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ग्रामीण महाराष्ट्र में हर तीसरा वयस्क हाई ब्लड प्रेशर का शिकार, ज्यादातर को अपनी बीमारी की भनक तक नहीं

| Updated: November 6, 2026 17:46

टाटा मेमोरियल सेंटर की स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा: इलाज करा रहे मरीजों का बीपी भी नहीं है कंट्रोल में, युवाओं पर मंडरा रहा गंभीर हृदय रोगों का खतरा।

महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में किए गए एक ताजा अध्ययन में स्वास्थ्य को लेकर बेहद चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। यहां की आबादी में लगभग हर तीसरा वयस्क व्यक्ति हाई ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप) की समस्या से जूझ रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इनमें से पांच में से एक से भी कम लोगों को अपनी इस गंभीर स्वास्थ्य स्थिति के बारे में जानकारी है। यह महत्वपूर्ण रिसर्च ‘एनपीजे कार्डियोवैस्कुलर हेल्थ’ (npj Cardiovascular Health) नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई है।

इस शोध का शीर्षक ‘भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में वयस्कों में उच्च रक्तचाप का प्रसार, निदान, उपचार और नियंत्रण: बार्शी में इंडियन स्टडी ऑफ हेल्दी एजिंग (ISHA) के परिणाम’ रखा गया है। यह विस्तृत रिपोर्ट ग्रामीण भारत में हाई ब्लड प्रेशर की जांच, इलाज और रोकथाम के स्तर पर मौजूद भारी कमियों को उजागर करती है।

भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत आने वाले टाटा मेमोरियल सेंटर के ‘सेंटर फॉर कैंसर एपिडेमियोलॉजी’ के शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन को अंजाम दिया है। इस रिसर्च में 30 से 69 वर्ष की आयु वर्ग के करीब 40,000 वयस्कों के स्वास्थ्य डेटा का गहन विश्लेषण किया गया।

यह अध्ययन महाराष्ट्र के बार्शी में 2015 से 2020 के बीच ‘इंडियन स्टडी ऑफ हेल्दी एजिंग’ पहल के तहत आयोजित किया गया था। इस दौरान सभी प्रतिभागियों के ब्लड प्रेशर की सटीक माप ली गई और उनसे पुरानी बीमारियों व बीपी की दवाओं के इस्तेमाल की जानकारी जुटाई गई। शोध में उन लोगों को हाई ब्लड प्रेशर का मरीज माना गया जिनका सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर 140 mmHg या उससे अधिक और डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर 90 mmHg या उससे ज्यादा था, या फिर जो लोग पहले से ही ब्लड प्रेशर कम करने की दवा ले रहे थे।

रिसर्च के नतीजों से यह स्पष्ट हुआ कि कुल 31 प्रतिशत प्रतिभागी हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित थे। उम्र बढ़ने के साथ इस बीमारी के प्रसार का जोखिम भी बढ़ता हुआ पाया गया। लिंग और उम्र के कारकों का समायोजन करने के बाद यह भी सामने आया कि उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों में यह समस्या अधिक आम थी। इसके अलावा, पहले से हृदय रोगों का सामना कर रहे आधे मरीज भी इस स्थिति के शिकार पाए गए।

बीमारी को लेकर जागरूकता का स्तर बेहद निराशाजनक रहा। आंकड़ों के अनुसार, कुल 25 प्रतिशत प्रतिभागियों को पता ही नहीं था कि उन्हें हाई ब्लड प्रेशर है, जबकि केवल 6 प्रतिशत लोगों में पहले से ही इस बीमारी की पुष्टि हो चुकी थी। हाई बीपी से पीड़ित केवल 14 प्रतिशत पुरुषों और 21 प्रतिशत महिलाओं ने ही स्वीकार किया कि उन्हें अपनी बीमारी के बारे में पहले से जानकारी थी।

बीमारी का पता चलने के बाद भी मरीजों के हालात पूरी तरह से सुरक्षित नहीं पाए गए। जिन लोगों में पहले से इस बीमारी का निदान हो चुका था, उनमें से करीब 73 प्रतिशत मरीज ब्लड प्रेशर कम करने की दवा खा रहे थे। हालांकि, चौंकाने वाली बात यह रही कि इलाज करा रहे इन मरीजों में से केवल 39 प्रतिशत का ब्लड प्रेशर ही सही तरीके से कंट्रोल में था। यह आंकड़े बताते हैं कि दवा लेने के बावजूद बहुत से लोग अभी भी हृदय रोगों के भारी जोखिम में जी रहे हैं।

शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि ग्रामीण समुदायों में ब्लड प्रेशर की जांच और इसके सटीक निदान की सुविधाओं को तत्काल बेहतर बनाने की आवश्यकता है। कम उम्र के वयस्कों में समय रहते बीमारी का पता लगाना इसलिए भी अहम है क्योंकि अन्यथा वे वर्षों तक बिना इलाज के ही इस मूक बीमारी के साथ जीते रहेंगे।

टाटा मेमोरियल सेंटर, मुंबई के एडवांस्ड सेंटर फॉर ट्रीटमेंट, रिसर्च एंड एजुकेशन इन कैंसर के निदेशक और इस अध्ययन के वरिष्ठ लेखक पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि यह रिसर्च ग्रामीण आबादी की नियमित जांच और बीपी नियंत्रण में सुधार की आवश्यकता को साबित करती है। उनके अनुसार, हृदय रोग, स्ट्रोक और क्रोनिक किडनी रोग जैसी जानलेवा क्रॉनिक स्थितियों से होने वाली मौतों को कम करने के लिए यह कदम उठाना अनिवार्य है।

ऑक्सफोर्ड पॉपुलेशन हेल्थ के एचडीआर यूके अर्ली करियर रिसर्च फेलो और अध्ययन के सह-प्रथम लेखक बास्टियन बोहरमन ने बताया कि बिना निदान वाले मरीजों का इतना बड़ा अनुपात, खासकर युवा वर्ग में, शुरुआती जांच की सख्त जरूरत को रेखांकित करता है। उन्होंने चेताया कि बिना इलाज के रहने पर जीवन भर हृदय रोगों का जोखिम बना रहता है।

टाटा मेमोरियल सेंटर के सेंटर फॉर कैंसर एपिडेमियोलॉजी में महामारी विज्ञान के प्रोफेसर और वरिष्ठ लेखक राजेश दीक्षित ने इस बात पर जोर दिया कि केवल दवा लेना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि हाई ब्लड प्रेशर का उचित प्रबंधन भी उतना ही जरूरी है। यह अध्ययन इस बात का भी प्रमाण है कि ग्रामीण आबादी से जुड़े ऐसे बड़े और प्रामाणिक स्वास्थ्य आंकड़े जुटाना कितना महत्वपूर्ण है, जहां इस तरह की बीमारियों को लेकर अभी भी जानकारी का घोर अभाव है।

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