नई दिल्ली। एक निचली अदालत को दोहरे हत्याकांड की सुनवाई पूरी करने में पूरे 22 साल लग गए। इसके बाद, झारखंड हाईकोर्ट ने भी अपील पर फैसला सुनाने में 22 साल और लगा दिए। इस लंबी और थका देने वाली कानूनी प्रक्रिया के दौरान छह में से पांच आरोपियों की मौत हो चुकी है। अब केवल एक ही दोषी जिंदा बचा है, जिसकी उम्र 70 पार हो चुकी है और वह बिस्तर पर पड़ा है। यह बुजुर्ग अपनी आखिरी कानूनी लड़ाई जेल से ही सुप्रीम कोर्ट में लड़ रहा है।
मामले को निपटाने में हुई इस बेतहाशा देरी को सुप्रीम कोर्ट ने सीधे तौर पर न्यायिक प्रणाली की विफलता करार दिया है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए जीवित बचे एकमात्र दोषी की सजा पर रोक लगा दी है। अदालत ने उसे जमानत पर जेल से बाहर आने की अनुमति दे दी है। इसके साथ ही, सर्वोच्च अदालत ने यह भी जांच करने का फैसला किया है कि 1981 में हुए इस दोहरे हत्याकांड का फैसला करने में निचली अदालत और हाईकोर्ट ने आखिर इतना लंबा समय क्यों लिया।
शीर्ष अदालत ने अपनी तल्ख टिप्पणी में कहा कि यह मामला हमारी न्यायिक व्यवस्था की खामियों को उजागर करता है। एक तरफ जहां अपराध बिना सजा के रह गया, वहीं आरोपियों को 22 साल तक चले लंबे मुकदमे की मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी। दोषसिद्धि के बाद भी उनकी अपील को खारिज होने में दो दशक से ज्यादा का वक्त लग गया।
दोषी की ओर से अदालत में पेश हुईं अधिवक्ता फौजिया शकील ने मजबूती से अपना पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि यदि याचिकाकर्ता को अब जमानत नहीं दी गई, तो यह उसके साथ घोर अन्याय होगा और उसे अपूरणीय क्षति होगी। उन्होंने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट भविष्य में उसे बरी कर देता है, तो जेल में बिताए गए उसके इस लंबे समय का कोई उचित मुआवजा नहीं हो सकता।
इस दलील पर सहमति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोहरे हत्याकांड जैसा जघन्य अपराध होने के बावजूद, हम पिछले 45 वर्षों में आरोपियों द्वारा झेली गई पीड़ा को नजरअंदाज नहीं कर सकते। अदालत ने विशेष रूप से दोषी की खराब स्वास्थ्य स्थिति और राज्य सरकार के उस हलफनामे पर गौर किया जिसमें बताया गया था कि हिरासत में होने के बावजूद मरीज अस्पताल में भर्ती है। इसी आधार पर अदालत ने सजा को निलंबित कर दिया। उसे व्यक्तिगत मुचलके और जमानत पर रहते हुए कोई अन्य अपराध न करने की शर्त पर तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में इस बात को बेहद परेशान करने वाला बताया कि घटना 1981 की है, लेकिन निचली अदालत द्वारा याचिकाकर्ता को दोषी ठहराने वाला फैसला 2002 में आया। अदालत ने कहा कि यह समझ से परे है कि निचली अदालत को ट्रायल पूरा करने में 22 साल कैसे लग गए। इसके बाद, ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाकर्ता की अपील पर फैसला करने में हाईकोर्ट ने भी 22 साल लगा दिए। यह देरी स्पष्ट रूप से चिंताजनक है।
जब सुप्रीम कोर्ट ने इस देरी का कारण पूछा, तो हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने अदालत को बताया कि आरोपी छह साल तक फरार थे, जिसकी वजह से भी मुकदमा धीमा हुआ। लेकिन, शीर्ष अदालत ने तुरंत यह ध्यान दिलाया कि जब 1991 में आरोप तय हो गए थे, तो उसके बाद ट्रायल पूरा होने में लगे 12 सालों का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।
आपराधिक अपीलों के इस तरह से लंबित रहने पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए, अदालत ने याचिकाकर्ता को इस मामले में केंद्र सरकार को पक्षकार बनाने की अनुमति दी है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि हाईकोर्ट की ओर से पेश होने वाले ऑन-रिकॉर्ड अधिवक्ता को रजिस्ट्रार जनरल द्वारा दायर अनुपालन हलफनामे की एक प्रति अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल के कार्यालय को सौंपनी होगी।
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