जन कल्याण के मोर्चे पर मोदी राज बनाम मनमोहन राज में से कौन बेहतर?

| Updated: January 11, 2022 9:54 am

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण या एनएफएचएस का पांचवां संस्करण हाल ही में आया है।

ऐतिहासिक संदर्भों में देखते हुए यहां इस सर्वेक्षण के कुछ प्रमुख निष्कर्षों पर चर्चा की जा रही है। खासकर जब हम देखते हैं कि वर्तमान मोदी शासन और पिछले यूपीए शासन के तहत एनएफएचएस द्वारा मापे गए विभिन्न मानव विकास मैट्रिक्स में चीजें कैसे बदल गई हैं।

पहले कुछ बैकग्राउंड

भारत ने हमेशा एक कल्याणकारी देश बनने का प्रयास किया है, जहां सरकार अपने सभी नागरिकों को आर्थिक और सामाजिक सहायता प्रदान करने में सायास और सक्रिय भूमिका निभाती है। आजादी के बाद से हर क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीतिक दल ने गरीबी में फंसे लाखों लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के इरादे से इस दृष्टिकोण का पालन किया है। सत्ता में आने के बाद इन पार्टियों ने अपनी बयानबाजी को सही साबित करने के लिए अनगिनत योजनाओं को लागू भी किया है। यह नेक इरादे हों, सैद्धांतिक राजनीति हो या सिर्फ चुनावी गणित, लोक कल्याण भारत में राजनीतिक विमर्श और सार्वजनिक नीति दोनों का केंद्रीय मुद्दा रहा है।

हालांकि इरादे हमेशा परिणामों में तब्दील नहीं होते हैं, खासकर सार्वजनिक नीति में।

किसी भी लोक कल्याणकारी पहल की प्रभावशीलता का आकलन करना प्रमुख चुनौती रहती है। किसी भी प्रयास के लिए आवंटित इनपुट की निगरानी करना आसान है। लेकिन विशेष रूप से खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि जैसे कल्याणकारी क्षेत्रों में आउटपुट को मापने के लिए कोई आसान प्रतिक्रिया तंत्र नहीं है। इस गांठ को बंद करने का एकमात्र तरीका व्यापक सर्वेक्षण और सांख्यिकीय विश्लेषण करने का कठिन कार्य करना है।

 देश भर के घरों से व्यवस्थित डेटा एकत्र करने का ऐसा ही एक प्रयास राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण है। एनएफएचएस  पूरे भारत में किया जाने वाला एक बड़े पैमाने पर, बहु-स्तरीय सर्वेक्षण है। यह स्वास्थ्य, पोषण, सामाजिक मुद्दों, साक्षरता, और सार्वजनिक उपयोगिताओं तक पहुंच से संबंधित संकेतकों की एक विस्तृत श्रृंखला को मापता है, जिसमें सार्वजनिक कल्याण के सभी उपायों की बात होती है। इस सर्वेक्षण को स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय कराता है, जो पहली बार 1992-93 में हुआ था। तब से यह चार और बार हो चुका है।

एनएफएचएस वेबसाइट के अनुसार, “इसके प्रत्येक क्रमिक दौर में दो विशिष्ट लक्ष्य हैं: ए) स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय एवं नीति और कार्यक्रम के उद्देश्यों के लिए कार्यरत अन्य एजेंसियों द्वारा स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर आवश्यक डेटा प्रदान करना, और बी) महत्वपूर्ण उभरते स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मुद्दों पर जानकारी प्रदान करना।”

इसके लिए सर्वेक्षण स्वास्थ्य, शिक्षा और रहने की स्थिति से संबंधित मुद्दों को व्यापक स्तर पर जानकारी एकत्र करता है, जो बहुत ही बारीक स्तर पर एक विस्तृत डेटासेट प्रदान करता है। जैसे ताजा सर्वेक्षण ने 6,36,699 घरों, 7,24,115 महिलाओं और 1,01,839 पुरुषों से 131 प्रमुख संकेतकों पर जानकारी एकत्र की और जिला स्तरीय डेटा ग्रैन्युलैरिटी प्रदान की।

