गुजरात उच्च न्यायालय ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि कोई भी सिविल अदालत केवल मानवीय आधार पर नगर निगम या नागरिक अधिकारियों को वैकल्पिक आवास देने का निर्देश नहीं दे सकती। यह पूरा मामला नगर नियोजन (टाउन प्लानिंग) योजना के तहत सड़क चौड़ीकरण परियोजना के लिए तोड़ी जाने वाली इमारत के किरायेदारों से जुड़ा है।
अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि किसी जगह पर लंबे समय तक रहने या बेदखली से होने वाली परेशानी के नाम पर सिविल कोर्ट इस तरह का आदेश जारी करने का अधिकार नहीं रखता है।
यह विवाद अहमदाबाद के असरवा स्थित जरीवाला चॉल के किरायेदारों का है, जो 60 साल से अधिक समय से वहां रह रहे थे। इन लोगों ने 1990 के दशक में अहमदाबाद नगर निगम (एएमसी) द्वारा अपनी टीपी योजना को लागू करने के लिए की जा रही बेदखली का कड़ा विरोध किया था। इसके बाद साल 1997 में किरायेदार इस मामले को लेकर सिविल कोर्ट पहुंच गए।
उन्होंने अदालत में आरोप लगाया था कि बेदखली की यह कार्रवाई बॉम्बे टाउन प्लानिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट रूल्स के नियम 21(3) और 21(4) के तहत नोटिस की अनिवार्य शर्तों का सीधा उल्लंघन है।
इस मामले की सुनवाई करते हुए साल 2002 में सिटी सिविल कोर्ट ने किरायेदारों के पक्ष में एक डिक्री (आदेश) पारित की थी। अदालत ने एएमसी को आदेश दिया था कि वह प्रभावित लोगों को जमीन के बराबर हिस्से के साथ उपयुक्त आवास उपलब्ध कराए और वैकल्पिक घर मिलने तक उनके कब्जे को सुरक्षित रखे। इसके खिलाफ एएमसी ने 2004 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
निगम ने न केवल सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाया, बल्कि यह भी तर्क दिया कि निचली अदालत का यह आदेश हाईकोर्ट के उस पुराने निर्देश के खिलाफ है जिसमें किरायेदारों को 31 अगस्त 2003 तक अपने घर खाली करने को कहा गया था।
सभी पक्षों को विस्तार से सुनने के बाद जस्टिस जे. सी. दोशी ने सिविल कोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि नियम 21(3) और 21(4) पर सिविल कोर्ट का भरोसा कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं था और यह इसी मुकदमे की पिछली कानूनी कार्यवाही के बिल्कुल विपरीत था।
वैकल्पिक आवास के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कानूनी स्थिति साफ करते हुए कहा कि एक सामान्य नियम के रूप में, सिविल कोर्ट के पास सरकार, वैधानिक प्राधिकरण या नगर निगम को केवल न्यायसंगत या मानवीय विचार पर वैकल्पिक व्यवस्था करने का निर्देश देने का अधिकार क्षेत्र नहीं है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा निर्देश तभी जारी किया जा सकता है जब वादी के पास कोई कानूनी अधिकार हो और प्रतिवादी पर कोई कानूनी दायित्व हो, जो किसी क़ानून, अनुबंध, नीति या लागू करने योग्य वादे से उत्पन्न हुआ हो।
अपने फैसले के दौरान जस्टिस दोशी ने हाईकोर्ट के पुराने आदेश की अवहेलना करते हुए डिक्री जारी करने के लिए निचली अदालत की कड़ी आलोचना भी की। उन्होंने इसे पूरी तरह से न्यायिक अनुचितता और अशिष्टता करार दिया।
जज ने अपने आदेश में सख्त टिप्पणी करते हुए लिखा कि यह पूरी कार्यवाही किसी अवमाननापूर्ण कार्यवाही से कम नहीं है और इसका संचालन हाईकोर्ट द्वारा अपील में पहले दिए गए आदेश के पूरी तरह प्रतिकूल है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने सिटी सिविल कोर्ट और वादी दोनों के इस प्रयास और दृष्टिकोण की कड़ी निंदा करते हुए गहरी नाराजगी जाहिर की।
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