उत्तर प्रदेश सरकार ने अपनी महत्वाकांक्षी ‘वन डिस्ट्रिक्ट-वन कुजीन’ (ओडीओसी) योजना के तहत राज्य के सभी 75 जिलों के लिए एक विस्तृत व्यंजन मानचित्र (क्युजिन मैप) जारी किया है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य हर जिले के खास व्यंजनों की ब्रांडिंग, मार्केटिंग और निर्यात को बढ़ावा देना है। इस नई सूची की सबसे अहम बात यह है कि इसमें शामिल हर एक आइटम पूरी तरह से शाकाहारी है।
लखनवी राबड़ी, जौनपुर की इमरती, आगरा का पेठा, मथुरा का पेड़ा और वाराणसी की कचौड़ी उन कुछ प्रमुख और ऐतिहासिक व्यंजनों में शामिल हैं, जिन्हें इस योजना के जरिए बड़े पैमाने पर प्रमोट किया जाएगा।
पिछले साल नवंबर में मुख्यमंत्री ने लखनऊ को यूनेस्को द्वारा ‘ग्लोबल सिटी ऑफ गैस्ट्रोनॉमी’ के रूप में मिली मान्यता का जिक्र करते हुए इस योजना की घोषणा की थी। नई सूची में लखनऊ को रेवड़ी, आम के उत्पाद, चाट और मलाई मक्खन आवंटित किए गए हैं।
हालांकि, राजधानी की पाककला को देश-दुनिया में खास पहचान दिलाने वाले गलावटी कबाब, अवधी बिरयानी, नहारी कुलचा और काकोरी कबाब जैसे मशहूर मांसाहारी व्यंजनों को इसमें जगह नहीं मिली है।
मंगलवार को अधिसूचित की गई इस सूची से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सबसे प्रसिद्ध मुरादाबादी बिरयानी भी नदारद है। दूसरी ओर, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में आने वाले गौतम बुद्ध नगर (नोएडा और ग्रेटर नोएडा) को केक और बेकरी उत्पादों के लिए चुना गया है। वहीं, रायबरेली की प्रविष्टि में सिर्फ ‘मसाले’ दर्ज किए गए हैं।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले साल 8 नवंबर को इस योजना की घोषणा की थी। इसके बाद इस साल 24 जनवरी को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्य के ‘वन डिस्ट्रिक्ट, वन प्रोडक्ट’ कार्यक्रम की तर्ज पर इसे औपचारिक रूप से लॉन्च किया।
सरकार ने इस पूरी परियोजना को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए 150 करोड़ रुपये का बजट तय किया है। इसके तहत स्थानीय कारीगरों और उद्यमियों को 25 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जाएगी, जिसकी अधिकतम सीमा 20 लाख रुपये तय की गई है। कोई भी व्यक्ति इस सब्सिडी का लाभ केवल एक बार ले सकेगा। हालांकि, इस आर्थिक मदद से जुड़े बारीक दिशा-निर्देश अभी जारी किए जाने हैं।
कई जिलों के मामले में यह सूची वास्तव में वहां की विविध और क्षेत्रीय परंपराओं का प्रतिनिधित्व करती है। आजमगढ़ का सफेद गाजर का हलवा, महोबा का खजूर का गुड़, हमीरपुर के बुंदेली दाल आधारित व्यंजन और वाराणसी की ठंडाई, लस्सी व बनारसी पान को योजना के मूल उद्देश्य के अनुरूप शामिल किया गया है।
आगरा का पेठा, मथुरा का पेड़ा और छप्पन भोग जैसी राज्य की प्रसिद्ध मिठाइयां भी इसका प्रमुख हिस्सा बनी हैं।
यूपी के एमएसएमई और निर्यात प्रोत्साहन विभाग के प्रमुख सचिव शशि भूषण लाल सुशील ने बताया कि इस पहल का मकसद गुणवत्ता, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग में सुधार करके भारत और दुनिया की थाली में यूपी के व्यंजनों की पहुंच को बढ़ाना है।
योजना के तहत व्यंजनों की शेल्फ-लाइफ बढ़ाने, गुणवत्ता का मानकीकरण करने, हर व्यंजन के लिए एक खास लोगो बनाने और मेलों, प्रदर्शनियों व ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए बाजार तक पहुंच आसान बनाने की रूपरेखा तैयार की गई है।
हालांकि, सूची के पूरी तरह शाकाहारी होने और इसमें किए गए कुछ चयनों पर सवाल भी उठने लगे हैं। कुजीन सोसाइटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और जाने-माने खाद्य इतिहासकार पुष्पेश पंत ने इस पर असहमति जताई है। उन्होंने इस पूरी कवायद को हास्यास्पद बताते हुए कहा कि ‘कुजीन’ (पाककला) शब्द का मूल अर्थ ही गलत समझा गया है।
पंत ने कहा कि सूची में कम से कम एक ऐसा व्यंजन होना चाहिए जिसकी अपनी एक स्पष्ट और अलग पहचान हो। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि जिले केवल प्रशासनिक इकाइयां हैं जिन्हें समय-समय पर फिर से तय किया जाता है, जिससे पीढ़ियों की साझा पाक विरासत भी बंट जाती है। उनका मानना है कि भोजन किसी भी मानव निर्मित सीमा को नहीं पहचानता।
वहीं, नाम न छापने की शर्त पर एमएसएमई विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ओडीओसी सूची को अंतिम रूप देने से पहले कई महत्वपूर्ण बातों पर गहराई से विचार किया गया था। इनमें व्यंजनों की ब्रांडिंग, उनकी पैकेजिंग और योजना का सीधा लाभ असली दावेदारों तक पहुंचाना मुख्य रूप से शामिल है।
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