पिछले दो सर्वेक्षण 2004-05 और 2015-16 में किए गए थे।

या तो संयोग से या सायास, पिछली तीन सर्वेक्षण समय-सीमाएं के मद्देनजर राष्ट्रीय स्तर पर शासन परिवर्तन के साथ बड़े करीने से जुड़ जाते हैं। एनएफएचएस-3 (2004-05) और एनएफएचएस-4 (2014-15) के बीच डेटा में परिवर्तन को मोटे तौर पर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार (यूपीए) के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जो 2004 से 2014 तक सत्ता में थी। इसी तरह एनएफएचएस-4 के बीच डेटा में परिवर्तन ( 2014-15) और एनएफएचएस-5 (2019-21) को मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार द्वारा स्थापित नीतियों के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

बेशक, ऐसे सभी व्यापक निष्कर्ष अति सरलीकरण के लिए हो सकते हैं। लेकिन कुछ व्यापक अवलोकन और निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं, जो शुद्ध कहानी के बजाय डेटा में निहित हैं।

ध्यान रखें कि समय-सीमा यूपीए और एनडीए के शासन काल के साथ जाती हैं, लेकिन स्वास्थ्य और शिक्षा, जिन पर चर्चा की जा रही है, वे राज्य के विषय हैं। जबकि केंद्र सरकार अक्सर बजटीय परिव्यय और विभिन्न केंद्रीय योजनाओं के माध्यम से इन क्षेत्रों में नीति को प्रभावित करती है। दूसरी ओर, राज्य सरकारें प्रत्येक राज्य में अंतिम परिणामों को निर्धारित करने में अधिक प्रभावशाली होती हैं। इस प्रकार, यूपीए और एनडीए के वर्षों के बीच तुलना का उद्देश्य किसी भी शासन पर जिम्मेदारी तय करना नहीं है, बल्कि यह समझना है कि इन अवधियों में चीजें कैसे बदली हैं। साथ ही, समय के साथ रुझानों की तुलना करने से नवीनतम डेटा का संदर्भ मिलता है।

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, एनएफएचएस-5 131 संकेतकों पर जानकारी जुटाता है। इस विश्लेषण को मजेदार बनाए रखने के लिए हम बड़े समूह में 20 प्रमुख मानकों के रुझानों को समझने की कोशिश करते हैं, जिन्हें पांच अलग-अलग आयामों में बांटा जा सकता है:

(1) जीवन स्तर

(2) बाल पोषण

(3) वयस्क पोषण

(4) मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य

(5) बुनियादी साक्षरता

ध्यान दें कि इस विश्लेषण के लिए चुने गए अधिकांश मानक प्रत्यक्ष सरकारी हस्तक्षेप के कारण हैं, सर्वेक्षण में अन्य लोगों के विपरीत जो व्यक्तिगत पसंद और सामाजिक दृष्टिकोण (जैसे लिंग अनुपात, कम उम्र की शादी, परिवार नियोजन, आदि) से भी प्रभावित हो सकते हैं।

जीवन की गुणवत्ता

एनएफएचएस एक घर में उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं के बारे में जानकारी एकत्र करता है। इसमें स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता, बिजली और स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन तक पहुंच शामिल है, जो सभी के जीवन की गुणवत्ता को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं।

यहां चित्र-1 बताता है कि पिछले तीन एनएफएचएस के दौरान हमने इन मानकों को लेकर कैसा काम किया है। इस सूची में स्वास्थ्य बीमा तक पहुंच का एक अतिरिक्त संकेतक भी शामिल है।

