अहमदाबाद के छात्रों की खानपान की आदतों में एक बड़ा और चिंताजनक बदलाव देखने को मिल रहा है। आज के समय में घर के बने शुद्ध और पौष्टिक खाने की जगह पैकेज्ड स्नैक्स, कैंटीन और रेस्टोरेंट का खाना तेजी से ले रहा है। हाल ही में हुए एक अहम सर्वे से पता चला है कि स्कूली बच्चों से लेकर कॉलेज और हॉस्टल में रहने वाले छात्र-छात्राओं की पहली पसंद अब जंक फूड और रेडी-टू-ईट मील्स बनते जा रहे हैं।
कंज्यूमर एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर (सीईआरसी) ने अपने ‘ईट राइट कैंपेन’ के तहत यह विस्तृत अध्ययन किया है। इस सर्वे में अहमदाबाद के 400 स्कूली बच्चों, 102 कॉलेज छात्रों और 50 हॉस्टल में रहने वाले विद्यार्थियों को शामिल किया गया था। इस दौरान उनकी खाने की पसंद और भोजन में मिलने वाले पोषण के स्तर का बारीकी से आकलन किया गया। नतीजों के मुताबिक, केवल 37 प्रतिशत स्कूली बच्चों ने ही घर के बने भोजन को अपनी पहली पसंद बताया।
स्कूली बच्चों के बाकी आंकड़े जंक फूड के बढ़ते प्रभाव को दर्शाते हैं। करीब 30 फीसदी बच्चे पैकेज्ड स्नैक्स खाना ज्यादा पसंद करते हैं। इसके अलावा 20 प्रतिशत का झुकाव पास्ता, नूडल्स या पिज्जा जैसी चीजों की तरफ है। वहीं, 13 फीसदी बच्चे बाजार में मिलने वाले रेडी-टू-ईट फूड को प्राथमिकता दे रहे हैं।
कॉलेज जाने वाले युवाओं की आदतें भी इस सर्वे में काफी चौंकाने वाली रही हैं। यहां सिर्फ 20 फीसदी युवा ही ताजा और घर का बना खाना पसंद करते हैं, जबकि लगभग 22 प्रतिशत छात्र नियमित रूप से कॉलेज की कैंटीन या कैफेटेरिया का खाना खाते हैं।
इनमें से 23 फीसदी युवाओं की दिनचर्या में चाय और कॉफी का बहुत ज्यादा इस्तेमाल देखा गया है। हैरानी की बात यह है कि केवल 9 प्रतिशत कॉलेज छात्र ही घर से अपना लंच बॉक्स लेकर आते हैं। ताजे फलों और सब्जियों का नियमित सेवन करने वालों की संख्या भी महज 9 फीसदी ही दर्ज की गई।
हॉस्टल में रहने वाले छात्रों की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। करीब 35 प्रतिशत हॉस्टलर्स पूरी तरह से होटल, रेस्टोरेंट या बाहर के स्ट्रीट फूड पर निर्भर हैं। इनके मुकाबले सिर्फ 19 फीसदी छात्र ही घर का बना खाना खाने की इच्छा जताते हैं।
नियमित रूप से हॉस्टल की मेस में खाना खाने वाले छात्रों की संख्या महज 12 प्रतिशत है। इसके अलावा 9 फीसदी ने फास्ट फूड और पैकेज्ड फूड को अपनी पसंद बताया है। मौसमी फलों और सब्जियों को तरजीह देने वाले हॉस्टल के छात्रों का आंकड़ा निराशाजनक रूप से सिर्फ 6 प्रतिशत ही पाया गया है।
इस सर्वे ने बच्चों के खानपान में पोषण की भारी कमी को सीधे तौर पर उजागर किया है। हालांकि आधे से ज्यादा बच्चों के लंच बॉक्स में अभी भी रोटी, सब्जी, चावल, दाल और सैंडविच देखने को मिल जाते हैं। लेकिन इसके बावजूद फलों, ताजी सब्जियों और डेयरी उत्पादों की मौजूदगी उनके डिब्बों से लगभग गायब हो गई है। इनकी जगह प्रोसेस्ड स्नैक्स, नूडल्स, चिप्स और पैकेट बंद पेय पदार्थों ने ले ली है।
सीईआरसी की सीईओ अनिंदिता मेहता ने इन नतीजों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि युवाओं के खानपान को सुधारने के लिए उन्हें सिर्फ ‘स्वस्थ खाने’ की सलाह देना अब काफी नहीं होगा। इसके लिए माता-पिता, छात्रों, स्कूलों, कॉलेजों और हॉस्टल प्रबंधनों को मिलकर काम करना होगा। सभी को साथ आकर स्वस्थ विकल्पों को व्यावहारिक, सुलभ और आकर्षक बनाने की जिम्मेदारी निभानी होगी।
संस्था की तरफ से पोषण जागरूकता कार्यक्रमों को लगातार चलाने पर जोर दिया गया है। इसके साथ ही कैंटीन और हॉस्टल के भोजन में स्वस्थ विकल्पों को शामिल करने और संतुलित आहार पैक करने के लिए उचित मार्गदर्शन की सिफारिश की गई है।
अनिंदिता मेहता ने स्पष्ट किया कि मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सुविधा के चक्कर में बच्चों के पोषण से कोई समझौता न हो। जैसे-जैसे बच्चे बड़े हों, उनका साधारण टिफिन बॉक्स उनके लिए एक स्वस्थ आदत और बेहतर जीवन का आधार बनना चाहिए।
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