‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक जांच के अनुसार, भारत के चुनाव आयोग (ECI) के भीतर एक बड़ा और अभूतपूर्व विवाद सामने आया है। चुनाव आयोग द्वारा जून 2025 में बिहार से शुरू किए गए विशेष गहन संशोधन (SIR) अभियान के तहत 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लगभग 13 करोड़ मतदाताओं के नाम मसौदा सूची से हटा दिए गए हैं। इस कदम ने यह तय करने में आयोग की भूमिका पर एक तीखी सार्वजनिक बहस छेड़ दी है कि किसे वोट देने का अधिकार है और किसे नहीं।
इस जांच से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर ही इन संवेदनशील मुद्दों पर बार-बार सवाल उठाए गए हैं। दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार आधिकारिक तौर पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक ही दिन में चार बार आपत्तियां दर्ज की गईं। दोनों आयुक्तों का कहना है कि कई महत्वपूर्ण फैसले उनकी जानकारी के बिना लिए गए हैं और उन्हें अंधेरे में रखा गया।
ये आपत्तियां चुनाव आयोग के मुख्य कामकाज से जुड़ी हैं। इनमें नए मतदाताओं का पंजीकरण, मतदाता सूची से नामों को हटाना और जोड़ना, तथा पूरे मतदाता डेटाबेस की सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल हैं। आयुक्तों ने नए मतदाताओं से जुड़े कुछ कदमों को पूरी तरह से अनाधिकृत और अवैध करार दिया है।
उन्होंने दिल्ली में मतदाता डेटाबेस तक पहुंच के केंद्रीकरण को लेकर भी कड़ी चेतावनी दी है, जो जमीनी स्तर के राज्य अधिकारियों की अनदेखी करता है। मतदाता सॉफ्टवेयर की अखंडता को लेकर चिंतित असंतुष्ट आयुक्तों ने अपनी शिकायत लेकर कैबिनेट सचिव तक का दरवाजा खटखटाया है।
हाल ही में, एक बड़े और अप्रत्याशित कदम के तहत, जोशी और संधू ने अलग-अलग कैबिनेट सचिव को पत्र लिखकर काम के आवंटन में किए गए बदलावों की शिकायत की। उनका आरोप है कि इन बदलावों ने मतदाता सूची के आईटी ढांचे पर निगरानी के एक महत्वपूर्ण स्तर को हटा दिया है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि ये बदलाव उनकी जानकारी के बिना किए गए थे और उन्होंने इसे निरस्त कर दिया। इसके बाद 9 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और दोनों आयुक्तों के बीच चार महीने में पहली पूर्ण बैठक हुई।
यह विवाद इसलिए भी अधिक ध्यान खींचता है क्योंकि तीनों अधिकारियों को एनडीए सरकार द्वारा चुना गया था। 2023 के अधिनियम के तहत इनकी नियुक्ति प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री और विपक्ष के नेता की समिति द्वारा की गई थी। मार्च 2024 में संधू और ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति के समय कांग्रेस के तत्कालीन नेता अधीर रंजन चौधरी ने असहमति जताई थी।
वहीं, फरवरी 2025 में जब कुमार को CEC बनाया गया और जोशी की नियुक्ति हुई, तब लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी इस प्रक्रिया पर अपनी असहमति दर्ज की थी।
विवाद का एक प्रमुख कारण ‘फॉर्म-6’ में किया गया बदलाव है। जुलाई में नए मतदाताओं के लिए भरे जाने वाले इस फॉर्म में एक नया सवाल जोड़ा गया, जिसमें पूछा गया कि क्या आवेदक या उनके परिजनों का नाम पिछले SIR की मतदाता सूची में मौजूद है।
मई महीने में ही जोशी ने फाइल पर चेतावनी दी थी कि सरकार द्वारा नियमों में संशोधन किए बिना इस फॉर्म में बदलाव नहीं किया जा सकता, जिस पर संधू ने भी सहमति जताई थी। इसके बावजूद यह बदलाव लागू कर दिया गया, जिसे 13 अगस्त को संधू ने आधिकारिक तौर पर अवैध बताते हुए तुरंत हटाने की मांग की।
मतदाता सूची तक पहुंच को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। चुनाव आयोग हमेशा से यह दावा करता रहा है कि मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया विकेंद्रीकृत है और यह इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) के नियंत्रण में होती है। लेकिन दोनों आयुक्तों ने ERONet और ECINet सॉफ्टवेयर तक ERO की पहुंच को सीमित किए जाने पर लगातार सवाल उठाया है।
मई में जोशी ने और बाद में अगस्त में संधू ने इस क्रमिक केंद्रीकरण का कड़ा विरोध किया। संधू ने स्पष्ट किया कि आईटी महानिदेशक सीमा खन्ना के पास वैधानिक अधिकारियों की उचित और पूर्ण पहुंच को प्रतिबंधित करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
पश्चिम बंगाल में चलाए गए SIR अभियान पर भी गहरा विवाद देखने को मिला। वहां नामों को हटाने के तरीके ने सुप्रीम कोर्ट को फरवरी 2026 में हस्तक्षेप करने के लिए प्रेरित किया, जहां 60 लाख संदिग्ध मतदाताओं के मामले में न्यायिक अधिकारियों को फैसला करने का निर्देश दिया गया।
इनमें से 27 लाख मतदाताओं को आयोग ने हटा दिया। बाद में आयोग ने अदालत को बताया कि ट्रिब्यूनल के समक्ष 38 लाख अपीलें लंबित हैं। इनमें से 16.10 लाख अपीलें उन मतदाताओं के खिलाफ दायर की गई थीं, जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने शामिल किया था। संधू ने अगस्त में अधिकारियों से सवाल किया कि चुनाव आयोग की ओर से इन अपीलों को दायर करने का अधिकार किसे दिया गया था, क्योंकि उन्हें या पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इसकी कोई जानकारी नहीं थी।
केंद्रीकरण की इसी समस्या के कारण गोवा में 97 योग्य मतदाता अपने अधिकार से वंचित रह गए। 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जब गोवा के ERO ने दस्तावेजों की जांच की, तो इन मतदाताओं को अंतिम सूची के लिए योग्य पाया। लेकिन केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर में इस फैसले को दर्ज करने का कोई विकल्प नहीं था। 11 से 17 फरवरी के बीच गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने राज्य के प्रभारी वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त ज्ञानेश भारती और आईटी महानिदेशक को आठ बार पत्र लिखकर सुधार का विकल्प मांगा। कोई जवाब नहीं मिलने के कारण ये 97 मतदाता अंतिम सूची से बाहर रह गए।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 और 2023 के अधिनियम की धारा 18 के अनुसार, चुनाव आयोग के सभी कार्य यथासंभव सर्वसम्मति से होने चाहिए। मतभेद की स्थिति में बहुमत से निर्णय लिया जाना चाहिए। इसी नियम का हवाला देते हुए 16 अप्रैल को संधू और 24 अप्रैल को जोशी ने आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि कोई भी आधिकारिक पत्राचार आयोग की उचित मंजूरी के बिना जारी नहीं किया जाना चाहिए।
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने इन तमाम गंभीर मुद्दों पर 21 सितंबर को आयोग और दोनों आयुक्तों को प्रश्नावली भेजकर जवाब मांगा था, लेकिन उनकी तरफ से कोई भी प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हुई।
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