यहां आंकड़े उत्साहजनक तस्वीर पेश करते हैं। सभी पांच उपायों में सुधार की प्रवृत्ति दिखाई देती है जो उन लाखों लोगों के लिए शुभ संकेत है, जिनके पास अब इन जीवन-सुधार और/या जीवन रक्षक सुविधाओं तक पहुंच है। ध्यान दें कि ऊपर दिए गए कुछ संकेतक जैसे स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन तक पहुंच और बेहतर पेयजल और स्वच्छता मोदी सरकार की प्रमुख योजनाओं उज्ज्वला और स्वच्छ भारत से जुड़े हैं।

स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन पर एक दिलचस्प बात: सरकार का आधिकारिक रुख यह है कि भारत में 99 प्रतिशत से अधिक घरों में उज्ज्वला योजना के तहत एलपीजी सिलेंडर हैं। फिर भी, जैसा कि ऊपर दिए गए आंकड़ों से पता चलता है, देश में 60 प्रतिशत से भी कम परिवार सक्रिय रूप से इसका उपयोग कर रहे हैं। इस विसंगति से पता चलता है कि कई परिवार सरकार द्वारा प्रदान किए जाने वाले एलपीजी कनेक्शन का लाभ उठा रहे होंगे, लेकिन सिलेंडर रिफिल के लिए भुगतान करने में असमर्थ हो सकते हैं।

बहरहाल, सर्वेक्षण के परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि 2021 में 2014-15 की तुलना में अधिक लोगों के पास यह सुविधा है। यह मोदी सरकार पर देन है। लेकिन एनडीए के शासन काल में हुई प्रगति को आंकने का एक बेहतर तरीका यह होगा कि इसकी तुलना यूपीए के शासन काल में रही सुधार की गति से की जाए। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, एनएफएचएस-3, एनएफएचएस-4 और एनएफएचएस-5 की समय-सीमा डेटा के इस तरह के आकलन की अनुमति देती है।

चित्र 2 इस तुलना को दर्शाता है। यहां ध्यान देने वाली एक महत्वपूर्ण बात यह है कि उचित तुलना के लिए आंकड़े में दिखाए गए मानक के परिवर्तन को प्रति वर्ष आधार पर सामान्यीकृत किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि एनएफएचएस-3 (2004-05) और एनएफएचएस-4 (2014-15) के बीच एक उपाय में 20 प्रतिशत का सुधार हुआ है, तो इसका सामान्य वार्षिक परिवर्तन दो प्रतिशत (20/10) होगा। प्रति वर्ष परिवर्तन के लिए मैट्रिक्स को सामान्य करने की इस पद्धति का उपयोग इस पूरे अंश में किया जाता है, जब 2004-05 से 2015-16 (यूपीए वर्ष) के बीच 2015-16 से 2019-21 (एनडीए वर्ष) के बीच के परिवर्तनों की तुलना की जाती है।

ऊपर दिए गए चार्ट से पता चलता है कि 2014-15 के बाद से स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन, पीने के पानी तक पहुंच और स्वच्छता तक पहुंच के मामले में महत्वपूर्ण सुधार हुए हैं। विशेष रूप से, प्रत्येक वर्ष (औसतन) चार प्रतिशत से अधिक आबादी को स्वच्छता तक पहुंच प्राप्त हुई, जो कि एनडीए शासन के दौरान पहले नहीं थी। यूपीए के वर्षों के दौरान यह आंकड़ा दो प्रतिशत से कम था। इन आंकड़ों से पता चलता है कि मोदी के नेतृत्व में स्वच्छ भारत और उज्ज्वला की पहल का जमीन पर फायदा हुआ है। इसके लिए मोदी सरकार श्रेय की पात्र है, क्योंकि इन तीन महत्वपूर्ण संकेतकों में सुधार के बड़े पैमाने पर सीधे-सीधे लाभ हैं।

