: घर को बना दिया ‘रेडियो म्यूजियम

| Updated: February 14, 2026 13:37

मदन मोहन के गीतों से होती है घर में एंट्री, किचन से बेडरूम तक मौजूद हैं 400 से ज्यादा विंटेज रेडियो।

अमरेली/राजकोट: अमरेली जिले के चलाला कस्बे की ‘दानेव सोसायटी’ में जैसे ही आप कदम रखते हैं, मदन मोहन का सदाबहार गीत ‘लग जा गले कि फिर ये हसीन रात हो न हो…’ कानों में मिसरी घोलने लगता है। जैसे-जैसे आप सोसायटी के भीतर बढ़ते हैं, यह धुन और गहरी होती जाती है, जो आपको अनायास ही पुराने दौर की यादों (नॉस्टल्जिया) में खींच ले जाती है।

संगीत का पीछा करते हुए आप एक ऐसे घर के सामने पहुँचते हैं, जहाँ का नज़ारा किसी को भी हैरत में डाल सकता है। यह घर भारत की महान संगीत विरासत की कहानी अपनी दीवारों और कमरों के ज़रिए सुनाता है।

किचन से लेकर गैलरी तक, हर कोने में रेडियो

इस घर में रेडियो किसी कांच के शोकेस में बंद सजावटी सामान की तरह नहीं रखे गए हैं, बल्कि वे रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं। किचन की अलमारियों पर, हॉल के कोनों में, गैलरी की दीवारों के सहारे और यहाँ तक कि बिस्तर के सिरहाने भी रेडियो मौजूद हैं। अगर आप इनकी गिनती करने बैठेंगे, तो यह संख्या 400 के पार निकल जाएगी।

13 फरवरी को ‘विश्व रेडियो दिवस’ (World Radio Day) के मौके पर, 80 वर्षीय रिटायर्ड ड्राइंग टीचर सुलेमान दाल का यह घर महज एक रिहाइशी मकान नहीं, बल्कि एक ‘टाइम कैप्सूल’ जैसा महसूस होता है, जो एक साथ कई पुराने दौर को अपने में समेटे हुए है।

वाल्व रेडियो से लेकर मल्टी-बैंड रिसीवर तक का सफर

सुलेमान भाई का यह कलेक्शन साउंड टेक्नोलॉजी की कई पीढ़ियों का गवाह है। उनके पास 3 से 4 फीट लंबे पुराने वाल्व वाले रेडियो मौजूद हैं, जो कभी पूरे कमरे में अपनी शाही उपस्थिति दर्ज कराते थे।

इसके अलावा, उनके पास 15 से 26 बैंड वाले ऐसे शक्तिशाली रिसीवर भी हैं, जो देर रात दूर-दराज के विदेशी प्रसारणों (International Broadcasts) को पकड़ने की क्षमता रखते थे। ये वो रेडियो हैं जो याद दिलाते हैं कि कभी डायल को ट्यून करना किसी सरहद को पार करने जैसा रोमांचक अनुभव हुआ करता था।

कबाड़ में भी ढूंढ़ लेते हैं जान

सुलेमान दाल का इलेक्ट्रॉनिक्स के प्रति आकर्षण बचपन से ही था, जिसे बाद में उन्होंने औपचारिक कोर्सेस के जरिए और निखारा। जिसे दूसरे लोग कबाड़ या पुराना सामान समझकर नकार देते हैं, सुलेमान भाई को उनमें एक ऐसी सर्किट्री नजर आती है जो फिर से सांस लेने का इंतजार कर रही हो। वे अपने हर एक रेडियो को खुद रिपेयर करते हैं और पुराने वाल्व व घिसे-पिटे पुर्जों में नई जान फूंक देते हैं।

सालों-साल, एक-एक करके रेडियो जुड़ते गए और यह शौक इतना परवान चढ़ा कि अब आगंतुक उनके घर को “रेडियो म्यूजियम” कहकर पुकारते हैं।

लाइसेंस राज की यादें और विरासत

इस अनूठे संग्रह में सबसे खास चीजों में से एक है—पुराने दौर की ‘रेडियो लाइसेंस बुक’। यह उस समय की गवाही देती है जब रेडियो रखने के लिए भी सरकार से आधिकारिक अनुमति लेनी पड़ती थी। यह दस्तावेज याद दिलाता है कि रेडियो कभी एक दुर्लभ और विनियमित वस्तु हुआ करती थी, जिसने गाँवों को राष्ट्र से और घरों को इतिहास से जोड़ने का काम किया।

दूर-दूर से खींचे चले आते हैं लोग

चलाला के इस खजाने की चर्चा अब दूर-दूर तक फैल चुकी है। जिज्ञासा और प्रशंसा के भाव लिए लोग गुजरात भर से, और मुंबई, अहमदाबाद व राजकोट जैसे बड़े शहरों से यहाँ आते हैं। यहाँ आने वाले लोग मशीनों से ज्यादा उस शख्सियत की तारीफ करते हुए लौटते हैं, जिसने 80 साल की उम्र में भी अपने अनुशासन, धैर्य और उत्साह को कम नहीं होने दिया।

पर्दे के पीछे, यह म्यूजियम एक पारिवारिक सहयोग की भी मिसाल है। सुलेमान भाई के चारों बेटे उनके इस प्रयास में पूरा सहयोग करते हैं। विशेष रूप से उनके सबसे छोटे बेटे, मुनावर दाल, इस संग्रह की देखरेख और उसे व्यवस्थित रखने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। यह परिवार मिलकर यह सुनिश्चित कर रहा है कि अतीत की आवाज़ आज भी साफ सुनाई दे।

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