अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने एच-1बी वीजा पर काम करने वाले विदेशी पेशेवरों को ‘बंधुआ मजदूर’ कहने वाले अपने बयान पर सफाई दी है। उन्होंने स्वीकार किया है कि इस मुद्दे पर उनके शब्दों का चयन गलत था। वेंस ने स्पष्ट किया कि उनकी आलोचना दरअसल उन अमेरिकी कंपनियों और वीजा प्रणाली को लेकर थी जो इस सिस्टम का फायदा उठाती हैं, न कि विदेशी कर्मचारियों को लेकर। इससे पहले भारत सरकार ने उनके इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे बेहद अपमानजनक बताया था।
शनिवार को सीबीएस न्यूज के एक टाउन हॉल कार्यक्रम के दौरान वेंस ने अपने बयान की जिम्मेदारी ली। उनसे यह सवाल एक ऐसे भारतीय प्रवासी ने पूछा था, जो पांच साल पहले अमेरिकी नागरिक बने थे और उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को वोट दिया था। भारत द्वारा उनके बयान को आपत्तिजनक और औपनिवेशिक मानसिकता वाला बताए जाने के बाद वेंस का यह स्पष्टीकरण सामने आया है। वेंस ने कहा कि अगर उनके शब्द गलत थे, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी वह खुद लेते हैं।
उपराष्ट्रपति ने तर्क दिया कि एच-1बी वीजा प्रणाली विदेशी कर्मचारियों को काफी कमजोर स्थिति में धकेल सकती है, क्योंकि अमेरिका में उनकी कानूनी स्थिति सीधे तौर पर उनके रोजगार से जुड़ी होती है। उन्होंने कहा कि ऐसे में नियोक्ता उन कर्मचारियों पर अत्यधिक नियंत्रण रख सकते हैं, जिन्हें नौकरी जाने पर अमेरिका में रहने का अधिकार खोने का हमेशा डर रहता है। वेंस ने जोर देकर कहा कि उनकी यह टिप्पणी किसी भी तरह से एच-1बी वीजा धारकों की आलोचना नहीं थी।
उन्होंने आगे समझाया कि एच-1बी कर्मचारियों को प्रायोजित करने वाली कंपनियां यह दावा करती हैं कि उन्हें उस पद के लिए कोई अमेरिकी उम्मीदवार नहीं मिला। वहीं, इन कर्मचारियों के लिए यह वीजा अमेरिका में रहने का एकमात्र सहारा होता है। वेंस के अनुसार, जब वह ‘बंधुआ मजदूरी’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो यह उन कंपनियों की आलोचना है जो अमेरिकी कामगारों को निकालकर विदेशी लोगों को लाती हैं। कंपनियों को पता होता है कि अगर कर्मचारी बॉस से किसी बात पर असहमत होगा तो उसे वापस उसके देश भेज दिया जाएगा। उन्होंने माना कि इस वीजा प्रणाली ने नियोक्ताओं को जरूरत से ज्यादा ताकत दे दी है।
आव्रजन पर अपना रुख साफ करते हुए वेंस ने अपने परिवार का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका को विदेशी पेशेवरों के स्वागत और अमेरिकी कामगारों की सुरक्षा के बीच एक उचित संतुलन बनाने की जरूरत है।
वेंस ने बताया कि उनकी पत्नी उषा वेंस के माता-पिता दक्षिण भारत से आकर अमेरिका में बसे थे। उन्होंने कहा कि उन्हें अपने सास-ससुर से बहुत प्यार है और उनकी बेटी आज अमेरिका की ‘सेकंड लेडी’ है जिस पर उन्हें बेहद गर्व है। वेंस ने साफ किया कि वह कोई आदर्श व्यक्ति नहीं हैं, लेकिन उनका मकसद कभी भी अमेरिका आने वाले प्रवासियों का अपमान करना नहीं था।
वेंस की यह सफाई भारतीय विदेश मंत्रालय की उस कड़ी प्रतिक्रिया के बाद आई है, जिसमें उनके बयान को पूरी तरह से अनुचित बताया गया था। मंत्रालय ने कहा था कि वेंस का बयान अमेरिकी अर्थव्यवस्था और वहां के इनोवेशन इकोसिस्टम में भारतीय पेशेवरों के विशाल योगदान को नजरअंदाज करता है।
भारत ने स्पष्ट किया था कि ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करना गहरे ऐतिहासिक और औपनिवेशिक घावों को कुरेदने जैसा है। विदेश मंत्रालय ने इस बात पर भी जोर दिया था कि प्रतिभाओं के आदान-प्रदान से दोनों देशों को फायदा होता है।
इसके साथ ही विदेश मंत्रालय ने यह भी साफ किया था कि कुछ कंपनियों को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (PERM) कार्यक्रम से निलंबित करने का अमेरिकी फैसला एच-1बी वीजा कार्यक्रम से अलग है। इस निलंबन का असर संबंधित कंपनियों के योग्य कर्मचारियों की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर जरूर पड़ सकता है, लेकिन यह अपने आप में मौजूदा एच-1बी वीजा को रद्द नहीं करता है। इससे वीजा धारकों और उनके आश्रितों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आता है।
इस महीने की शुरुआत में वेंस ने आउटसोर्सिंग फर्मों पर कम वेतन में विदेशी कर्मचारियों को लाने और अमेरिकियों को नौकरी से निकालने का गंभीर आरोप लगाया था। उन्होंने दावा किया था कि एच-1बी कर्मचारियों को समान पदों पर काम करने वाले अमेरिकी नागरिकों की तुलना में 20,000 डॉलर कम मिलते हैं।
विदेशी आउटसोर्सिंग फर्मों के मामले में यह अंतर 48,000 डॉलर तक बताया गया था। इसी पृष्ठभूमि में ट्रंप प्रशासन ने टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो, एचसीएलटेक, कॉग्निजेंट, कैपजेमिनी, माइक्रोसॉफ्ट और एडोब सहित आठ प्रमुख कंपनियों को PERM कार्यक्रम से निलंबित कर दिया था।
आपको बता दें कि PERM रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड प्रक्रिया का एक बेहद महत्वपूर्ण कदम है। योग्य विदेशी श्रमिकों को स्थायी निवास के लिए प्रायोजित करने से पहले नियोक्ताओं को अमेरिकी श्रम विभाग से यह प्रमाणन लेना अनिवार्य होता है। इसके तहत कंपनियों को यह साबित करना होता है कि उक्त पद के लिए योग्य अमेरिकी कर्मचारी उपलब्ध नहीं हैं और विदेशी कर्मचारी को रखने से वेतन पर बुरा असर नहीं पड़ेगा। गौरतलब है कि अमेरिका में सालाना स्वीकृत होने वाले कुल एच-1बी वीजा आवेदनों में से 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अकेले भारतीय पेशेवरों का होता है।
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