विद्युतीकरण और जीवन बीमा तक पहुंच के लिए सुधार की दर लगभग समान है। ऐसा लगता है कि एनडीए की अवधि में विद्युतीकरण थोड़ा धीमा हो गया है, लेकिन यह संभवतः इस तथ्य के कारण है कि देश के 99 प्रतिशत से अधिक के पास बिजली की पहुंच है, जिससे विकास के लिए इतनी जरूरत अब नहीं रह गई है। बेशक सर्वेक्षण केवल बिजली आपूर्ति के लिए कहता है, निर्बाध बिजली आपूर्ति के लिए नहीं। इसलिए, बिजली आपूर्ति में सुधार की बहुत गुंजाइश है, न कि उस तरह से जिस तरह से इसे सर्वेक्षण में मापा जाता है।

शिशु पोषण

इसके बाद, आइए देखें कि बच्चों से शुरू करके पोषण के मोर्चे पर चीजें कैसे आगे बढ़ी हैं।

चित्र 3 शिशु पोषण के पांच प्रमुख संकेतकों के लिए पिछले तीन सर्वेक्षणों की प्रवृत्ति को दर्शाता है।

(ए) अंडर-5 मृत्यु दर: बच्चों की संख्या (प्रति 1,000) जो पांच साल की उम्र से पहले मर जाते हैं।

(बी) शिशु मृत्यु दर: बच्चों की संख्या (प्रति 1,000) जो एक वर्ष की आयु से पहले मर जाते हैं।

(c) बौनापन: उन बच्चों का प्रतिशत जिनकी लंबाई उम्र के हिसाब से कम है। यह जताने वाला या जीर्ण अल्पपोषण का संकेत है।

(डी) वेस्टिंग: कद के हिसाब से कम वजन वाले बच्चों का प्रतिशत। यह तीव्र या हाल ही में कुपोषण का संकेत है।

(ई) खून की कमी: एनीमिया वाले बच्चों का प्रतिशत। एनीमिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें एक व्यक्ति के शरीर में पर्याप्त ऑक्सीजन ले जाने के लिए पर्याप्त स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाओं की कमी होती है। एनीमिया होने से, जिसे कम हीमोग्लोबिन भी कहा जाता है, व्यक्ति थका हुआ और कमजोर महसूस कर सकता है। एनीमिया के सबसे आम कारणों में पोषक तत्वों की कमी, विशेष रूप से आयरन शामिल हैं।

पूर्ण संख्या एनीमिया को छोड़कर सभी मैट्रिक्स पर मामूली सुधार दिखाती है। नवीनतम सर्वेक्षण में सभी बच्चों में से 67.1 प्रतिशत एनीमिक हैं, जबकि एनएफएचएस-4 में यह 58.6 प्रतिशत है। ध्यान दें कि इन नंबरों को निर्धारित करने के लिए सर्वेक्षण के हिस्से के रूप में रक्त परीक्षण किए जाते हैं।

यहां तक कि अन्य मैट्रिक्स के लिए भी, जिनमें पूर्ण रूप से सुधार हुआ है, संख्या अभी भी बहुत कम है, जिसमें तीन में से एक बच्चा अविकसित है और पांच में से एक बच्चा बीमार हो रहा है।

चित्र-4 यूपीए और एनडीए के शासन के वर्षों के बीच सभी पांच संकेतकों के लिए डेल्टा चार्ट बताता है।

उपरोक्त आंकड़े दर्शाते हैं कि 2014-15 के बाद की अवधि में मृत्यु दर और बौनेपन में सुधार की गति वास्तव में धीमी हो गई, हालांकि नाटकीय रूप से नहीं। वेस्टिंग ने थोड़ा सुधार दिखाया, खासकर जब से यह यूपीए के वर्षों के दौरान खराब हो गया था (जैसा कि छोटी नकारात्मक संख्या से देखा जाता है)। जैसा कि पहले चर्चा की गई थी, एनडीए के वर्षों में बचपन में एनीमिया की संख्या में बदलाव वास्तव में नकारात्मक हो गया था। कुल मिलाकर, ऊपर दिया गया चार्ट बताता है कि सख्त जरूरत के बावजूद बचपन में कुपोषण को कम करने में हमारी प्रगति धीमी हो गई है।

तो क्या हम अपनी वयस्क आबादी को खिलाने में बेहतर साबित हो रहे हैं?

