मेघालय में हुए बहुचर्चित हनीमून मर्डर केस में पुलिस की एक बेहद हास्यास्पद और चौंकाने वाली लापरवाही सामने आई है। अपने पति राजा रघुवंशी की हत्या के आरोप में गिरफ्तार की गई सोनम रघुवंशी के गिरफ्तारी वारंट में जांच एजेंसी ने उसे सशस्त्र बलों का भगोड़ा करार दे दिया। इस बेतुके गिरफ्तारी मेमो को लेकर मेघालय उच्च न्यायालय ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने राज्य सरकार की उस याचिका को भी खारिज कर दिया है, जिसमें आरोपी महिला की जमानत रद्द करने की मांग की गई थी।
न्यायमूर्ति डब्ल्यू डिएंगदोह ने राज्य सरकार की याचिका खारिज करते हुए कहा कि 9 जून 2025 को गाजीपुर के वन स्टॉप सेंटर में सोनम को जारी किए गए गिरफ्तारी मेमो को देखकर साफ पता चलता है कि इसे बिना सोचे-समझे तैयार किया गया था। इस दस्तावेज पर आरोपी के हस्ताक्षर भी मौजूद हैं। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि इस पूरे मेमो में कहीं भी यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया है कि आरोपी महिला पर वास्तव में क्या आरोप लगाए गए हैं।
अदालत ने गिरफ्तारी दस्तावेज में दर्ज की गई बातों को पूरी तरह से बेतुका बताया। इस मेमो में लिखा गया था कि आरोपी पर भारत के किसी भी सशस्त्र बल से भगोड़ा होने का संदेह है। इसके अलावा, इसमें महिला के भारत के बाहर किसी अपराध में शामिल होने की बात भी दर्ज की गई थी। लापरवाही की हद तो तब पार हो गई जब मेमो में उसे एक ऐसा रिहा किया गया दोषी बता दिया गया, जिसने जेल से छूटने के बाद अपने निवास या उसमें हुए बदलाव की जानकारी प्रशासन को नहीं दी थी।
न्यायालय ने कहा कि अगर गिरफ्तारी के कारणों की सूचना इस तरह से दी जाती है, तो यह गिरफ्तार करने वाली एजेंसी की घोर लापरवाही और बिना विवेक के काम करने की प्रवृत्ति को दर्शाता है। यह रवैया एक आरोपी की गिरफ्तारी की कानूनी प्रक्रिया की जड़ों पर ही प्रहार करता है। कोर्ट ने माना कि गिरफ्तारी के शुरुआती चरण में ही आरोपी को उसके खिलाफ लगे वास्तविक आरोपों की सही जानकारी नहीं दी गई थी, जिससे उसे जमानत पाने का एक मजबूत आधार मिल गया।
इस मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत में यह दलील दी थी कि गिरफ्तारी दस्तावेजों में हत्या को परिभाषित करने वाली धारा 103(1) की जगह भारतीय न्याय संहिता की धारा 403(1) का लिखा जाना महज एक टाइपिंग की गलती थी। गौरतलब है कि कानूनी तौर पर धारा 403(1) जैसा कोई प्रावधान मौजूद ही नहीं है।
इस पर अदालत ने कहा कि पूरे रिकॉर्ड में कई जगह ऐसी स्पष्ट गलतियों का होना अधिकारियों की लापरवाही को ही उजागर करता है। जब किसी मामले को मजबूत करने का बुनियादी आधार ही कमजोर हो, तो बाद में उसे सुधारने की सारी कोशिशें विफल हो जाती हैं।
हालांकि, उच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि वे इस मामले की मूल जांच, दायर की गई चार्जशीट या आरोप तय करने की प्रक्रिया पर कोई सवाल नहीं उठा रहे हैं। मामले का ट्रायल बिना किसी बाधा के जारी रहेगा। अदालत ने बताया कि कानूनी खराबी केवल गिरफ्तारी के समय अपनाई गई प्रक्रिया में थी। ‘लेबियस आरेंग बनाम मेघालय राज्य’ के अपने पुराने आदेश का हवाला देते हुए कोर्ट ने अधिकारियों को भविष्य में गिरफ्तारी के कारण तैयार करते समय विशेष सावधानी बरतने की नसीहत दी।
इस सनसनीखेज हत्याकांड की पृष्ठभूमि की बात करें तो इंदौर के रहने वाले 29 वर्षीय व्यवसायी राजा की शादी 11 मई 2025 को सोनम से हुई थी। यह नवविवाहित जोड़ा हनीमून के लिए शिलॉन्ग गया था और बाद में वहां से सोहरा चला गया। 23 मई को यह जोड़ा अचानक लापता हो गया था।
बाद में राजा का शव वेसावदोंग फॉल्स के पास एक गहरी खाई से बरामद किया गया था। इस वारदात का खुलासा होने पर पुलिस ने सोनम को उसके कथित प्रेमी राज कुशवाहा और हत्या को अंजाम देने वाले तीन अन्य लोगों के साथ गिरफ्तार कर लिया था।
सोनम को 9 जून 2025 को गाजीपुर से गिरफ्तार किया गया था और वह दस महीने से अधिक समय तक न्यायिक हिरासत में रही। इसके बाद शिलॉन्ग के अतिरिक्त उपायुक्त (न्यायिक) ने पुलिस की इसी त्रुटिपूर्ण गिरफ्तारी प्रक्रिया के आधार पर 27 अप्रैल को उसे जमानत दे दी थी।
राज्य सरकार की तरफ से महाधिवक्ता ए कुमार ने जमानत रद्द करने की पुरजोर वकालत की थी। उन्होंने तर्क दिया था कि 11 जून 2025 को एक मजिस्ट्रेट के सामने सोनम ने खुद मौखिक रूप से स्वीकार किया था कि उसे अपनी गिरफ्तारी के कारण पता हैं। इसके बावजूद, उच्च न्यायालय ने पुलिस की शुरुआती कागजी कार्यवाही को आधारहीन मानते हुए निचली अदालत के जमानत के फैसले को बरकरार रखा।
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