क्या आपके घर की दीवारों पर कभी मार्शल आर्ट्स लेजेंड ‘जैकी चैन’ के नाम वाली छिपकली ने दस्तक दी है? या फिर क्या आपने कभी गोवा के नाम पर पहचानी जाने वाली भारत की दूसरी सबसे छोटी छिपकली को गौर से देखा है? ये बातें सुनने में भले ही थोड़ी अजीब लगें, लेकिन भारतीय सरीसृपों (Reptiles) के वैज्ञानिक नामों के पीछे ऐसी ही कई बेहद रोचक कहानियां और गहरे अर्थ छिपे हुए हैं।
इन दिलचस्प तथ्यों का खुलासा हाल ही में एक विस्तृत शोध के जरिए हुआ है। जर्मनी के बॉन स्थित ‘लाइबनिज इंस्टीट्यूट फॉर द एनालिसिस ऑफ बायोडायवर्सिटी चेंज’ (LIB) के म्यूजियम कोएनिग से जुड़े सूरत के हेरपेटोलॉजिस्ट (सरीसृप विशेषज्ञ) डिकांश परमार और अमेरिका की वर्जीनिया कॉमनवेल्थ यूनिवर्सिटी के जर्मन वैज्ञानिक पीटर उएत्ज़ ने मिलकर यह अध्ययन किया है। उनकी इस जॉइंट रिसर्च को ‘एटिमोलॉजीज ऑफ इंडियन रेप्टाइल्स विथ एन अपडेटेड कंट्री चेकलिस्ट’ शीर्षक के साथ अंतरराष्ट्रीय पीयर-रिव्यूड जर्नल ‘ज़ूटाक्सा’ (Zootaxa) में प्रकाशित किया गया है।
इस अहम शोध में भारत में पाए जाने वाले सरीसृपों के 1,047 समूहों (टैक्सा) का गहराई से विश्लेषण किया गया है। शोध के आंकड़ों में 178 जेनेरा (वंश), 839 प्रजातियां और 30 उप-प्रजातियां शामिल हैं। देश की समृद्ध जैव विविधता को दर्शाते इस आंकड़े में 3 मगरमच्छ, 35 कछुए, 370 सांप और छिपकलियों की 431 प्रजातियों को जगह दी गई है।
वैज्ञानिकों ने इन जीवों के वैज्ञानिक नामों की उत्पत्ति का बेहद बारीकी से अध्ययन किया। जांच में पाया गया कि 121 जेनेरा के नाम ग्रीक शब्दों से लिए गए हैं, जबकि 37 जेनेरा लैटिन भाषा से उत्पन्न हुए हैं। इसके उलट, प्रजातियों के मामले में 304 नाम लैटिन भाषा से और केवल 85 नाम ग्रीक भाषा से जुड़े हैं। इसके अलावा, 226 प्रजातियों के नाम खास लोगों को सम्मान देने के लिए (एपोनियम) और 215 प्रजातियों के नाम स्थानों के आधार पर (टोपोनियम) रखे गए हैं।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि 19 जेनेरा और 34 प्रजातियों को उनके स्थानीय नामों के आधार पर पहचाना जाता है। कुछ जीवों के नाम पौराणिक कथाओं और अन्य स्थानीय स्रोतों से भी प्रेरित हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि पहले वैज्ञानिक नामों पर ग्रीक और लैटिन का भारी दबदबा था, लेकिन अब स्थानीय भाषाओं और लोगों को महत्व दिया जा रहा है। इसे देश के औपनिवेशिक इतिहास के प्रभाव से बाहर निकलने और स्थानीय जागरूकता बढ़ने के एक बड़े संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
वैज्ञानिक डिकांश परमार बताते हैं कि आम लोगों को वैज्ञानिक नाम काफी जटिल और उबाऊ लगते हैं, लेकिन असल में उनके अर्थ बेहद सरल और रोमांचक होते हैं। उदाहरण के लिए, कछुए के जीनस ‘चित्रा’ (Chitra) का नाम संस्कृत के शब्द ‘चित्र’ से लिया गया है, जिसका मतलब रंग-बिरंगा होता है। इसी तरह, ‘बाटागुर कचुगा’ (Batagur Kachuga) का नाम हिंदी शब्द ‘कछुआ’ से और कोबरा के जीनस ‘नाजा’ (Naja) का नाम सिंहली शब्द ‘नया’ (Naya) से निकला है।
आधुनिक पॉप कल्चर का असर भी इन जीवों के नामकरण पर साफ दिखाई देता है। ‘नेमास्पिस जैकी’ (Cnemaspis jackieii) नाम की छिपकली को दुनिया भर में ‘जैकीज डे गेको’ के नाम से जाना जाता है। इसका नाम मशहूर अभिनेता जैकी चैन के नाम पर रखा गया है। शोध के अनुसार, यह नाम केवल सम्मान देने के लिए नहीं चुना गया था, बल्कि इस छिपकली की बेहद तेज और फुर्तीली छलांग लगाने की क्षमता बिल्कुल जैकी चैन के एक्शन स्टंट्स से मेल खाती है।
यह व्यापक अध्ययन आधुनिक प्राणीशास्त्रीय नामकरण की शुरुआत यानी वर्ष 1758 से लेकर दिसंबर 2025 तक के वैज्ञानिक नामों का ऐतिहासिक सफर तय करता है। शोधकर्ताओं ने इस सूची को और पुख्ता बनाते हुए इसमें जुलाई 2026 तक भारत में खोजी गई नई सरीसृप प्रजातियों को भी शामिल किया है। इस तरह यह रिसर्च भारतीय सरीसृपों के नामकरण के 260 से अधिक वर्षों के समृद्ध इतिहास को एक साथ हमारे सामने पेश करती है।
पीटर उएत्ज़ के अनुसार, यह शोध सिर्फ इस सवाल तक सीमित नहीं है कि भारत में कितनी प्रजातियां पाई जाती हैं, बल्कि यह बताता है कि इन नामों का असली मतलब क्या है और ये आखिर आए कहां से हैं।
भूगोल के आधार पर रखे गए नामों का एक बेहतरीन उदाहरण ‘हेमिफाइलोडैक्टाइलस गोवाएंसिस’ (Hemiphyllodactylus goaensis) है, जिसे आम तौर पर ‘गोअन स्लेंडर गेको’ कहा जाता है। यह भारत की दूसरी सबसे छोटी छिपकली है। इसे गोवा में खोजने वाले डिकांश परमार का कहना है कि इसके वैज्ञानिक नाम में जुड़ा ‘गोवाएंसिस’ शब्द गोवा राज्य के साथ इसके खास और ऐतिहासिक रिश्ते को अमर बनाता है।
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