चित्र-5 वयस्क पोषण संकेतकों को लेकर डेटा दिखाता है: निम्न बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) और एनीमिया। प्रत्येक श्रेणी के लिए दर्शाई गई संख्या कम बीएमआई और एनीमिया वाले पुरुषों/महिलाओं का प्रतिशत है।

वयस्क पोषण के परिणाम मिश्रित होते हैं। कम बीएमआई के साथ जनसंख्या का प्रतिशत, जिसे वयस्कों में अल्पपोषण के लिए एक प्रॉक्सी के रूप में माना जा सकता है, समय के साथ घट गया है। लेकिन एनएफएचएस-4 की तुलना में एनएफएचएस-5 में अधिक पुरुष और महिलाएं एनीमिक पाए गए। यह देखते हुए कि इस अवधि में बच्चों में एनीमिया के मामले भी बढ़े हैं, अंतर्निहित कारणों को समझने के प्रयासों की आवश्यकता है।

चित्र-6 यूपीए और एनडीए के वर्षों के बीच वयस्क पोषण संकेतकों में परिवर्तन की तुलना करता है।

एनीमिया, जैसा कि हम जानते हैं, एनडीए के शासन काल में वास्तव में बदतर हो गया था। कम बीएमआई वाले वयस्क आबादी का हिस्सा दोनों समय-सीमाओं के दौरान कम हो गया (जैसा कि चार्ट में नकारात्मक मूल्यों द्वारा दिखाया गया है), लेकिन एनडीए के वर्षों के दौरान इस मोर्चे पर प्रगति की गति धीमी हो गई।

मातृ स्वास्थ्य और शिशु टीकाकरण

इसके बाद कुछ चुनिंदा स्वास्थ्य मानकों को देखें: गर्भावस्था के दौरान उपलब्ध स्वास्थ्य देखभाल, और बच्चे के टीकाकरण। यहां सूचीबद्ध मैट्रिक्स मातृ देखभाल और बच्चे के टीकाकरण का आकलन करने के लिए एनएफएचएस सर्वेक्षणों द्वारा एकत्र किए गए आंकड़ों का केवल एक अंश है।

चित्र-7 मातृ स्वास्थ्य देखभाल के दो संकेतकों के लिए डेटा दिखाता है: स्वास्थ्य संस्थाओं में जन्मों की संख्या और उन महिलाओं की संख्या जो गर्भावस्था के दौरान कम से कम चार बार डॉक्टर को दिखाने में सक्षम थीं। इसमें उन बच्चों (दो वर्ष से कम आयु) की संख्या भी शामिल है जिन्हें टीका लगाया गया था। सभी तीन मापदंडों के लिए प्रत्येक क्रमिक सर्वेक्षण के साथ चीजों में सुधार हुआ है।

एनएफएचएस-3 और एनएफएचएस-4 के बीच बच्चों की स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंच में भारी वृद्धि हुई थी। अन्य दो मापदंडों के लिए एनडीए के वर्षों के दौरान बचपन के टीकाकरण की दर में मामूली वृद्धि के साथ, सुधार की गति ज्यादातर स्थिर थी। इन प्रवृत्तियों को चित्र-8 में देखा जा सकता है जो यूपीए और एनडीए के वर्षों के बीच सामान्य वार्षिक परिवर्तन की तुलना करता है।

साक्षरता

अंत में, उन संकेतकों को देखें जो बुनियादी शिक्षा का आकलन करते हैं: पुरुषों और महिलाओं के लिए बुनियादी साक्षरता, और महिलाओं के लिए किसी भी स्कूल में उपस्थिति। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यह डेटा स्कूल में उपस्थिति दर या शैक्षिक परिणामों को नहीं बताता है। इसलिए, इसे शिक्षा की गुणवत्ता के संकेतक के साथ भ्रमित नहीं होना चाहिए। इसके बजाय यह बुनियादी साक्षरता का प्रतिनिधित्व करता है-मानव विकास का एक अनिवार्य पहलू भी है, लेकिन शिक्षा से अलग है।

