विश्व शेर दिवस के अवसर पर, राज्यसभा सांसद और रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के कॉर्पोरेट मामलों के निदेशक, परिमल नाथवानी ने गिर और वहां के शेरों के साथ अपने चार दशक पुराने गहरे संबंधों पर एक विशेष लेख साझा किया है। उन्होंने गिर के पर्यावरण को अपनी चेतना का अहम हिस्सा बताते हुए कहा कि वे हर मौसम में इस शानदार जंगल के साक्षी रहे हैं। गिर से इसी गहरे लगाव के चलते उन्होंने अपनी कॉफी टेबल बुक का नाम “कॉल ऑफ द गिर” (गिर की पुकार) रखा था।
नाथवानी ने अपने संस्मरणों में वर्ष 1987 का जिक्र किया, जब वह पहली बार सासन पहुंचे थे। उस समय एशियाई शेरों की आबादी महज 200 के आसपास थी और सासन एक शांत, सुरम्य गांव हुआ करता था। आज, ग्रेटर गिर के विशाल परिदृश्य में 891 शेरों की आबादी को देखकर उन्होंने गहरा गर्व और संतोष व्यक्त किया है। उन्होंने इसे भारत ही नहीं, बल्कि विश्व की सबसे सफल वन्यजीव संरक्षण गाथाओं में से एक बताया।
इस ऐतिहासिक सफलता का श्रेय उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन और निरंतर सक्रिय मार्गदर्शन को दिया है। इसके साथ ही, उन्होंने गुजरात वन विभाग के अधिकारियों, फ्रंटलाइन गार्ड्स, शेर प्रेमियों, पशु चिकित्सकों और स्थानीय ग्रामीणों के अथक प्रयासों की भी भरपूर सराहना की।
वन्यजीव संरक्षण की दिशा में अपने व्यक्तिगत और कॉर्पोरेट प्रयासों का उल्लेख करते हुए, उन्होंने बताया कि खुले कुओं और रेलवे ट्रैक पर शेरों की दुर्घटनाओं को रोकने के लिए कई ठोस कदम उठाए गए हैं। शेरों को बचाने के लिए लगभग 2,828 खुले कुओं के चारों ओर सुरक्षा दीवारें (पैरापेट) बनाई गई हैं। इसके अलावा, रेलवे लाइनों के पास फेंसिंग लगाने और ट्रेनों की गति सीमा तय करने जैसी पहल भी लगातार की जा रही हैं।
शेरों के स्वास्थ्य संकट पर बात करते हुए नाथवानी ने बताया कि बेबेसिओसिस (Babesiosis) और कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) जैसी गंभीर बीमारियों के संक्रमण को रोकने के लिए आपातकालीन स्थिति में वंतारा (Vantara) टीम के विशेषज्ञों की मदद ली गई। हालांकि, क्षेत्रीय वर्चस्व की जानलेवा लड़ाई में घायल हुए ‘जय’ और ‘वीरू’ नामक शेरों की मशहूर जोड़ी को न बचा पाने का अफसोस उन्हें जीवन भर रहेगा।
आज के गिर को चार दशक पहले से काफी अलग बताते हुए उन्होंने नई चुनौतियों पर भी गंभीर चिंता जताई है। शेर वाले इलाकों में बढ़ते रिसॉर्ट्स और होमस्टे के कारण होने वाले भारी ध्वनि और प्रकाश प्रदूषण को उन्होंने वन्यजीवों के लिए नुकसानदायक बताया है और सरकार से इस पर लगाम लगाने की अपील की है।
बदलते पर्यावरण में शेरों की अनुकूलन क्षमता का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि शेर अब अभयारण्य से बाहर निकलकर नदी-नालों, कृषि क्षेत्रों और औद्योगिक इलाकों तक पहुंच रहे हैं। शेरों ने हाल ही में स्वतंत्र रूप से ‘बरडा’ को अपना दूसरा घर चुना है। उन्होंने जोर दिया कि शेरों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए संरक्षित वन्यजीव कॉरिडोर और प्राकृतिक शिकार की आवश्यकता है।
अपने लेख के अंत में, परिमल नाथवानी ने विश्व शेर दिवस के मौके पर सभी से एक अहम संकल्प लेने का आह्वान किया। उन्होंने लोगों से अपील की है कि वे गिर में कूड़ा न फैलाएं, प्रदूषण न करें और शेरों को किसी भी तरह से परेशान या बाधित न करें।
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