टाटा को वापस मिली एयर इंडिया: महाराजा को टाटा समूह को सौंपने का क्या है मतलब?

| Updated: January 27, 2022 7:43 pm

टाटा ग्रुप ने लगभग 69 साल बाद गुरुवार को सरकार से आधिकारिक तौर पर एयर इंडिया का अधिग्रहण कर लिया। इस तरह आज से इस एयरलाइन का पूरा मैनेजमेंट और नियंत्रण टाटा ग्रुप के पास आ गया है। एयर इंडिया को आधिकारिक रूप से टाटा ग्रुप को सौंपे जाने से पहले गुरुवार को टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इस मौके पर एन चंद्रशेखरन ने कहा, “हम एयर इंडिया को वापस टाटा ग्रुप में पाकर बेहद खुश हैं और इसे एक विश्वस्तरीय एयरलाइन बनाने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं। मैं एयर इंडिया के सभी कर्मचारियों का गर्मजोशी से स्वागत करता हूं।”

सरकार से टाटा समूह में एयर इंडिया के स्थानांतरण से कम से कम पहले कुछ महीनों के लिए परिचालन पर भारी असर पड़ने की संभावना नहीं है। हालांकि कुछ मामूली बदलाव हो सकते हैं। इनमें कर्मचारियों या उड़ान संचालन में परिवर्तन शामिल हैं। ग्राहकों के भी प्रभावित होने की संभावना नहीं है, क्योंकि हस्तांतरण के बाद उड़ान संचालन में कोई बदलाव नहीं आएगा। उड़ान भरने वालों को केवल वही बदलाव देखने को मिलेंगे जो विमान के अंदर और बाहर ब्रांडिंग से संबंधित होंगे।

इस बीच दो एयरलाइन पायलट यूनियनों- इंडियन पायलट्स गिल्ड (आईपीजी) और इंडियन कमर्शियल पायलट एसोसिएशन (आईसीपीए) ने पिछले दिनों एयर इंडिया के सीएमडी विक्रम देव दत्त को कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी थी, क्योंकि बकाया राशि पर “कई कटौती और वसूली का अनुमान लगाया गया है।” दोनों यूनियनों द्वारा भेजे गए पत्र में कहा गया है, “यह वसूली पूरी तरह से अवैध है और हम मांग करते हैं कि इस विसंगति को ठीक किया जाए और बकाया राशि का भुगतान तत्काल प्रभाव से किया जाए।”

इतना ही नहीं, दो अन्य यूनियनों ने भी अपनी उड़ानों से ठीक पहले हवाई अड्डों पर केबिन क्रू सदस्यों के बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) को तैयार करने और मापने के लिए 20 जनवरी वाले आदेश का विरोध किया है। इन यूनियनों – एयर इंडिया कर्मचारी संघ (एआईईयू) और ऑल इंडिया केबिन क्रू एसोसिएशन (एआईसीसीए) ने दत्त को पत्र लिखकर इस आदेश का विरोध करते हुए कहा कि यह अमानवीय है और विमानन नियामक डीजीसीए द्वारा निर्धारित नियमों का उल्लंघन है।

विमानन के प्रति टाटा का लगाव

कहना ही होगा कि एयर इंडिया का 100 प्रतिशत टैलेस प्राइवेट लिमिटेड को हस्तांतरित किया गया है, जो टाटा संस की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है। सौदे के एक हिस्से के रूप में टाटा समूह को एयर इंडिया एक्सप्रेस और ग्राउंड हैंडलिंग आर्म एयर इंडिया एसएटीएस में 50 प्रतिशत हिस्सेदारी भी सौंपी गई। एयर इंडिया के नए मालिक टाटा, उड्डयन मंत्रालय में एक दुर्जेय खिलाड़ी बनने जा रहे हैं, क्योंकि उन्हें एयर इंडिया के हैंडओवर के साथ विदेशों में हवाई अड्डों पर 900 स्लॉट के अलावा घरेलू हवाई अड्डों पर 4,400 घरेलू और 1,800 अंतरराष्ट्रीय लैंडिंग और पार्किंग स्लॉट का नियंत्रण मिलेगा।

टाटा समूह के पास पहले से ही एयरएशिया और विस्तारा में बड़ी हिस्सेदारी है। इसलिए लंबी अवधि में, संभावना है कि समूह अपने सभी एयरलाइन व्यवसायों को विलय करने पर विचार कर सकता है, जिससे खर्च में कटौती और लाभ में वृद्धि संभव है।

एयर इंडिया सेल

एयर इंडिया का निजीकरण लंबे समय से लंबित था। भारत सरकार 2017 से इसका निजीकरण करने की कोशिश कर रही थी। 2007 में इंडियन एयरलाइंस के साथ विलय के बाद से राष्ट्रीय वाहक घाटे में है। सरकार एयरलाइन को बचाए रखने के लिए करदाताओं के पैसे का उपयोग कर रही है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अनुसार, सरकार ने 2009 से एयर इंडिया में अपने घाटे को पूरा करने के लिए इक्विटी के रूप में 1,10,276 करोड़ रुपये का निवेश किया। टाटा समूह ने प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के बाद 8 अक्टूबर, 2021 को सरकार से 18,000 करोड़ रुपये में एयर इंडिया को पुनः प्राप्त किया। उसके बाद, 11 अक्टूबर को टाटा समूह को एक आशय पत्र (एलओआई) जारी किया गया था, जिसमें एयरलाइन में अपनी 100 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने की सरकार की इच्छा की पुष्टि की गई थी। सरकार ने 25 अक्टूबर, 2021 को सौदे के लिए शेयर खरीद समझौते (एसपीए) पर हस्ताक्षर किए।

यूं रहा सफरनामा

गौरतलब है कि टाटा संस ने 1932 में टाटा एयर सर्विसेज नाम से एयरलाइन सेवा शुरू की थी। बाद में इसका नाम बदलकर टाटा एयरलाइंस कर दिया गया था। चूंकि जेआरडी टाटा खुद एक प्रशिक्षित पायलट थे, इसलिए उन्होंने टाटा एयरलाइंस के रूप में इसे शुरू किया था। 1947 में स्वतंत्रता के बाद एक राष्ट्रीय एयरलाइंस के तौर पर भारत सरकार ने एयर इंडिया में 49 फीसदी हिस्सेदारी ले ली। सरकार ने 1953 में एयर कॉरपोरेशन एक्ट पास कर टाटा ग्रुप से इस कंपनी में बहुलांश हिस्सेदारी खरीद ली। इस तरह एयर इंडिया पूरी तरह से सरकारी कंपनी बन गई थी, लेकिन लगभग 67 वर्ष बाद गुरुवार को वापस टाटा ग्रुप की हो गई।

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