चित्र-9 पिछले तीन सर्वेक्षणों के रुझान को दर्शाता है। जबकि पुरुषों के लिए बुनियादी साक्षरता का पूर्ण स्तर महिलाओं (71.4 प्रतिशत) की तुलना में अधिक (84.4 प्रतिशत) है, पिछले सर्वेक्षण के बाद से पुरुषों में साक्षरता में मामूली गिरावट आई है। महिलाओं के लिए साक्षर महिलाओं की संख्या और कभी स्कूल जाने वाली महिलाओं की संख्या दोनों में लगातार ऊपर की ओर रुझान दिखाई देता है।

यह बताता है कि उन दोनों मानक-साक्षरता और किसी भी स्कूल में उपस्थिति- में वृद्धि एनडीए के वर्षों के दौरान धीमी हो गई है। इसे नीचे के चित्र-10 में देखा जा सकता है, जो तुलनात्मक संख्या को दर्शाता है। पुरुषों के लिए, यहां तक कि पूर्ण साक्षरता संख्या में भी थोड़ी गिरावट आई है, जैसा कि नीचे दिए गए चार्ट में नकारात्मक मूल्य द्वारा देखा गया है।

कुल मिलाकर साक्षरता के आंकड़े बताते हैं कि यूपीए के वर्षों की तुलना में एनडीए के वर्षों में बुनियादी शिक्षा का नुकसान हुआ है।

तो इन आंकड़ों से क्या निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं?

यह तर्क दिया जा सकता है कि यह डेटा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार की लोक कल्याण की अवधारणा और वितरण में एक रणनीतिक बदलाव को बताता है। मूर्त वस्तुओं और एलपीजी सिलेंडर, पानी के कनेक्शन और टीकाकरण जैसी सुविधाओं के वितरण में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। इन सुधारों ने निस्संदेह रूप से आबादी के एक बड़े हिस्से को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया है, और सरकार इसके लिए श्रेय की पात्र है।

साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और पोषण के कम मूर्त क्षेत्रों में प्रगति- व्यक्तिगत स्तर पर स्थायी सशक्तिकरण और प्रणालीगत स्तर पर मानव पूंजी की गुणवत्ता दोनों के निर्धारक- या तो उलट गए हैं या धीमे पड़ गए हैं। अरविंद सुब्रमण्यम और उनके सहयोगी इसी तरह की बात करते हैं। वे इस रणनीतिक बदलाव को “नया कल्याणवाद” कहते हैं।

यह निश्चित रूप से कहना असंभव है कि जनकल्याण में यह परिकल्पित बदलाव चुनावी गणना द्वारा सूचित एक भव्य योजना का हिस्सा है, जो पीएम मोदी के विश्वदृष्टि का प्रतिबिंब है, चुनौती की विशालता का संकेत है, या वर्तमान व्यवस्था की केवल ताकत और कमजोरियों को दर्शाती है।

आखिरकार स्वास्थ्य देखभाल, पोषण और साक्षरता में बड़े पैमाने पर सुधार के लिए एलपीजी सिलेंडर, शौचालय या यहां तक कि टीकाकरण जैसी सेवाओं की उपलब्धता की तुलना में एक अलग प्रकार की क्षमता निर्माण की आवश्यकता है।

हालांकि बहस से परे बात यह है कि एनएफएचएस-5 के आंकड़े आम आबादी की जमीनी हकीकत और विभिन्न सरकारी पहलों की प्रभावशीलता में समृद्ध अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं। कोई केवल यह आशा कर सकता है कि नीति निर्माता सावधानीपूर्वक ध्यान दे रहे हैं।

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