उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक अहम घटनाक्रम सामने आया है। यहां अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे) रवि कुमार दिवाकर की अदालत से हत्या और अन्य जघन्य अपराधों से जुड़ी 97 लंबित फाइलें वापस ले ली गई हैं। यह कदम उनके उस रिकॉर्ड के सामने आने के कुछ ही दिनों बाद उठाया गया है, जिसमें उन्होंने महज चार महीने के भीतर 10 अलग-अलग मामलों में 22 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई थी।
इन सभी फाइलों को जिला एवं सत्र न्यायाधीश बीरेंद्र कुमार सिंह के आदेश पर वापस मंगाया गया है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस बात की पुष्टि की है कि सत्र न्यायाधीश के निर्देश के बाद ही यह त्वरित कार्रवाई की गई है। मीडिया में जज दिवाकर द्वारा लगातार दी जा रही मौत की सजा की खबरों के सामने आने के बाद प्रशासन ने यह बड़ा फैसला लिया है।
मंगलवार को जारी किए गए आधिकारिक आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश/फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या तीन, मुजफ्फरनगर की अदालत में लंबित मामलों की फाइलें अब जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पास स्थानांतरित की जा रही हैं। इन सभी मामलों का निपटारा अब कानून के अनुसार वहीं किया जाएगा। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी भी दोषी को तब तक फांसी नहीं दी जा सकती, जब तक कि उच्च न्यायालय उस सजा की पुष्टि न कर दे।
मुजफ्फरनगर में सुनाई गई 22 सजाओं को मिलाकर, जज दिवाकर के न्यायिक करियर में अब तक मौत की सजा के कुल 35 फैसले हो चुके हैं। इससे पहले बरेली में अपनी तैनाती के दौरान भी उन्होंने 13 दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई थी।
46 वर्षीय जज रवि कुमार दिवाकर पहली बार साल 2022 में राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आए थे। उस वक्त वह वाराणसी में सिविल जज के पद पर कार्यरत थे और उन्होंने ही ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के वीडियोग्राफी सर्वे का ऐतिहासिक आदेश दिया था। इस सर्वे में वज़ूखाना क्षेत्र भी शामिल था, जहाँ हिंदू पक्ष ने एक संरचना के शिवलिंग होने का दावा किया था, जबकि मुस्लिम पक्ष ने इसका विरोध किया था। बाद में उस इलाके को सील कर दिया गया और सुप्रीम कोर्ट ने कार्यवाही को वाराणसी जिला जज को ट्रांसफर कर दिया था।
जज दिवाकर ने 17 दिसंबर को मुंसिफ/सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के रूप में उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा में कदम रखा था। अपने कार्यकाल के दौरान वह आजमगढ़, सुल्तानपुर, बदायूं और वाराणसी में सेवाएं दे चुके हैं। अप्रैल 2021 से जुलाई 2022 तक वाराणसी में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) रहने के बाद उनका तबादला बरेली हो गया था, जहां वे बाद में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट) बने। इसके बाद अप्रैल से नवंबर 2025 तक वह चित्रकूट में तैनात रहे और फिर 29 नवंबर 2025 को उन्होंने मुजफ्फरनगर में कार्यभार संभाला था।
मुजफ्फरनगर में उनके द्वारा मौत की सजा का सिलसिला 6 अप्रैल को शुरू हुआ था, जब अधिवक्ता समीर सैफी की हत्या के मामले में तीन दोषियों को मृत्युदंड दिया गया। इसके बाद 28 अप्रैल को एक अन्य हत्याकांड में एक परिवार के चार सदस्यों (एक महिला और उसके तीन बेटों) को फांसी की सजा सुनाई गई।
इसी तरह 30 मई को एक और 20 जून को दो दोषियों को मौत की सजा मिली। जुलाई महीने में भी यह क्रम जारी रहा, जहां 2 जुलाई को एक, 6 जुलाई को दो और 17 जुलाई को चार दोषियों को मृत्युदंड दिया गया। अगस्त में भी 12 अगस्त को एक और 13 अगस्त को चार अन्य दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई थी।
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