देश के उच्च शिक्षा तंत्र और रोजगार बाजार की वास्तविक जरूरतों के बीच की खाई लगातार गहरी होती जा रही है। नीति आयोग की शनिवार को जारी रिपोर्ट ‘रीइमेजिनिंग स्किलिंग फॉर विकसित भारत’ (Reimagining Skilling for Viksit Bharat) के अनुसार, भारत में 90 प्रतिशत से अधिक ग्रेजुएट ऐसे पदों पर कार्य कर रहे हैं जो उनकी शैक्षणिक योग्यता और डिग्री से मेल नहीं खाते हैं।
आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के आंकड़ों का हवाला देते हुए थिंक टैंक ने रेखांकित किया कि देश में केवल 8.25 प्रतिशत ग्रेजुएट्स को ही अपनी योग्यता के अनुरूप रोजगार मिल पाता है। संस्था के अनुसार अधिकांश शिक्षण संस्थानों का पाठ्यक्रम पुराना और उद्योग जगत की बदलती मांगों से असंबद्ध है, जिसके चलते डिग्रियां और डिप्लोमा युवाओं को रोजगार दिलाने में सक्षम साबित नहीं हो रहे हैं।
देश में शिक्षित बेरोजगारी का स्तर राष्ट्रीय औसत 3.2 प्रतिशत के मुकाबले काफी चिंताजनक बना हुआ है। वर्तमान में कुल ग्रेजुएट्स में बेरोजगारी दर 13 प्रतिशत है, जबकि शिक्षित महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा 20.4 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
रिपोर्ट में पारंपरिक डिग्री पाठ्यक्रमों पर अत्यधिक निर्भरता को भी इस संकट की बड़ी वजह बताया गया है। देश में अंडरग्रेजुएट स्तर पर नामांकित 3.4 करोड़ छात्रों में से 1.13 करोड़ केवल बीए में हैं, जबकि बीए, बीएससी और बीकॉम का कुल नामांकन 2 करोड़ से अधिक है। सीधे रोजगार के सीमित अवसरों वाले इन सामान्य पाठ्यक्रमों में भारी भीड़ समस्या को और गंभीर बना रही है।
आयोग ने अध्ययन में यह भी साझा किया कि 15 से 29 वर्ष के आयु वर्ग के 8.7 करोड़ युवा (श्रम बल से बाहर की कुल आबादी का 11 प्रतिशत) ‘नीट’ (नॉट इन एजुकेशन, एम्प्लॉयमेंट या ट्रेनिंग) श्रेणी में आते हैं। हालांकि, बाद में मंगलवार को जारी स्पष्टीकरण में आयोग ने साफ किया कि इस श्रेणी में वे लोग शामिल हैं जो वर्तमान में रोजगार की तलाश नहीं कर रहे हैं, इसलिए इसे बेरोजगारी की दर या बेरोजगारों की संख्या में जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
शिक्षित युवाओं में कार्यकुशलता की कमी पर 17 अगस्त को एक साक्षात्कार के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था कि मौजूदा शिक्षा प्रणाली डिग्री और प्रमाणपत्र धारक युवा तो तैयार कर रही है, लेकिन वे नौकरी या नया व्यवसाय शुरू करने के व्यावहारिक कौशल से पूरी तरह लैस नहीं हैं, जिसमें तत्काल सुधार की आवश्यकता है।
शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी में आई वृद्धि को इस वर्ष की शुरुआत में अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया’ रिपोर्ट में भी उजागर किया गया था। इस अध्ययन के अनुसार 25 वर्ष से कम आयु के ग्रेजुएट्स में बेरोजगारी दर 1983 के 35 प्रतिशत से बढ़कर 2023 में 39 प्रतिशत हो गई, जबकि 25 से 29 वर्ष के आयु वर्ग में यह 1983 के 12 प्रतिशत से उछलकर 2023 में 20 प्रतिशत पर पहुंच गई।
नीति आयोग ने यह भी इंगित किया कि भारत में वोकेशनल स्किलिंग, आईटीआई और तकनीकी डिप्लोमा पाठ्यक्रमों को समाज में हीन भावना या ‘दूसरे दर्जे’ के विकल्प के रूप में देखा जाता है। छात्र और अभिभावक अपने करियर का चयन योग्यता या दीर्घकालिक संभावनाओं के बजाय परीक्षा के अंकों, पारिवारिक दबाव या कौशल प्रशिक्षण की लागत को ध्यान में रखकर करते हैं।
सही पाठ्यक्रमों के बारे में जागरूकता का अभाव भी एक बड़ी बाधा बना हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार 47 प्रतिशत महिलाएं, 43 प्रतिशत नीट श्रेणी के युवा, 36 प्रतिशत उच्च शिक्षा के छात्र, 52 प्रतिशत औपचारिक श्रमिक और 55 प्रतिशत अनौपचारिक श्रमिक सही प्रशिक्षण की जानकारी न होने के कारण स्किलिंग से वंचित रह जाते हैं।
बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) के हायर एजुकेशन सर्वे के आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि बिना अतिरिक्त कौशल के सामान्य डिग्री लेने वाले युवाओं का शुरुआती औसत वेतन 22,000 रुपये प्रति माह होता है, जबकि कौशल प्रशिक्षण लेने वालों को 29,000 रुपये प्रति माह का शुरुआती वेतन मिलता है। 3.2 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर के आधार पर, शुरुआत का यह 7,000 रुपये का मासिक अंतर 10 वर्षों में कुल 9.7 लाख रुपये के भारी आय अंतर में बदल जाता है।
मौजूदा कौशल विकास ढांचों में परिणामों और रोजगार पर पर्याप्त ध्यान न दिए जाने की बात भी सामने आई है। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY), दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्या योजना (DDU-GKY) और पीएम इंटर्नशिप स्कीम जैसी सरकारी पहलों को लेकर लक्षित वर्ग में जागरूकता अभी भी काफी कम है।
भविष्य की दिशा तय करते हुए नीति आयोग ने आपूर्ति आधारित मॉडल के बजाय उद्योग-आधारित, मांग-प्रेरित और परिणाम-उन्मुख कौशल कार्यक्रमों को बढ़ावा देने का सुझाव दिया है। पारंपरिक डिग्री को बीए हॉस्पिटैलिटी, बीएससी एप्लाइड टेक्नोलॉजी और बीकॉम एनालिटिक्स जैसे रोजगारपरक पाठ्यक्रमों में पुनर्गठित करने की सिफारिश की गई है।
इसके साथ ही अप्रेंटिसशिप एम्बेडेड डिग्री प्रोग्राम (AEDP) और वर्क-इंटीग्रेटेड डिग्री प्रोग्राम (WIDP) के विस्तार, ओडिशा के ‘वर्ल्ड स्किल सेंटर’ की तर्ज पर नए पीपीपी स्किलिंग विश्वविद्यालयों की स्थापना तथा खनन और पारंपरिक ऑटोमोबाइल जैसे बदलते क्षेत्रों के लिए री-स्किलिंग रणनीति लागू करने पर बल दिया गया है।
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